सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस: सीबीआई कोर्ट में सभी अभियुक्त बरी हुए

  • 21 दिसंबर 2018
सोहराबुद्दीन

सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर केस में मुंबई में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने 22 अभियुक्तों को बरी कर दिया है.

सीबीआई कोर्ट के मुताबिक़, पुलिस वालों पर आरोप साबित नहीं हो पाया है और वह दबाव डलवाकर गवाही नहीं दिला सकते.

सीबीआई के स्पेशल जज एसजे शर्मा ने कहा, ''मैं मारे गए तीन लोगों के परिवार के लिए बुरा महसूस कर रहा हूं, लेकिन लाचार हूं. अदालत सबूतों के आधार पर फ़ैसला करती है. दुर्भाग्य से इस केस में सबूत ग़ायब हैं.''

कोर्ट के फ़ैसले पर सोहराबुद्दीन के भाई रुहाबुद्दीन ने मीडिया से कहा, ''हम फ़ैसले से संतुष्ट नहीं हैं. फ़ैसले के ख़िलाफ़ हम हाईकोर्ट जाएंगे.''

अहमदाबाद में साल 2005 में सोहराबुद्दीन शेख का राजस्थान और गुजरात पुलिस के ज्वाइंट ऑपरेशन में एनकाउंटर कर दिया गया था. साल 2006 में ये केस आगे बढ़ा और सोहराबुद्दीन के साथ रहे तुलसी प्रजापति का भी एनकाउंटर कर दिया गया.

ये केस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. इससे पहले गुजरात सीआईडी और 2010 में सीबीआई इस केस की जांच में शामिल थे.

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सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस: क्या कब हुआ?

साल 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी और इस केस में नाटकीय बदलाव हुए.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से इस केस को सुन रही मुंबई सीबीआई कोर्ट ने अमित शाह सहित इस केस से जुड़े सीनियर पुलिस ऑफिसर और राजनेताओं को ट्रायल से पहले ही बरी कर दिया.

मुंबई कोर्ट के ट्रायल से पहले छोड़े गए 16 अभियुक्तों में नेता, बैंकर, उद्योगपति और अधिकारी शामिल थे.

अब सिर्फ़ पुलिस इंस्पेक्टर, सब इंस्पेक्टर और कॉन्स्टेबल को ही इस केस का सामना करना रह गया था. सीबीआई कोर्ट ने शुक्रवार को सारे अभियुक्तों को बरी कर दिया है.

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सीबीआई कब आई

इस केस में सीबीआई 2010 में दाख़िल हुई, फिर केस में राज्य के नेताओं के नाम अभियुक्तों के तौर पर सामने आने लगे.

इस केस की जांच करने वाले गुजरात सीआईडी के पुलिस इंस्पेक्टर वीएल सोलंकी ने सीबीआई को दिए अपने बयान में तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह का नाम लिया था. सोलंकी ने बताया था कि अमित शाह चाहते थे कि एनकाउंटर की जांच बंद कर दी जाए.

सीबीआई की जांच में बाहर आए तथ्यों के मुताबिक राजस्थान में मार्बल के खदान के मालिक विमल पटनी ने सोहराबुद्दीन शेख की हत्या के लिए गुलाब चंद कटारिया से संपर्क साधा था और दो करोड़ में ये काम अमित शाह के पास आया था.

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तुलसी प्रजापति और कौसरबी की हत्या

सोहराबुद्दीन शेख की हत्या की प्लानिंग पहले से थी. राजस्थान और गुजरात पुलिस ने ज्वाइंट ऑपरेशन के नाम पर इस हत्या को अंजाम दिया था और इसे एनकाउंटर बताया था.

इसके बाद इस केस के अहम गवाह रहे सोहराबुद्दीन के साथी तुलसी प्रजापति सीआईडी को अपना बयान दे पाते, उससे पहले ही उनका भी एनकाउंटर अंबाजी के पास कर दिया गया.

