मध्य प्रदेश में 47 हज़ार वोट ज़्यादा मिलने पर भी कैसे हारी बीजेपी?

  • 12 दिसंबर 2018
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11 दिसंबर को आए पांच राज्यों के चुनाव नतीजों को समझने के लिए वोटों का प्रतिशत और 2013 की स्थिति पर ठीक से नज़र डालने की ज़रूरत है.

सबसे पहले मध्य प्रदेश की बात, जहां बीजेपी को कांग्रेस से कुछ वोट ज़्यादा ही मिले हैं लेकिन सीटें कांग्रेस को ज़्यादा मिल गईं. हालाँकि बहुमत किसी को नहीं मिला.

मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश में कांग्रेस को 114 सीटें मिली हैं, मध्य प्रदेश विधानसभा में कुल 230 सीटें हैं, यानी बहुमत के लिए 116 सीटें चाहिए. यह कांग्रेस के लिए काफ़ी बड़ी बढ़त है, पांच साल पहले 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ़ 58 सीटें मिली थीं, यानी उसे 56 सीटों का फ़ायदा हुआ है.

अब बीजेपी पर नज़र डालिए, शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में लड़े गए चुनाव में 2013 में कमल निशान पर चुनाव लड़ने वाले 165 विधायक जीते थे, इस बार उनकी संख्या 109 रह गई है. दिलचस्प बात ये है कि बीजेपी को 56 सीटों का नुकसान हुआ जबकि कांग्रेस को इतनी सीटों का फ़ायदा हुआ है.

मध्य प्रदेश में दोनों पार्टियों को मिले वोटों का अंतर बहुत कम है. चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, बीजेपी को 41 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि कांग्रेस को 40.9 प्रतिशत. यानी दोनों के बीच 0.1 प्रतिशत का अंतर है.

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इसका मतलब है कि बीजेपी को कांग्रेस से कुछ ज़्यादा वोट मिले हैं लेकिन सीटें कांग्रेस को अधिक मिली हैं, इसकी वजह ये है कि कुछ सीटों पर कांग्रेस के वोट ज़्यादा थे लेकिन पूरे राज्य में बीजेपी को कुल वोट ज़्यादा मिले हैं.

चुनाव आयोग के आंकड़ें बता रहे हैं, इस बार मध्य प्रदेश में बीजेपी को एक करोड़ 56 लाख 42 हज़ार 980 वोट मिले हैं. जबकि कांग्रेस को एक करोड़ 55 लाख 95 हज़ार 153 वोट मिले. मतलब बीजेपी को कांग्रेस से पूरे राज्य में 47 हज़ार 827 वोट ज़्यादा मिले हैं, यही है 0.1 प्रतिशत का अंतर.

अब वोट प्रतिशत में आए बदलाव को देखिए, कांग्रेस को 4.6 प्रतिशत वोटों का फ़ायदा हुआ है जबकि 2013 के मुकाबले बीजेपी के वोटों में 3.78 प्रतिशत की गिरावट आई है.

मध्य प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी को पिछले चुनाव में 4 सीटें मिली थीं लेकिन इस बार उसे 2 ही सीटें हासिल हो पाई हैं.

राजस्थान

मध्य प्रदेश की ही तरह राजस्थान में भी कांग्रेस बहुमत के आंकड़े को अपने दम पर नहीं छू पाई है. राजस्थान विधानसभा में 200 सीटें हैं, यानी बहुमत के लिए 101 सीटें चाहिए लेकिन कांग्रेस की गाड़ी 99 पर रुक गई है.

राजस्थान में भी कांग्रेस और बीजेपी को मिले कुल वोटों में अंतर काफ़ी कम है. बीजेपी को 38.8 प्रतिशत वोट मिले हैं जबकि कांग्रेस को 39.3, यहां भी कुल वोटों का अंतर 1 प्रतिशत से कम है.

पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस के वोट 6.2 प्रतिशत बढ़े हैं, इस वजह से उसे 78 सीटों का फ़ायदा हुआ है, पिछली बार उसे महज 21 सीटों से संतोष करना पड़ा था. दूसरी ओर बीजेपी को 2013 के मुकाबले, 6.4 प्रतिशत का नुकसान हुआ है.

