तेलंगानाः कैसे अपराजेय हो गए केसीआर

  • 11 दिसंबर 2018
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"तेलंगाना का गठन सोनिया गांधी की वजह से संभव हुआ है. वो अपना वादा पूरा करने पर दृढ़ संकल्प रहती हैं. यही कारण है कि अलग तेलंगाना राज्य का सपना साकार हो सका है. मैंने तेलंगाना के चार करोड़ लोगों की ओर से उन्हें अपनी कृतज्ञता व्यक्त की है."

"हमारी आज़ादी की लड़ाई में महात्मा गांधी, नेहरू और कई अन्य भारतीयों ने भाग लिया. उन्होंने अंग्रेजों से लोहा लिया और आज़ादी हासिल की. क्या इसके लिए लोगों ने रानी एलिज़ाबेथ के पास जाकर उन्हें माला पहनाया?"

"तेलंगाना को स्वतंत्र राजनीतिक अभिव्यक्ति की ज़रूरत है. लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं कांग्रेस के साथ आंदोलनरत पार्टी का विलय कैसे कर सकता हूं. मैं आंदोलन पर निगरानी रखता हूं. मैं तेलंगाना के पुनर्निर्माण में अगुवाई करूंगा."

आंध्र प्रदेश अधिनियम-2014 को लोकसभा की मंज़ूरी के दो दिनों के बाद राज्य सभा ने भी अपनी मंजूरी दे दी.

इसके बाद, कुछ ही हफ्तों के भीतर तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के अध्यक्ष कल्वकुंतला चंद्रशेखर राव यानी केसीआर के ये तीन बयान सामने आए.

केसीआर के पास श्रोताओं को अपने शब्दों से मंत्रमुग्ध करने की अद्भुत शैली है. राजनीति में सार्वजनिक रूप से बोलने की कला कितनी महत्त्वपूर्ण है.

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Image caption तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर के बेटे केटी रामाराव (केटीआर)

'राजनीतिक विरोधाभास'

ये बताने की ज़रूरत नहीं. हालांकि लगता है कि मौजूदा राजनीतिक दौर में अपने बयानों से पलटना बेहद सामान्य बात है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में स्वीकार्य नहीं है.

फिर भी 'वचन देने' की सामाजिक मूल्यों की परंपरा चली आ रही है.

तो क्या ये मानना चाहिए कि जिस नेता को राजनीतिक लाभ प्राप्त करने का बेहतरीन कौशल प्राप्त है, उसने स्पष्ट रूप से 'राजनीतिक विरोधाभास' और 'नैतिक संघर्ष' को 'राजनीतिक लाभ' पर हावी होने दिया?

उन्होंने पहले कहा था कि वो कांग्रेस के साथ टीआरएस का विलय करेंगे. उन्होंने सोनिया गांधी के साथ पारिवारिक तस्वीरें खिंचवाईं.

उन्होंने घोषणा की, कि वो एक दलित को पहला मुख्यमंत्री बनाएंगे. इन सभी विषयों पर, दोनों सदनों में तेलंगाना विधेयक पारित होने के बाद उन्होंने उपरोक्त प्रतिक्रिया दी.

बाद में इस घोषणा के साथ, कि उनकी पार्टी एक 'पक्की (सम्पूर्ण) राजनीतिक पार्टी' है, उन्होंने आंदोलन की पृष्ठभूमि पर चुनावों के एजेंडे की घोषणा की.

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आंदोलन के बाद बनी सरकार

जिस केसीआर का दिल्ली से हैदराबाद पहुंचने के बाद ड्रम बीटर्स और कलाकारों के प्रदर्शन के साथ भव्य स्वागत हुआ, उन्हीं केसीआर ने कुछ महीने बाद तेलंगाना के पहले मुख्यमंत्री के रूप में 'विजय जुलूस' की अगुवाई की.

कहते हैं राजनीति में कुछ भी यकायक नहीं होता, हर मुकाम रणनीति बनाकर हासिल की जाती है.

