योगी आदित्यनाथ का जादू विधानसभा चुनावों में क्यों नहीं चल पाया?

  • 13 दिसंबर 2018
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पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं, हार-जीत के अलग-अलग कोणों से विश्लेषण हो रहे हैं, आगे के चुनाव में उनके प्रभाव के भी अनुमान लगाए जा रहे हैं, ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक बार फिर चर्चा में हैं.

योगी आदित्यनाथ देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री होने के नाते बीजेपी के लिए प्रचार करने हर जगह जाएं, इसमें कोई आश्चर्य नहीं.

लेकिन उम्मीदवारों की मांग और योगी के भाषणों में उनकी ऊर्जा को देखते हुए चुनावों में उनकी छवि बीजेपी के एक बड़े ब्रैंड के तौर पर उभरी.

चर्चाएं तो यहां तक होने लगीं कि 'अब वो मोदी का विकल्प' बन चुके हैं.

लेकिन चुनाव नतीजों के बाद ऐसी तमाम धारणाओं पर ठीक उसी तरह पानी फिर गया, जैसे साल 2014 के बाद नरेंद्र मोदी की अपराजेय छवि और अमित शाह की चुनावी मैनेजर की छवि के साथ हुआ.

उत्तर प्रदेश में क़ानून व्यवस्था पर उठ रहे सवालों के बीच विषम परिस्थितियों में भी योगी आदित्यनाथ ने इन राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए जमकर समय निकाला.

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योगी ने की 70 से ज़्यादा रैलियां

इन सभी राज्यों में उन्होंने 70 से ज़्यादा रैलियां कीं, भाषण शैली में वही जोश, वही तल्ख़ी दिखाई जिसके लिए वो जाने जाते हैं, मीडिया में चर्चा में भी इसीलिए ख़ूब आए, लेकिन ये सारी बातें शायद मतदाताओं को अच्छी नहीं लगीं.

70 से ज़्यादा रैलियों और सभाओं के बावजूद तीनों राज्य बीजेपी के हाथ से निकल गए.

वरिष्ठ पत्रकार संजीव श्रीवास्तव कहते हैं, "तेलंगाना में तो नुकसान ही हुआ लेकिन राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में उनका कोई प्रभाव पड़ता, ऐसी उम्मीद भी नहीं थी. इन तीनों राज्यों में मुस्लिम आबादी उतनी ज़्यादा नहीं है, इसलिए ध्रुवीकरण करना थोड़ा मुश्किल है और उसका कोई बहुत फ़ायदा भी नहीं है."

वो कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ ने हालांकि इसकी पूरी कोशिश की कि हिंदू वोट प्रभावित हों, लेकिन उससे कोई फ़र्क पड़ा नहीं. यदि पड़ा होता तो परिणाम में ज़रूर दिखता."

मिज़ोरम को छोड़कर अन्य चार राज्यों में योगी ने जमकर चुनाव प्रचार किया. उन्होंने सबसे ज़्यादा 26 चुनावी सभाएं राजस्थान में कीं जबकि छत्तीसगढ़ में 23 और मध्य प्रदेश में उन्होंने 17 सभाएं कीं. तेलंगाना में भी योगी आदित्यनाथ ने आठ जनसभाओं को संबोधित किया.

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हिंदुत्व एजेंडा का दांव पड़ा उल्टा

तेलंगाना में पिछली विधानसभा में बीजेपी की पांच सीटें थीं जबकि इस बार वो सिर्फ़ एक सीट पर सिमट कर रह गई.

हैदराबाद में वरिष्ठ पत्रकार उमर फ़ारूक़ कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ या फिर बीजेपी की जो चुनावी रणनीति और हिंदुत्व का एजेंडा है, उसका यहां बहुत असर कभी नहीं रहा. योगी ने हालांकि अपने भाषणों में टीआरएस और कांग्रेस को मुसलमानों का हितैषी बताते हुए ये पूरी कोशिश की कि हिंदुत्व चुनावी एजेंडे में आ जाए, लेकिन वो दांव शायद उल्टा ही पड़ गया."

उमर फ़ारूक़ कहते हैं कि तेलंगाना में बीजेपी के एकमात्र विजयी उम्मीदवार टी राजा सिंह लोध की छवि भी योगी आदित्यनाथ की तरह ही है. बताया जाता है कि उनके ख़िलाफ़ भड़काऊ भाषण देने के दर्जनों मामले दर्ज हैं और उमर फ़ारूक़ के मुताबिक उनके निर्वाचन क्षेत्र गोशमहल में ज़्यादातर मतदाता उत्तर भारतीय हैं.

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Image caption योगी आदित्यनाथ और रमन सिंह

छत्तीसगढ़ में करारी हार

छत्तीसगढ़ में तो योगी बीजेपी की ओर से स्टार प्रचारक थे ही, रमन सिंह के भी वो पसंदीदा प्रचारक थे. अपनी जनसभाओं के माध्यम से राज्य की लगभग सभी 90 सीटों को उन्होंने कवर किया.

