गेम ऑफ़ थ्रोन्स की तरह अनसुलझा है सोहराबुद्दीन केस

  • 22 दिसंबर 2018
Image caption सोहराबुद्दीन शेख़ और उनकी पत्नी कौसर बी

सीबीआई की एक विशेष अदालत ने गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख और उनकी पत्नी कौसर बी के कथित फ़र्जी मुठभेड़ मामले में शामिल सभी 22 अभियुक्तों को बरी कर दिया है.

इसके अलावा इन सभी अभियुक्तों को सोहराबुद्दीन के साथी तुलसीराम प्रजापति के कथित मुठभेड़ में शामिल होने से भी बरी कर दिया गया है.

इस मामले में इतने उतार-चढ़ाव और राजनीतिक पक्ष विपक्ष देखने को मिले कि इस पूरे मामले को लोकप्रिय वेब सिरीज़ गेम्स ऑफ़ थ्रॉन्स जैसा कहा जा सकता है.

जिस तरह गेम्स ऑफ़ थ्रॉन्स में किसी को नहीं मालूम होता कि कौन सा किरदार किस पाले में खड़ा है और आगे क्या होने वाला है, ऐसी ही कुछ हाल इस मामले का भी रहा.

क्या है मामला

यह मामला 22 नवंबर 2005 को शुरू हुआ, जब गुजरात के निवासी सोहराबुद्दीन उनकी पत्नी कौसर बी और उनके साथी तुलसीराम प्रजापति को हैदराबाद से सांगली जाते समय रास्ते में पुलिस ने अपनी हिरासत में ले लिया.

सोहराबुद्दीन और कौसर को अहमदाबाद के एक फ़ार्म हाउस में ले जाया गया जहां 26 नवंबर को सोहराबुद्दीन की कथित फ़र्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई.

इस फ़र्जी मुठभेड़ के पीछे गुजरात और राजस्थान पुलिस की साझा टीम को ज़िम्मेदार बताया गया.

इस कथित फ़र्जी मुठभेड़ के सामने आने के बाद एक तरह का राजनीतिक विवाद शुरू हो गया, इस विवाद को कई लोग राजनीतिक प्रोपेगैंडा भी बताते हैं.

इस पूरे विवाद की जड़ में राष्ट्रीयता और राष्ट्रभक्ति को रखा गया.

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राष्ट्रवाद का चश्मा

मुठभेड़ को सही बतलाने के लिए सोहराबुद्दीन को एक राष्ट्रविरोधी व्यक्ति के तौर पर पेश किया गया, सोहराबुद्दीन की छवि एक ऐसे चरमपंथी के तौर पर गढ़ी गई जो देश की शांति और सुरक्षा के लिए बड़ा ख़तरा था.

राजनीतिक तौर पर यह राष्ट्रभक्ति के नाम पर राजनीति चमकाने की पहली कोशिश के तौर पर उठाया गया कदम माना जा सकता है.

आज के दौर में इस तरह की राजनीति का अच्छा उदाहरण देख रहे हैं और उसके नतीजे भी भुगत रहे हैं.

सोहराबुद्दीन के परिवार ने इस मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, जिसके साथ ही कई तरह के राज़ से पर्दा उठने लगा.

इस मामले में सबसे बड़ा नाम सामने आया मौजूदा वक्त में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और गुलाब चंद कटारिया का.

इनके अलावा गुजरात और राजस्थान पुलिस के कांस्टेबल से लेकर आईपीएस अधिकारी पद तक के लोग इस मामले में लिप्त पाए गए.

आईपीएस अधिकारी एम एन दिनेश, राजकुमार पंडियन और डीजी वंज़ारा सहित गुजरात के पूर्व गृह मंत्री अमति शाह तक को इस मामले में गिरफ़्तारियां देनी पड़ीं.

इन गिरफ़्तारियों के दौरान राजनीति की ज़मीन पर राष्ट्रीयता का खेल ज़बरदस्त तरीके से खेला जाता रहा.

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कई अनसुलझे सवाल

यहां तक कहा गया कि अगर यह मुठभेड़ फ़र्जी भी थी तो क्या फर्क पड़ता है?

सवाल उठाए गए कि क्या सोहराबुद्दीन और उनके साथी तुलसी प्रजापति जैसे राष्ट्रविरोधी को मारना गलत है?

इस राजनीति ज़मीन पर कई चुनाव लड़े गए और जीते और हारे भी गए.

इसके बाद दिसंबर 2014 में मुंबई में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने अमित शाह को इस मामले में बरी कर दिया.

इसके अलावा गुलाब चंद कटारिया और कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों सहित कुल 14 अभियुक्तों को भी दोषमुक्त करार दिया गया.

अब इस मामले में शामिल सभी 22 अभियुक्त आरोपमुक्त हो चुके हैं.

22 नवंबर 2005 में जब यह मामला शुरू हुआ तब अमित शाह गुजरात के गृह मंत्री थे और नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्री. उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी.

मौजूदा वक़्त में अमित शाह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री और केंद्र में बीजेपी की सरकार है.

राष्ट्र से जुड़े किसी भी राजनीतिक सवाल का जवाब हमेशा एक शब्द के साथ ही बंद कर दिया जाता है और वह शब्द है 'राष्ट्रीयता'.