इस नियम से अच्छी तरह वाकिफ़ केसीआर ने हालात को अनुकूल पाते ही उसे भुनाने की जी जान से कोशिश की.

यही कारण था कि अपने शुरुआती चुनाव में उन्होंने अपने विरोधियों से जमकर लोहा लिया.

लंबे समय तक चले आंदोलन के बाद गठित लोकतांत्रिक सरकार का ऐतिहासिक महत्त्व है. किसी अन्य स्थान और किसी दूसरे समय में ये प्रेरणा का स्रोत बनेगा.

जब आंदोलन का नेता स्वयं शासक बन जाता है, तो नए समुदाय का नए मूल्यों के साथ निर्माण होता है और पुरानी परम्पराओं को दफ़ा कर दिया जाता है.

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'पक्की राजनीतिक पार्टी'

क्या केसीआर का शासन, जिन्होंने तेलंगाना (आंदोलन के फलस्वरूप) के पहले मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभाला, इतिहास रच सका?

क्या उसने आंदोलन की आकांक्षाओं और आदर्शों की सही दिशा दी है? क्या केसीआर द्वारा बनाई गई 'पक्की राजनीतिक पार्टी' में ये आदर्श शामिल हैं?

वरिष्ठ पत्रकार टंकसाला अशोक का मानना है कि किसी भी नेता को केवल राजनीतिक और सामाजिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए.

वे कहते हैं, "केसीआर ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो तुच्छ राजनीति में शामिल होते हों. वो एक गंभीर व्यक्ति हैं और हालात का आकलन करते हैं. रणनीति तय करने के बाद वो इसे गंभीरता से लागू करते हैं. एक मज़बूत नेता का यही गुण होता है."

उनकी राय में, "केसीआर के रणनीतिक फैसलों को उनकी प्रतिभा, दृढ़ता और कड़ी मेहनत सुनिश्चित करती है. वो एक मज़बूत नेता हैं. उनमें विरोधियों की ताकत को अपना बनाने की क्षमता है. वो अपने विचारों को सिर्फ बोलते ही नहीं, बल्कि उन विचारों को लोगों के दिलों में समाने में भी सक्षम हैं."

"उन्होंने तेलंगाना की अवधारणा को लोगों के दिलों में गहराई से बिठाया है. वो लोगों को अपनी वाणी से प्रभावित करते हैं. ये दुर्भाग्य है कि तमाम प्रतिभाओं के बावजूद वो आकांक्षाओं को वास्तविकता में परिवर्तित नहीं कर सके."

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आंदोलन के नेता का शासक बनना

केसीआर के बारे में तेलंगाना आंदोलन के समर्थक बुद्धिजीवी प्रोफ़ेसर हरगोपाल बताते हैं, "एक आंदोलन के नेता के लिए शासक बनना बड़ी जीत होती है. लेकिन उन्होंने एक शासक के रूप में निराश किया."

हरगोपाल आगे कहते हैं, "घोषणाओं को निर्णायक रूप से लागू करना अच्छी बात है. लेकिन महत्त्वपूर्ण ये है कि ये फैसले कैसे किए गए. वो अपनी मर्जी से फैसले लेते हैं. ये निरंकुश रवैया है. मिशन काकातीय, भगीरथ प्रोग्राम और रायतु बंधू (किसान मित्र) जैसी योजनाएं और ज़िलों का विभाजन लोकतांत्रिक फैसले नहीं थे. विशेषज्ञों से परामर्श न करना और कमीशन नियुक्त न करना गैर-लोकतांत्रिक है."

एक लोकप्रिय कवि और मुख्यमंत्री कार्यालय में ओएसडी देशपति श्रीनिवास कहते हैं, "केसीआर एक ऐसे नेता हैं जिन्होंने राजनीतिक मजबूरियों को अपने व्यक्तित्व में ढाला है. वो दूसरों से प्रभावित होना पसंद नहीं करते. वो स्वतंत्र रूप से सोचते हैं. ऐसा लगता है कि उनका रवैया संस्थागत संरचनाओं से प्रभावित होने से इंकार करता है."