इस नुकसान का मतलब है कि उसकी सीटों की संख्या में भारी गिरावट आई है, 2013 में 163 सीटें जीतने वाली बीजेपी 73 पर सिमट गई है, यानी उसने 90 सीटें गंवा दी हैं.

राजस्थान में मायावती ने ख़ासी कामयाबी हासिल की है, उन्हें राज्य में 6 सीटें मिली हैं जबकि पिछले चुनाव में उनकी पार्टी को 3 सीटें मिली थीं.

बीजेपी के नुकसान की एक बड़ी वजह निर्दलीय और छोटे दल हैं, उनकी संख्या 21 तक जा पहुंची है, पिछले चुनाव में उनकी संख्या 16 थी. जाट नेता हनुमान बेनीवाल की नई पार्टी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने 3, राष्ट्रीय लोकदल ने 1, भारतीय ट्राइबल पार्टी ने 2, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने 2 सीटें हासिल की हैं. 13 निर्दलीय उम्मीदवार कामयाब रहे हैं.

छत्तीसगढ़

बीजेपी के मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह को सीधी हार का सामना करना पड़ा है. कांग्रेस को पिछली बार 39 सीटें मिली थीं, इस बार उसने 68 सीटें जीती हैं, उसका प्रदर्शन पिछली बार के बीजेपी के प्रदर्शन से बहुत बेहतर है, पिछली विधानसभा में बीजेपी के पास 49 सीटें थीं.

बीजेपी के वोट प्रतिशत में 8 प्रतिशत की गिरावट आई है, जिसका नतीजा ये हुआ है कि वह सिर्फ़ 15 सीटों पर सिमट गई है.

राज्य में कांग्रेस के वोटों में 2.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जिसकी वजह से उसकी सीटों की संख्या पिछली बार के मुकाबले 29 ज़्यादा हो गई है.

तेलंगाना

आंध्र प्रदेश से टूटकर अलग हुए इस राज्य में के चंद्रशेखर राव की पार्टी ने ज़ोरदार जीत हासिल की है. उनकी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) ने अलग राज्य का अभियान चलाया था, तेलंगाना राज्य की स्थापना जून 2014 में हुई थी.

राज्य विधानसभा में कुल 119 सीटें हैं, टीआरएस ने 88 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया है. दूसरी बड़ी पार्टी के तौर पर कांग्रेस उभरी है जिसे 21 सीटें मिली हैं.

टीआरएस ने राज्य में 46 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल किए हैं, जबकि कांग्रेस को 28 प्रतिशत वोट मिले हैं. तेलंगाना में बीजेपी बड़ी मुश्किल से एक सीट जीत पाई है, और उसके वोटों का हिस्सा सिर्फ़ 7 फ़ीसदी रहा.

चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देसम पार्टी (टीडीपी) की हालत भी बीजेपी की ही तरह पतली रही है, उसे सिर्फ़ दो सीटें मिल पाई हैं जबकि असदउद्दीन ओवैसी की पार्टी ने 7 सीटें जीती हैं.

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मिज़ोरम

पूर्वोत्तर का अकेला राज्य जहां कांग्रेस सत्ता में थी, अब बुरी तरह हारकर बाहर हो गई है.

मिज़ो नेशनल फ्रंट (एमएनफ़) ने 40 सीट वाली विधानसभा में 26 सीटें जीती हैं. कांग्रेस 5 सीटों पर सिमट गई है जबकि पिछली विधानसभा में उसके पास 34 विधायक थे.

कई पूर्वोत्तर राज्यों में जीत का परचम लहराने वाली बीजेपी बड़ी मुश्किल से अपना खाता खोल सकी है, पिछली बार उसे कोई सीट नहीं मिली थी, इस बार एक सीट मिली है.

राज्य में आठ निर्दलीय उम्मीदवारों को जीत मिली है लेकिन एमनएफ़ को स्पष्ट बहुमत है इसलिए उनकी कोई ख़ास भूमिका नहीं होने वाली है.

पिछले चुनाव में सिर्फ़ 5 सीटें हासिल करने वाली एमएनएफ़ ने यह कमाल इसलिए कर दिखाया क्योंकि उसके वोट शेयर में 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. राज्य में उसे 37 प्रतिशत से अधिक वोट मिले हैं जबकि कांग्रेस को 30 प्रतिशत. कांग्रेस के वोटों में 14 फ़ीसदी की भारी गिरावट हुई है.

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