छत्तीसगढ़: रमन सिंह पर नान घोटाले में क्या शिकंजा कसेगी बघेल सरकार?

  • 25 दिसंबर 2018
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11 दिसंबर को जब पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तो छत्तीसगढ़ के नतीजे चुनावी पंडितों को हैरान करने वाले थे. इसलिए नहीं कि वहाँ 15 साल से सत्ता पर काबिज रमन सिंह सरकार परास्त हो गई थी, बल्कि इसलिए कि राज्य में कांग्रेस की ऐसी हवा चलने का उन्होंने अनुमान भी नहीं लगाया था.

कांग्रेस ने 90 सदस्यीय विधानसभा में प्रचंड बहुमत हासिल किया और 68 सीटें जीतीं. बीजेपी सिर्फ़ 15 सीटों पर सिमट कर रह गई.

करीब 38 साल पुरानी पार्टी और 18 साल पुराने राज्य में सबसे अधिक 15 साल तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड रखने वाले रमन सिंह छत्तीसगढ़ में 'चाउर वाले बाबा' के नाम से भी मशहूर हैं. चुनावी विश्लेषक तो ये भी दावा करते रहे हैं कि ग़रीबों को एक रुपये किलो चावल देने की योजना ने रमन सिंह को 2008 में और 2013 में सत्ता तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई थी. तो क्या इस बार उनकी 'इस चावल' योजना में कथित घोटाला ही उनकी कुर्सी गंवाने की एक अहम वजह बना.

सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस में इस कथित घोटाले की जाँच 2015 से ही एंटी करप्शन ब्यूरो कर रहा है और उसने कई कर्मचारियों और अधिकारियों के ख़िलाफ़ मुकदमा भी दर्ज कराया है, लेकिन जाँच की रफ्तार बेहद धीमी रही. हाँ, इस मामले में राजनीति खूब हुई और कांग्रेस ने भाजपा की रमन सिंह सरकार के ख़िलाफ़ इसे प्रमुख हथियार ज़रूर बनाया था.

अब, छत्तीसगढ़ के सामान्य प्रशासन विभाग के संयुक्त सचिव अनिल टुटेजा ने कथित नान घोटाले (नागरिक आपूर्ति निगम) की निष्पक्ष जाँच कराने की मांग की है. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को लिखे पत्र में उन्होंने कहा है कि भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो यानी एसीबी के अधिकारियों को दो साल पहले ही नान मामले से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध करा दिए गए थे, ऐसे में चुनावों से ठीक पहले 5 दिसंबर को कोर्ट में चालान पेश करना दिखाता है इस मामले में जाँच एजेंसी पर राजनीतिक दबाव था.

मुख्यमंत्री बघेल ने नेशनल हेरल्ड को दिए इंटरव्यू में कहा कि सरकार पीडीएस घोटाले की जाँच में तेज़ी लाएगी. इस इंटरव्यू में उन्होंने दावा किया कि इस घोटाले में तो पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह पर भी गड़बड़ी के आरोप हैं.

तो क्या कांग्रेस इस कथित घोटाले की जाँच में पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह पर शिकंजा कसेगी?

रायपुर के स्थानीय पत्रकार अजयभान सिंह कहते हैं, "नान घोटाला कितना बड़ा है या इसमें कितने अधिकारी या राजनेता शामिल हैं, ये तो जाँच के बाद ही सामने आ सकता है, लेकिन भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाने में नान घोटाला, धान घोटाला, चिटफंड और पनामा जैसे घोटालों ने अहम भूमिका निभाई. नागरिक आपूर्ति निगम यानी नान का घोटाला करीब तीन साल पहले सामने आया था. इसे 36 हज़ार करोड़ रुपये का घोटाला बताया जा रहा है और सूबे की राजनीति में कांग्रेस इसे रह-रहकर अपना हथियार बनाती रही है. कई प्रदर्शन भी हुए हैं. अब जब राज्य में कांग्रेस की सरकार है, तो निश्चित रूप से उस पर जाँच का नैतिक दबाव तो है ही."

क्या है कथित नान घोटाला

राज्य में करोड़ों रुपये के इस कथित नागरिक आपूर्ति निगम घोटाले को राशन घोटाला या नान घोटाले के रूप में भी जाना जाता है. मार्च 2015 में नागरिक वितरण प्रणाली में भारी गड़बड़ी होने का पता चला था. इस स्कीम के तहत छत्तीसगढ़ सरकार ग़रीबों को एक रुपये किलो के हिसाब से चावल बांटती है.

दरअसल, राज्य की आर्थिक अपराध शाखा यानी ईओडब्ल्यू और भ्रष्टाचार निवारक ब्यूरो की टीमों ने फ़रवरी 2015 में नागरिक आपूर्ति विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के ठिकानों पर छापेमारी कर साढ़े तीन करोड़ रुपये कैश बरामद करने का दावा किया था और मामले से जुड़े कई अहम दस्तावेज जब्त किए थे.

छापेमारी में रायपुर के नान मुख्यालय की जांच के दौरान कथित तौर पर एक डायरी मिली. जाँच अधिकारियों का कहना है कि इसमें कमीशन लेने वालों के नाम दर्ज हैं. इस डायरी में एक पूर्व मंत्री सहित रमन सिंह की निवर्तमान सरकार में मंत्री रहे दो व्यक्तियों के नामों का उल्लेख भी है. साथ ही कई अधिकारियों और दो अन्य नेताओं से करोड़ों रुपये के लेन-देन का जिक्र है. डायरी में अधिकतर नाम 'कोड वर्ड' में लिखे गए हैं.