"हमें छोटी योजनाएं नहीं बनानी चाहिए, बड़ा सोचना चाहिए! भारी योजनाएं बनाएं और उन्हें लागू करें." उनके करीबी सहयोगियों का कहना है कि वो इसी सिद्धांत पर अमल करते हैं.

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राजनीति को समझने की कोशिश

केसीआर, कल्वकुंतल राघवय्याह और वेंकटम्मा के पुत्र हैं. वे मनेर अपर बांध के निर्माण से भूमि खोकर विस्थापित हुए और पूर्व मेडक ज़िले के चिंतमादका गांव में बस गए.

उनका परिवार बेहद समृद्ध नहीं था. लेकिन नेता बनने की महत्त्वाकांक्षा उन्हें कॉलेज के दिनों से लुभाती रही. ये महत्त्वाकांक्षा पूरा करने की उनकी यात्रा हार के साथ शुरू हुई.

कवि और तेलंगाना साहित्य अकादमी के अध्यक्ष नंदिनी सिद्ध रेड्डी 1970 और 1975 में इंटर और डिग्री कॉलेजों में केसीआर के सहपाठी थे.

वे कहते हैं, "उन्होंने सिद्धिपेट डिग्री कॉलेज से वैकल्पिक विषयों इतिहास, तेलुगू साहित्य और राजनीति विज्ञान में स्नातक किया. इस दौरान उन्होंने छात्र संघ अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा, पर हार गए. वो कांग्रेस नेता अनंतु मदन मोहन के राजनीतिक शिष्य बने रहे और राजनीति को समझने की कोशिश करते रहे."

"एक बार मदन मोहन ने उन्हें कोई नौकरी दिलाने की पेशकश की, लेकिन केसीआर ने ये कहते हुए इनकार कर दिया कि मैं नौकरी नहीं करूंगा. मैं राजनीति में प्रवेश करूंगा. अपने भविष्य के बारे में उनकी ये स्पष्टता थी."

एनटीआर के साथ

देशपति श्रीनिवास कहते हैं, "डिग्री की पढ़ाई पूरी करने के बाद केसीआर ने महसूस किया कि वास्तविक राजनीति दिल्ली में हो रही है, न कि राज्य में. वो उसी वर्ष दिल्ली गए जिस साल आपातकाल लगा था और संजय विचार मंच में शामिल हो गए."

"संजय गांधी की दुर्घटना में मृत्यु के बाद वो 1980 में सिद्धिपेट लौट आए. उस वक्त मैरी चेन्ना रेड्डी मुख्यमंत्री थे. एक बार वो किसी किसी बैठक में भाग लेने सिद्धिपेट गए तो युवा केसीआर मंच से भाषण दे रहे थे. 'ये युवक अच्छा भाषण दे रहा है, उसे मंच से बोलने दो,' चेन्ना रेड्डी ने कहा. बाद में वो केसीआर के घर पर भी जाने लगे."

सिद्ध रेड्डी याद करते हैं कि केसीआर, एनटीआर की फिल्में काफी पसंद करते थे. वो ख़ासकर पौराणिक फिल्में पसंद करते थे. उनकी मुलाकात अधिकतर सिनेमाघरों में होती थी.

जब नंदमुरी तारक रामा राव ने 1983 में तेलुगु देसम पार्टी की स्थापना की, तो केसीआर उसमें शामिल हो गए. उन्होंने सिद्धिपेट निर्वाचन क्षेत्र से अपने पहले राजनीतिक गुरु मदन मोहन के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा और 877 वोटों के छोटे अंतर से हार गए.

साल 1985 में वो फिर चुनावी अखाड़े में उतरे और अपने राजनीतिक करियर में अपनी पहली महत्त्वपूर्ण जीत दर्ज की. तब से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. वो लगातार सात बार विधानसभा के लिए और पांच बार संसद के लिए चुने गए.