इस केस से किसी तरह का संबंध नहीं रखने वाली सोहराबुद्दीन की बीवी कौसरबी की भी हत्या बाद में कर दी गई.

उनकी हत्या गुजरात आईपीएस अधिकारी डीजी वंजारा के गांव इलोल में की गई थी.

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2014 में कैसे बदली तस्वीर

साल 2014 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन हुआ. नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने. उसके बाद तस्वीर बदल गई. अमित शाह, गुलाब चंद कटारिया, मार्बल किंग विमल पटनी, अहमदाबाद जिला बैंक के अध्यक्ष अजय पटेल और निदेशक यशपाल चुड़ासमा को मुंबई हाईकोर्ट ने सबूतों के आभाव में बरी कर दिया.

बात यहीं खत्म नहीं होती है. सीबीआई की चार्ज़शीट के मुताबिक इसमें मुख्य भूमिका निभाने वाले गुजरात के आईपीएस अधिकारी अभय चुड़ासमा, नरेंद्र अमीन, डीजी वंजारा, विपुल अग्रवाल, राजस्थान के आईपीएस अधिकारी दिनेश एमएन को भी सबूतों के आभाव में बरी कर दिया था.

इस केस में सीधे तौर पर जुड़े हुए गुजरात के आईपीएस अधिकारी राजकुमार पांडियन को सबूतों के आभाव और उन्हें आरोपी बनाने की इजाजत सरकार से नहीं लेने के चलते केस से बरी कर दिया.

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केस को नुकसान कैसे हुआ

सीबीआई का आरोप था कि जब ये केस गुजरात सीआईडी के पास था, तब गुजरात के तत्कालीन डीजीपी प्रशांत चंद्र पांडे और तत्कालीन जांच अधिकारी आईपीएस गीता जौहरी और ओपी माथुर ने गुमराह करने का काम किया.

हालांकि बंबई हाई कोर्ट ने इन पुलिस अधिकारियों के सामने कार्रवाई करने से पहले सीआरपीसी 197 की राज्य सरकार की मंजूरी के बिना आरोप लगाए जाने का कारण देखकर उन्हें भी छोड़ दिया.

इस ट्रायल के शुरू होने से पहले ही सभी बड़े नाम इससे बरी हो चुके थे. बाकी बचे गुजरात और राजस्थान पुलिस के छोटे कर्मचारियों को अब कोर्ट कसूरबार ठहराती है या नहीं, उसपे नज़र रहेगी.

इसका अर्थ ये भी है कि तीन-तीन लोगों की हत्या का निर्णय करने वाले और उसे अंजाम देने वाले गुजरात और राजस्थान के छोटे अधिकारी ही थे.

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गवाह कैसे अपने बयान से पलटे

सोहराबुद्दीन केस सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सीबीआई को सौंपा गया था. सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में यह मांग की थी कि इस केस की सुनवाई गुजरात के बाहर की जाए.

कोर्ट ने इसकी मंजूरी दी और मुंबई में केस ट्रांसफ़र कर दिया गया. इस केस में कुल 38 लोगों के ख़िलाफ़ चार्ज़शीट दाखि़ल की गई थी.

साल 2014 में अमित शाह, गुलाब चंद कटारिया, गुजरात और राजस्थान के सीनियर आईपीएस सहित कुल 15 लोगों को सबूतों के आभाव में बरी कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई ने जब केस ट्रांसफ़र करने की मांग की थी, तब दलील दी थी कि गवाहों पर दबाव न डाला जाए और वे पलट न जाए, इसके लिए केस की सुनवाई गुजरात से बाहर होनी चाहिए.

लेकिन मुंबई सीबीआई कोर्ट में प्रस्तुत हुए 45 गवाहों में से 38 अपने बयान से पलट गए थे. इन सभी गवाहों ने कोर्ट में दिए अपने बयान में कहा था कि सीबीआई के लिखे गए उनके बयान के बारे में वो कुछ नहीं जानते.

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