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कांग्रेस ने बनाया था हथियार

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने कथित नान घोटाले को रमन सिंह सरकार पर हमले के लिए प्रमुख हथियार बनाया था. बीती 17 नवंबर को छत्तीसगढ़ के कोरिया में एक चुनावी सभा में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि रमन सिंह सरकार के कार्यकाल में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में 36,000 करोड़ रुपये का घोटाला हुआ है. राहुल गांधी ने कहा था, "पीडीएस घोटाले में 36,000 करोड़ रुपये बेइमानी से निकाल लिए गए. एक डायरी भी मिली है, जिसमें इस बात का जिक्र है कि पैसा सीएम मैडम और डॉक्टर साहेब को दिया गया. मैं रमन सिंह से पूछना चाहता हूँ कि ये सीएम मैडम और डॉक्टर साहेब कौन हैं?"

हालाँकि भारतीय जनता पार्टी राहुल गांधी के आरोपों को बेबुनियाद बताती रही है. पुलिस का भी कहना है कि डायरी में जिस 'मैडम सीएम' का जिक्र है वो खाद्य विभाग के किसी अधिकारी की पत्नी हो सकती है.

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ईओडब्ल्यू ने इस मामले में कुल 27 लोगों को अभियुक्त बनाया था और अब तक 17 लोगों को गिरफ्तार किया है. इसके अलावा रमन सिंह सरकार ने दो आईएएस अधिकारियों के ख़िलाफ़ मुकदमा चलाने की अनुमति पिछले साल ही दी. ये अधिकारी हैं अनिल टुटेजा और डॉक्टर आलोक शुक्ला. साल 2015 में जब इस मामले का पता चला था तब ये दोनों अधिकारी नागरिक आपूर्ति निगम यानी नान में क्रमश: चेयरमैन और प्रबंध निदेशक के पदों पर थे.

जानबूझकर देरी?

इस मामले में याचिकाकर्ता और आरटीआई कार्यकर्ता राकेश चौबे ने बीबीसी से कहा कि वो इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट गए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर इसे सुनने से इनकार कर दिया कि पहले इसकी सुनवाई हाईकोर्ट में होनी चाहिए.

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बाद में इस मामले पर बिलासपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई. लेकिन सरकार की ओर से ही छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में शपथपत्र दे कर कहा गया कि ऐसा कोई घोटाला हुआ ही नहीं है.

चौबे आरोप लगाते हैं, "इस मामले की जाँच सही तरीके से नहीं की गई और जानबूझकर जाँच को धीमा किया गया. ईओडब्ल्यू ने 15 जून 2015 को आरोप पत्र दाखिल तो कर दिया लेकिन जाँच का दायरा निचले अधिकारियों तक ही रखा. चेयरमैन और एमडी की भूमिका की जाँच तक नहीं की गई. आईएएस अधिकारियों के ख़िलाफ़ मुकदमा चलाने के लिए मंज़ूरी केंद्रीय कार्मिक विभाग से लेनी होती है, लेकिन राज्य सरकार ने इसमें भी देरी की और इन अधिकारियों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दाखिल करने में दो साल का समय लग गया."

ईओडब्ल्यू ने 30 नवंबर 2018 को इस मामले में कोर्ट में सप्लिमेंट्री चार्जशीट दाखिल की और इस चार्जशीट में अनिल टुटेजा और आलोक शुक्ला के नाम शामिल किए गए थे. इन दोनों ने अग्रिम ज़मानत के लिए निचली अदालत में अर्जी दाखिल की, लेकिन अदालत ने इन्हें ख़ारिज कर दिया.

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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार आलोक प्रकाश पुतुल कहते हैं, "घोटाले का जिक्र चुनावी रैलियों में जमकर हुआ हो, ऐसा नहीं है. राजनीति में ज़रूर इसका इस्तेमाल हुआ है, लेकिन जनमानस पर इसका बहुत असर हो, ऐसा नहीं लगता. अलबत्ता राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने विपक्ष के नेता और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर ये मुद्दा बार-बार उठाया था और वो कहते रहे थे कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आई तो इस मामले की अलग से जाँच कराएगी."

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ऐसा लगता है कि 66 साल के रमन सिंह यानी 'चाउर वाले बाबा' को इस बात का अंदाज़ा हो गया था कि अब 'चावलों' में बहुत दम नहीं रहा, इसलिए इन चुनावों से ठीक पहले वो 'मोबाइल वाले बाबा' बन गए और महिलाओं और छात्र-छात्राओं को 50 लाख स्मार्टफ़ोन बांटने का ऐलान कर दिया.

आयुर्वेद में बैचलर डिग्री हासिल करने के कारण राज्य में रमन सिंह डॉक्टर साहब के नाम से भी जाने जाते हैं. रमन सिंह अविभाजित मध्य प्रदेश में 1990 में पहली बार विधायक चुने गए थे और इसके बाद 1999 में वो कांग्रेस के दिग्गज मोतीलाल वोरा को राजनांदगांव लोकसभा सीट से शिकस्त देकर सुर्खियों में आए थे. उन्हें 1999 में केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में राज्य मंत्री का ओहदा मिला.

साल 2003 में उन्हें विधानसभा चुनावों के लिए छत्तीसगढ़ भेज दिया गया. हालाँकि उस दौरान तत्कालीन केंद्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव को मुख्यमंत्री का प्रबल दावेदार बताया जा रहा था, लेकिन तभी एक विवादित स्टिंग ऑपरेशन ने जूदेव की दावेदारी खत्म कर दी और बदले घटनाक्रम ने रमन सिंह को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचा दिया.

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