एनटीआर कैबिनेट में साल 1987 में वो पहली बार मंत्री बने. साल 1997 में चंद्रबाबू नायडू के मंत्रिमंडल में उन्होंने परिवहन मंत्री की ज़िम्मेदारी संभाली. साल 1999 के चुनावों में जीत के बाद चंद्रबाबू ने उन्हें उप सभापति का पद दिया. लेकिन केसीआर को मंत्रिमंडल से दूर रहना रास नहीं आया.

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तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन

पंद्रह वर्ष की आयु में पहली बार तेलंगाना आंदोलन देखने वाले केसीआर ने महसूस किया कि आंदोलन को विस्तार देने का यही सही समय है.

इससे तीन साल पहले, यानी साल 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर अपने भाषण में उत्तराखंड को एक अलग राज्य घोषित करने की संभावना का उल्लेख किया था.

उस समय हैदराबाद में आईटी तेजी से पांव फैला रहा था और अचल संपत्ति के कारोबार में तेज बढ़ोत्तरी हो रही थी. इससे सीमांत आंध्र के लोगों का आना बढ़ा, जिसने तेलंगाना के जुनून को नई चिनगारी दी.

उसी वर्ष एक नवंबर को जब तेलंगाना के विचारक प्रोफ़ेसर जयशंकर ने कुछ अन्य लोगों के साथ वारंगल में एक छोटे से हॉल में बैठक की, तो अप्रत्याशित रूप से 5,000 लोगों ने उस बैठक में भाग लिया. तब से ऐसी बैठकों का सिलसिला बढ़ता गया.

जब चंद्रबाबू नायडू की सरकार ने साल 2000 में बिजली शुल्क बढ़ाया, तो लोगों में असंतोष बढ़ा. इस बारे में केसीआर ने अपने पार्टी नेता को एक पत्र लिखा. उसी वर्ष नवंबर में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ राज्यों का गठन हुआ.

जब ये महसूस किया गया कि अलग तेलंगाना प्राप्त करना मुमकिन नहीं है, तो केसीआर ने पूर्व नक्सल नेता इनय्या, जयशंकर और अन्य तेलंगाना समर्थकों के साथ विस्तृत चर्चा के बाद 7 अप्रैल को तेलंगाना राष्ट्र समिति की स्थापना की.

टंकसाला अशोक ने बताया, "कांग्रेस छोड़कर टीडीपी में शामिल होने का उनका फैसला अपने राजनीतिक अस्तित्व को बनाए रखने के लिए था. लेकिन तेलुगू देशम से इस्तीफा देकर तेलंगाना का नारा देना उनके राजनीतिक करियर में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ था."

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तेलंगाना आंदोलन का नया नेता

वरिष्ठ पत्रकार दुर्गाम रविंदर ने विस्तार से बताया. "केसीआर की आदत है कि फैसला लेने से पहले वो गहन अध्ययन करते हैं. जब उन्हें मंत्री बनाया गया, तो वो अपने पोर्टफोलियो के सभी मुद्दों का, हर स्तर पर, अधिकारियों के साथ विस्तृत चर्चा करते थे और पूरे विभाग को समझने की कोशिश करते थे."

"टीडीपी छोड़ने से पहले उन्होंने सुनिश्चित किया कि सिद्धिपेट निर्वाचन क्षेत्र में कोई उनका विरोध न कर सके. टीआरएस की स्थापना करने से पहले उन्होंने एक वर्ष तक तेलंगाना के साहित्य का अध्ययन किया. हालांकि ये बात बेतुकी लग सकती है, लेकिन वो हर कदम वैज्ञानिक रूप से उठाते हैं."

पार्टी की स्थापना के बीस दिनों बाद उन्होंने 17 मई को करीमनगर में सिंह गर्जना रैली आयोजित की. रैली में उन्होंने घोषणा की, कि वो बिना खून की एक भी बूंद बहाए सिर्फ राजनीतिक आंदोलन के ज़रिए तेलंगाना की स्थापना करेंगे.

