उपेंद्र कुशवाहा के आने से बिहार में कितना ताक़तवर होगा महागठबंधन?: नज़रिया

  • 20 दिसंबर 2018
पटेल अहमद, उपेंद्र कुशवाहा, शरद यादव इमेज कॉपीरइट PTI

बिहार में 2019 लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी पार्टियों ने एकजुट होने की कवायद शुरू कर दी है. गुरुवार को राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा इस महागठबंधन में शामिल हो गए हैं.

यह क्या स्वरूप लेगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तो ज़रूर है कि यह एनडीए के लिए एक झटका तो है ही.

जो वोट एनडीए के पक्ष में थे यदि वो प्रभावित होते हैं तो जाहिर है यह बीजेपी-जेडीयू गठबंधन के लिए नुकसानदेह होगा.

लालू यादव ने उदारता दिखाई ये स्पष्ट नहीं है. सीटों के मामले में जो उनकी बीजेपी-जेडीयू से मांग थी उसमें उन्हें लाभ मिल सकता है लेकिन कुशवाहा ने यह भी कहा कि सीटों का मसला अब उनकी प्राथमिकता में नहीं है. तो नए गठबंधन में उनकी हिस्सेदारी कैसी होगी, यह देखना बाकी है.

कुशवाहा ने कहा कि बीजेपी-जेडीयू के साथ उनका अपमान हो रहा था. कुशवाहा के दबाव वाले बयान और तेवर, दोनों की बीजेपी ने अनदेखी की. 'जाना हो तो जाइये' वाला रुख अपनाया.

इसमें बीजेपी से ज़्यादा जेडीयू और खास कर नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को एनडीए से अलग होने देने में बड़ी भूमिका निभाई. ये भी सोचने वाली बात है कि उनके पार्टी के एमएलए, एमएलसी गठबंधन में नहीं गए हैं.

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Image caption बीजेपी और जेडीयू दोनों दल उपेंद्र कुशवाहा की अनदेखी कर रहे थे

कुशवाहा की स्थिति पहले जैसी नहीं

यह भी समझा जा रहा है कि बिहार में कुशवाहा की पहले जैसी स्थिति नहीं है.

एनडीए में उनको उतना महत्व नहीं दिया गया. चूंकि नीतीश कुमार और उपेंद्र कुशवाहा के बीच तनावपूर्ण संबंध दिखने लगी थी. यह लगता नहीं था कि जेडीयू के बल के आगे कुशवाहा इतने वज़नदार नहीं थे.

बीजेपी को नीतीश कुमार के नाराज़ होने का ख़तरा था. जिस दिन यह घोषणा कर दी थी कि लोकसभा चुनाव में दोनों दल बराबर सीटों पर बिहार में चुनाव में उतरेंगे, उसी दिन लगा था कि ये दोनों दल कुशवाहा की अनदेखी कर रहे हैं.

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महागठबंधन में लाने में किसकी भूमिका

गौर करने वाली बात है कि इस मिलन का आयोजन कॉन्फ्रेंस कांग्रेस के दफ़्तर में आयोजित किया गया. तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में जीत के बाद से महागठबंधन में कांग्रेस का वज़न बढ़ा है, यह दिखने लगा है.

बिहार में पार्टी स्तर पर और राजनीतिक हलके में सभी यह महसूस कर रहे हैं. लेकिन बिहार की बात करें तो कुछ ही साल पहले यहां मरणासन स्थिति में पहुंची कांग्रेस को महागठबंधन ने फिर से उठ खड़े होने और आगे बढ़ने जैसी ताक़त दी थी और यह ताक़त फिर से उसे मिली है.

जीतनराम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा बहुत बड़ी ताक़त लेकर भले ही नहीं जुड़े हैं लेकिन जुड़ कर एक हुए हैं तो एक चुनौती के रूप में यह गठबंधन आएगा. लेकिन, उपेंद्र कुशवाहा की स्थिति उतनी मजबूत नहीं दिख रही है बिहार में कि वो यूपीए की संभावनाओं में उछाल ला देंगे.

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पासवान को अलग नहीं होने देगा एनडीए

यदि रामविलास पासवान की लोजपा नाराज़गी का संकेत देने लगे हैं तो यह बीजेपी के लिए ख़तरे की घंटी ज़रूर है.

जिस रामविलास पासवान के मुखर दबाव ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को केंद्र सरकार से पलटवाया, वहीं अब युवाओं और किसान से जुड़े मुद्दे को उठा कर मोदी सरकार की ही मुश्किलें बढ़ाने लगे हैं.

एससी-एसटी एक्ट के मुद्दे पर ऊंची जाति के लोग पूरे देश में खासे नाराज़ हो गए थे. वो मान रहे थे कि बीजेपी दलित वोट पाने के दबाव में ये कदम उठा रही है.