रमन सिंह ने तो नामांकन दाखिल करने से पहले परिवार सहित मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और छत्तीसगढ़ में मतदान के बाद गोरखपुर जाकर उन्होंने गोरखनाथ मंदिर में पूजा अर्चना भी की.

लेकिन जब नतीजे सामने आए तो रमन सिंह राजनांदगांव की अपनी सीट भले ही जीत गए लेकिन पूरे प्रदेश में बीजेपी की करारी हार हुई. रमन कैबिनेट के 12 में से आठ मंत्री भी चुनाव हार गए.

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हिन्दू बहुल इलाक़े में कांग्रेस की जीत

वरिष्ठ पत्रकार सुदीप ठाकुर कहते हैं, "योगी का कितना असर हुआ, इसका उदाहरण रमन सिंह के गृहनगर कवर्धा में मिलता है जहां कांग्रेस उम्मीदवार मोहम्मद अकबर ने सबसे बड़े अंतर से जीत दर्ज की है जबकि ये हिंदू बहुल इलाक़ा है."

वो कहते हैं, "आम छत्तीसगढ़िया को तो रमन सिंह का योगी आदित्यनाथ के चरणों में इस तरह गिरना भी बड़ा अजीब लगा होगा. 15 साल के सत्ता विरोधी लहर के अलावा शायद ये सब बातें भी परिणामों को प्रभावित करने में सहायक बनी हों."

दरअसल, कर्नाटक और गुजरात में चुनाव प्रचार के बाद योगी आदित्यनाथ की चुनावों में बीजेपी उम्मीदवारों की ओर से बतौर स्टार प्रचारक मांग काफ़ी बढ़ गई थी.

योगी ने त्रिपुरा में भी प्रचार किया और बीजेपी की जीत में योगी की भूमिका को भी काफ़ी अहम माना गया. लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे परिस्थितियों का प्रभाव ज़्यादा, किसी नेता का योगदान कम मानते हैं.

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कॉलेज के ज़माने में कैसे थे योगी आदित्यनाथ

हिंदू हृदय सम्राट

सुदीप ठाकुर कहते हैं कि योगी को हिंदू हृदय सम्राट के एक नए प्रतीक के तौर पर खड़ा करने की कोशिश संघ परिवार और बीजेपी भले ही करे, लेकिन सच्चाई ये भी है कि वो राज्य के मुख्यमंत्री रहते हुए उपचुनाव में अन्य सीटों के अलावा ख़ुद अपनी सीट भी नहीं बचा पाए.

राजस्थान के अलवर में योगी आदित्यनाथ ने हनुमान को कथित तौर पर दलित बताने वाला ऐसा बयान दिया जो चुनाव के बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है, बावजूद इसके बीजेपी को कुछ ज़्यादा फ़ायदा नहीं हुआ.

हालांकि ऐसा मानने वालों की भी कमी नहीं है जो राजस्थान में 73 सीटें जीतने के पीछे योगी की जनसभाओं की वजह को नहीं नकारते हैं.

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मंदिर मुद्दे पर मतदाताओं का रुख

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र की मानें तो योगी की उपयोगिता सिर्फ़ हिंदुत्व के मुद्दे को मुखर और आक्रामक बनाने में थी और इन राज्यों में सत्ता विरोधी लहर के चलते हिंदुत्व मुद्दा था ही नहीं.

वो कहते हैं, "इसी बीच अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा भी सुर्खियों में रहा और ये एक ऐसा मुद्दा है जिस पर पूरी बीजेपी ने लोगों में अपना विश्वास लगभग खो दिया है. ऐसे में हिंदुत्व की कितनी भी बात कोई भी नेता करेगा, मतदाता उससे प्रभावित नहीं हो पाएगा."

योगी ही नहीं मोदी की रैलियों पर भी सवाल

हालांकि ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ योगी आदित्यनाथ की रैलियों और सभाओं को लेकर ही सवाल उठ रहे हैं बल्कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में 15 साल और राजस्थान में पांच साल के सत्ता विरोधी लहर के आगे सभी बड़े नेताओं के लुभावने भाषण धराशाई साबित हुए.

मसलन, बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मदन लाल सैनी के गृह जनपद सीकर में योगी आदित्यनाथ के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जनसभा की लेकिन ज़िले भर में बीजेपी का सूपड़ा साफ़ हो गया.

सीकर ज़िले की कुल आठ विधान सभा सीटों में से बीजेपी एक सीट भी नहीं जीत पाई. यहां की सात सीटें कांग्रेस के खेमे में गईं जबकि एक अन्य सीट पर कांग्रेस के बागी महादेव सिंह खंडेला जीतने में क़ामयाब हुए.

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