उन्होंने लोगों से भावनात्मक आह्वान किया, "अगर कोई इस उद्देश्य से पीछे हटता है, तो उसे पत्थरों से कुचलकर मार डालो!"

अलग राज्य की मांग के लिए केसीआर की आवाज़ दिन बीतने के साथ तेज और कठोर होती गई. तेलंगाना की जनता स्थानीय भाषा और तेलंगाना की पहचान को प्रतिबिंबित करने से प्रभावित थी. जब भी उन्होंने इस्तीफा दिया और जनता के पास पहुंचे, तो दिल खोलकर उनका स्वागत किया गया.

केसीआर की राजनीतिक गाथा के बारे में पूर्व एमएलसी, प्रोफ़ेसर नागेश्वर बताते हैं, "केसीआर ऐसे नेता हैं, जिन्हें तेलंगाना आंदोलन ने गढ़ा. इस नेतृत्व के लिए कई लोगों ने प्रयास किए, लेकिन केसीआर ने इसे पाने के लिए कड़ी मेहनत की. जो काम पहले चेन्ना रेड्डी नहीं कर सके, उसे केसीआर ने कर दिखाया."

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जनता का नेता

मनोवैज्ञानिक-विश्लेषक और व्यक्तित्व विकास विशेषज्ञ डॉक्टर सी वीरेंद्र का कहना है, "केसीआर की विशेषता ये है कि वो लोगों की समस्याओं को गहराई से समझते हैं और उन्हें सरल शब्दों में बताते हैं. ऐसे में लोग सोचते हैं कि जो नेता उनकी समस्याओं को समझ सकता है, वो उन्हें हल भी कर सकता है और उसे समर्थन देते हैं."

"इतना ही नहीं, वो जटिल समस्याओं को सरल शब्दों में ढाल सकता है और इसमें उसकी कोई सानी नहीं. इसका उदाहरण लिया जा सकता है. 'तेलंगाना बोतुकुलु' 'बोगुबेई' 'बोम्बई' 'दुबई' (तेलंगाना की ज़िंदगी, कोयले की खान, मुंबई (प्रवासन) दुबई (आजीविका के लिए प्रवासन). इस प्रकार वो 'तीन शब्दों' में उस विचार का संचार करते हैं, जिसे सौ वाक्यों में भी नहीं किया जा सकता. वो ये भी कहते हैं, तेलंगाना तालाब जो कप की तरह थे, अब सॉकर की तरह दिखने लगे हैं. जनता के बीच भाषण देने में उन्हें महारथ हासिल है."

न सिर्फ आंदोलन के समय, बल्कि सत्ता में आने के बाद भी उनकी वाणी लोगों को, विरोधियों को और मीडिया को प्रभावित करती रही. देशपति श्रीनिवास कहते हैं, "ये सिर्फ भाषा से प्यार नहीं है, बल्कि केसीआर, तेलंगाना संस्कृति और तेलंगाना की पहचान को पसंद करते हैं. इसके लिए वो कुछ भी करने को तैयार रहते हैं."

वीरेन्द्र कहते हैं, "एनटीआर ने, जो खुद को आम लोगों का भक्त बताते थे, और जिन्हें वो 'देवता' मानते थे, खुद को इतिहास में एक बड़े नेता के रूप में स्थापित किया. केसीआर उनसे थोड़ा अलग होकर कहते हैं, 'तेलंगाना समाज मेरी मां है'. वो कहते हैं कि वो उस मां का बेटा बनकर आए हैं और इस प्रकार तेलंगाना की जनता के दिल के करीब हैं."

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साढ़े चार साल का राज़...

बिजली कमी की समस्या को केसीआर ने सबसे ज़्यादा प्राथमिकता दी और सत्ता में आने के बाद उसका हल निकाला. उन आलोचनाओं को दरकिनार करते हुए कि तेलंगाना अलग राज्य बन जाएगा तो अंधेरे में डूब जाएगा, उन्होंने सत्ता में आने के बाद दूसरी फसल से ही 24 घंटे बिजली आपूर्ति प्रदान की.