लेकिन सोहराबुद्दीन मामले की पूरी टाइमलाइन ऐसे कई सवाल अपने पीछे छोड़ जाती है जिनके जवाब आज तक नहीं मिले.

ये सवाल हैं, सोहराबुद्दीन और उनकी पत्नी कौसर बी की हत्या किसने की? तुलसीराम प्रजापति को किसने मारा? और इन हत्याओं का मकसद क्या था?

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कब-कब क्या हुआ? (टाइमलाइन)

22 नवंबर 2005- गुजरात पुलिस ने सोहराबुद्दीन शेख़ और उनकी पत्नी कौसरबी सहित एक अन्य व्यक्ति को तंडोला के नज़दीक एक बस से हिरासत में लिया.

26 नवंबर 2005- नरोल-विशाल रोड पर गुजरात एटीएस और राजस्थान एसटीएफ़ ने मिलकर सोहराबुद्दीन को एक शूटआउट में मार गिराया.

29 नवंबर 2005- उत्तरी गुजरात के इलोल गांव के पास कौसरबी की कथित तौर पर हत्या की गई और उनके शरीर को आग लगा दी गई.

9 दिसंबर 2005- सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन शेख़ ने कौसरबी हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की.

18 मई 2006- तुलसीराम प्रजापति ने एनएचआरसी को एक ख़त लिखा जिसमें उन्होंने गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र पुलिस पर उनकी हत्या की साजिश रचने की बात रखी.

4 जुलाई 2006- सीआईडी ने मुठभेड़ की तहकीकात करनी शुरू की.

28 दिसंबर 2006- अम्बाजी के नज़दीक एक मुठभेड़ में तुलसीराम प्रजापति की मौत हो गई.

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Image caption डीजी वंज़ारा

23 मार्च 2007- रुबाब के वकील ने सीबीआई जांच की मांग की, गुजरात पुलिस को चार हफ्तों का वक़्त दिया गया.

24 अप्रैल 2007- डीआईजी डीजी वंज़ारा, एसपी राजकुमार पंडियन और राजस्थान के एसपी दिनेश एमएन को गिरफ़्तार किया गया.

1 अप्रैल 2008- गुजरात हाईकोर्ट ने चश्मदीद पुलिस इंस्पेक्टर वीए राठौड़ को आरोपी मामने का आदेश दिया.

5 सितंबर 2008- रुबाब की अपील पर ट्रायल कोर्ट ने आगे जांच के आदेश दिए.

25 सितंबर 2008- हाईकोर्ट ने सभी अभियुक्त पुलिसकर्मियों की ज़मानत याचिका खारिज की.

30 सितंबर 2008- ट्रायल कोर्ट को इस मामले में आरोप तय करने थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल पर रोक का आदेश दे दिया.

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12 जनवरी 2010- सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन मामले की जांच सीबीआई को सौंपी

मई 2010- सीआईडी ने तुलसीराम मुठभेड़ मामले में आईपीएस अधिकारी विपुल अग्रवाल को गिरफ़्तार किया.

7 जुलाई 2010- सीआईडी ने तुलसीराम मुठभेड़ मामले में वंज़ारा और दिनेश एम एन को गिरफ़्तार किया.

23 जुलाई 2010- सीबीआई ने पुलिस के बड़े अधिकारियों और गुजरात के गृह मंत्री अमित शाह के ख़िलाफ़ चार्ज शीट दायर की.

25 जुलाई 2010- अमित शाह को गिरफ़्तार किया गया.

29 अक्टूबर 2010- अमित शाह को ज़मानत मिली.

8 अप्रैल 2011- सुप्रीम कोर्ट ने तुलसीराम मुठभेड़ मामले की जांच भी सीबीआई को सौंपी.

8 अप्रैल 2012- सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन मुठभेड़ और तुलसीराम मुठभेड़ को एकसाथ जोड़ दिया.

27 सितंबर 2012- सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई मुंबई ट्रांसफ़र की.

30 दिसंबर 2014- सीबीआई अदालत ने अमित शाह को सभी आरोपों से दोषमुक्त करार दिया.

नवंबर 2015- रुबाबुद्दीन ने अमित शाह को दोषमुक्त करार देने के ख़िलाफ़ बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी, बाद में उन्होंने अपनी अपील वापस ले ली.

दिसंबर 2015- सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर अमित शाह मामले को दोबारा हाईकोर्ट में ले गए.

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अप्रैल 2016- बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंदर की अपील खारिज की.

25 अगस्त 2016- सीबीआई कोर्ट ने पंडियन को बरी किया.

1 अगस्त 2017- सीबीआई कोर्ट ने वंज़ारा को बरी किया.

24 अक्टूबर 2017- मुंबई की सीबीआई अदालत ने 22 लोगों के ख़िलाफ़ आरोप तय किए.

10 सितंबर 2018- बॉम्बे हाईकोर्ट ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों डीजी वंज़ारा, राजकुमरा पंडियन, एनके अमीन, विपुल अग्रवाल, दिनेश एमएन और दलपत सिंह राठौड़ को बरी करने के आदेश को कायम रखा.

5 दिसंबर 2018- सीबीआई अदालत ने मामले की सुनवाई बंद की.

21 दिसंबर 2018- सीबीआई अदालत ने सभी 22 अभियुक्त को मामले से बरी किया.

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