अब यदि रामविलास पासवान की पार्टी अलग हो जाती है तो यह बीजेपी-जेडीयू के लिए बिहार में बड़ी चुनौती बन जाएगी. उस हालत में उनका प्रत्यक्ष नुकसान दिखेगा.

लिहाजा विचार यह है कि बिहार में एनडीए पासवान की पार्टी को अलग नहीं होने देगा.

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गठबंधन में कौन-कौन?

कुशवाहा के महागठबंधन में शामिल होने के मौके पर वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद यादव, आरजेडी नेता और बिहार में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी, कांग्रेस सांसद अहमद पटेल, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा, कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव और राष्ट्रीय प्रवक्ता शक्ति सिंह गोहिल के साथ ही महागठबंधन में शामिल हुए उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के माधवआनंद यादव, राजेश यादव, सांसद रामकुमार शर्मा भी मौजूद थे.

कुशवाहा ने क्या कहा?

इस मौके पर कुशवाहा ने विपक्षी पार्टियों के महागठबंधन को दिलों का गठबंधन बताते हुए कहा कि सभी दल संविधान को बचाने की लड़ाई लड़ने के लिए एकजुट हुए हैं.

कुशवाहा ने कहा, "एनडीए में मेरा अपमान हो रहा था. ठीक वैसे ही जैसे दूसरे राज्यों में बिहार के लोगों का अपमान होता है."

उन्होंने कहा, "अपना पेट पालने के लिए बिहार या किसी दूसरे प्रदेश के लोग अन्य राज्यों में जाते हैं तो यह अच्छा नहीं है. लोगों में एक भावना थी और नरेंद्र मोदी ने चुनाव के वक्त यह वादा किया था पढ़ाई, दवाई और कमाई के लिए यहां के लोगों को बाहर नहीं जाना होगा लेकिन नौजवान आज भी बड़ी संख्या में बाहर जा रहे हैं. न स्कूल में शिक्षा की व्यवस्था हुई, न ग़रीबों के इलाज का इंतजाम हुआ. सभी मोर्चों पर हमलोगों ने देखा कि वादा तो हुआ लेकिन कथनी और करनी में इतना बड़ा फर्क होगा, उस समय मैंने महसूस नहीं किया था."

उन्होंने कहा, "हालांकि एनडीए में रहते हुए मैंने सोशल जस्टिस हो या बिहार के हित, कभी आवाज़ उठाने में कोताही नहीं की. उनको लगा कि जब साथ रह कर भी कोशिश इसकी ओर से है तो इसकी ताक़त को ही कम क्यों न कर दिया जाए. इसलिए हमारी सीटों की संख्या घटा दी गई. हमारी पार्टी को तोड़ने में लग गए जिसमें उनका साथ दिया नीतीश कुमार ने. हमें कमज़ोर करने की कोशिश की गई ताकि हम बिहार के लोगों की हितों की बात नहीं उठाएं. इसलिए हमने उनका साथ छोड़ दिया."

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Image caption कुशवाहा के आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव और उनके बेटे तेजस्वी यादव के साथ संबंध कैसे होंगे, इस पर भी कयास लगाए जा रहे हैं

'मोदी ने लगाई बिहार की बोली'

इस मौके पर आरजेडी नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा, "जिस प्रकार से मोदी ने देश में तानाशाही ही नहीं बल्कि अपने घटक दलों के साथ तानाशाही रवैया किया है. देश में अघोषित आपातकाल है. देश के सभी संवैधानिक संस्था को बचाने की लड़ाई है."

उन्होंने कहा, "उन्होंने जनता को धोखा देने का काम किया है. कहा था कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिल जाएगा. उन्होंने बिहार की बोली लगाई थी... कि 70 हज़ार दूं कि 80 हज़ार दूं... चलो सवा लाख देता हूं. उन्होंने सिर्फ़ और सिर्फ़ बिहार को ठगने का काम किया और ठेंगा दिखाने का काम किया. बिहार पिछड़ा हुआ प्रदेश है. हमारा मक़सद इसे आगे बढ़ाना है. जब तक बिहार जैसे राज्य तरक्की नहीं करेंगे देश तरक्की नहीं करेगा. हम ऐसा नेता देने के मक़सद से जुटे हैं तो कम ही वादे करे, लेकिन उसे पूरा करे. हम एनडीए के ठगों के गठबंधन को करारा जवाब देने के लिए एकजुट हुए हैं."

कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता शक्ति सिंह गोहिल ने कहा, "यह विचारधारा का मेल है. सही वक्त आएगा तो सीटों का बंटवारा भी बहुत मेल से करेंगे."

2014 के लोकसभा चुनाव में बिहार की 40 सीटों में से 31 एनडीए की झोली में गया था.

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