इसके अलावा कालेश्वरम परियोजना का तेजी से निर्माण और कल्याण योजनाएं, जैसे, कल्याण लक्ष्मी [लड़कियों को शादी का उपहार], शादी मुबारक (मुस्लिम लड़कियों के लिए शादी का तोहफा), कांति वेल्गुगु (आंखों की दृष्टि), रितु बंधु (किसान मित्र), को हालांकि कुछ लोगों ने पसंद किया, लेकिन आम लोगों में कई इसकी आलोचना भी कर रहे हैं.

अशोक ने कहा, "पुराने समय में इंदिरा गांधी, एनटीआर, वाईएसआर जैसे नेताओं की पहचान ऐसे नेताओं के रूप में हुई जो गरीबों के कल्याण को प्रमुखता देते थे. केसीआर भी उस परम्परा में शामिल हो गए हैं. उनका विचार, कि कोई परिवार एक कमरे के घर में क्यों रहे, उसके पास कम से कम दो कमरों का घर होना चाहिए, प्रशंसनीय है."

"लेकिन निर्माण के लिए स्वयं बनाई गई समय सीमा विफल हुई. इसी प्रकार दलितों को 3 एकड़ जमीन देने की योजना भी एक बड़ी विफलता है."

उन्होंने सवाल किया, "एक ओर सिंचाई परियोजनाओं का विकास किया जा रहा है और दूसरी और रायतु बंधू योजना लागू की गई है. नतीजतन, भूमि की कीमत चार से पांच गुना बढ़ रही है. ऐसी दोतरफा स्थिति में इस योजना को कैसे लागू किया जा सकता है?"

हरगोपाल कहते हैं, "केसीआर ने न सिर्फ एनटीआर और वाईएसआर से, बल्कि चंद्रबाबू से भी सीखा है. वो एनटीआर की आवेगपूर्ण निर्णय लेने की शैली, वाईएसआर की निर्णायक कार्यान्वयन की गुणवत्ता और चंद्रबाबू के जोड़तोड़ की कला का मिश्रण हैं."

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संकेत और शक

'जल, निधि, नौकरियां' (नेल्लु, निधुलु, नियमाकालू) - इस नारे के साथ छात्र आंदोलन के साथ जुड़े. लेकिन एक लाख से ज़्यादा नौकरियों का आश्वासन लागू नहीं हुआ. इसने युवाओं को निराश किया. छात्रों का आरोप है कि आंदोलन का भावनात्मक केंद्र उस्मानिया विश्वविद्यालय जब शताब्दी वर्ष मना रहा था, सरकार उसकी ओर से उत्साहहीन थी.

वे ये भी कहते हैं कि केसीआर छात्रों के प्रति प्रतिशोधपूर्ण प्रवृत्ति रखते हैं. ऐसा करना एक राज्य के मुख्यमंत्री के लिए उचित नहीं है.

सवाल उठाया जा रहा है कि केसीआर सचिवालय क्यों नहीं आते और सिर्फ प्रगति भवन में ही क्यों रहते हैं. उनके करीबी ये भी आरोप लगाते हैं कि वो लोगों को अपमानित करते हैं और उन्होंने आंदोलन में अपने साथी रहे कोंदंदा राम के घर पुलिस भेजकर और धरना चौक को तोड़कर अमानवीय काम किया था.

क्या जनता को उन मंत्रियों का विरोध नहीं करना चाहिए जो केसीआर तक पहुंचने में सक्षम नहीं हैं? ऐसा लगता है कि वो पुलिस और खुफिया एजेंसियों को छोड़कर और किसी की नहीं सुन रहे.

हरगोपाल ने टिप्पणी की, कि शासन की उनकी शैली तेलंगाना संस्कृति को प्रतिबिंबित नहीं करती, बल्कि सामंती संस्कृति का प्रतिरूप है, जिसे तेलंगाना समाज ने सीधे तौर पर खारिज कर दिया था.

नालगोंडा के रहने वाले एचसीयू प्रोफेसर पी रामुलु का कहना है, "किसानों के प्रति सहानुभूति रखने वाले वाईएसआर कुछ अलग थे. वो हमेशा अपने मंत्रियों और पार्टी नेताओं के लिए उपलब्ध रहते थे. इसके अलावा उन्होंने नेतृत्व की दूसरी पीढ़ी को भी प्रोत्साहित किया. लेकिन केसीआर ने ऐसा नहीं किया. वो इस प्रकार काम कर रहे हैं, जैसे वही सर्वेसर्वा हों. जब सत्ता में रहते हुए कोई अहंकारी दिखता है, तो लोगों तक गलत संदेश जाता है."

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जल्द चुनाव... नए ज़ुबानी प्रहार

प्रगति निवेदन [प्रगति रिपोर्ट] में कोंगारा कलान में उनके खिन्न मिज़ाज का जो भी कारण रहा हो, विधानसभा के विघटन के बाद उनकी अभियान शैली धीरे-धीरे तेज हुई. केसीआर अब अपने विरोधियों पर अपनी आक्रामक शैली में हमला कर रहे हैं. उनकी ये भी ज़िम्मेदारी है कि वो लोगों को बताएं कि अब तक उन्होंने क्या किया है. यही कारण है कि हम उनके भाषणों में एक आत्मरक्षात्मक रवैया देख सकते हैं. "बंगारू तेलंगाना" [गोल्डन तेलंगाना] विश्वनाथम [यूनिवर्सल सिटी] जैसी अभिव्यक्तियां उनके मौजूदा भाषणों में इतने आत्मविश्वास से नहीं झलकतीं.

केसीआर के इन बयानों से उनका तनाव स्पष्ट झलकता है, "यदि हम किसी जाति विशेष के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाते हैं, तो क्या उस जाति के सभी लोगों की गरीबी ख़त्म हो जाएगी?" "यदि टीआरएस हार जाता है, तो मुझे भारी नुकसान नहीं होगा. अगर हम चुने जाते हैं, तो हम काम करेंगे. अन्यथा हम घर पर आराम करेंगे."

उस्मानिया विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के एक छात्र ने कहा, "मुख्यमंत्री रहा कोई व्यक्ति हार जाता है, तो क्या वो आराम करेगा? क्या जब सार्वजनिक नेता के रूप में जीतेगा, तभी वो जिम्मेदारी लेगा?"

रामुलु का विचार है, "आंदोलन के बाद केसीआर को एक नए राज्य के पहले मुख्यमंत्री बनने का अच्छा मौका मिला. लेकिन वो इसका सही इस्तेमाल नहीं कर पाए."

टंकसाला अशोक ने जोर देकर कहा, "मौजूदा राजनीतिक हालात में, हम राजनेताओं की उम्मीद नहीं रख सकते. लेकिन केसीआर के अलावा हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है, जो तेलंगाना मामलों को संभालने और विरोधियों का सामना करने की क्षमता रखता हो."

हरगोपाल का कहना है, "जब आंदोलन चल रहा हो, तो लोग अपने नेता की कुछ खामियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं. लेकिन जब वो सत्ता में आते हैं, तो लोग हर बात की उम्मीद लगाते हैं. वो उम्मीद करते हैं कि फैसले लेने की प्रक्रिया में उनकी भी भागीदारी होनी चाहिए. लोकतंत्र में लोगों की भागीदारी सिर्फ वोट देने भर से ख़त्म नहीं हो जाती. दरअसल इसके साथ उनकी भागीदारी की शुरुआत होती है."

कॉलेज के समय के उनके दोस्त सिद्ध रेड्डी ने कहा, "तेलंगाना आंदोलन के दौरान उनकी प्रतिबद्धता पर किसी को शक नहीं रहा. वो ये भी जानता है कि वो इतिहास में आंदोलन के नेता के रूप में प्रसिद्ध होगा. अब वो एक अच्छे शासक के रूप में अपनी जगह बनाना चाहता है.

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