चीन को उसी की रणनीति से घेर सकता है भारत: नज़रिया

  • 24 दिसंबर 2018
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ज़्यादातर और यहां तक कि ताकतवर देशों का भी सोचना है कि चीन की उस मंशा पर लगाम कसने की आवश्यकता है, जिसमें चीन स्वयं को अमरीका की जगह दुनिया के सबसे ताकतवर देश के रूप में स्थापित करना चाहता है.

अमरीकी विदेश विभाग के नीति निर्धारण विभाग के पूर्व प्रमुख रिचर्ड हास ने लिखा है कि ऐसा संबंधों के "प्रबंधन" के ज़रिए हो सकता है.

भारत सरकार के लिए ये कोई नई बात नहीं है जो साल 1962 में हिमालय में हुए युद्ध में करारी शिकस्त झेलने के बाद से अपने पड़ोसी देश के साथ संबंधों का प्रबंधन कर रहा है.

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इस युद्ध के बाद दिल्ली ने "हिन्दी-चीनी भाई भाई" नारे को तिलांजलि दे दी थी. आज़ादी के बाद ये वो राग था, जिसे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एशियाई मामलों को प्रोत्साहन देने के लिए भारत-चीन के मधुर संबंधों के रूप में अलापते रहे थे.

लेकिन समय बीतने के साथ संबंधों का प्रबंधन कष्टदायक होता जा रहा है क्योंकि चीन ने रणनीतिक रूप से अपनी योजनाओं को मज़बूत किया है. वो अपनी नीतियों और क्रियाकलापों में लचीलापन रखता है.

उसके पास दोस्त बनाने और लक्षित देशों को प्रभावित करने के लिए भारी संसाधन भी हैं. इनके दम पर वो लगातार आगे बढ़ रहा है.

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क्या है चीन की रणनीति

हिन्द महासागर क्षेत्र तथा एशिया के तटीय देशों का समूह लगातार चीन की ताकत को बढ़ने से रोकने की कोशिश कर रहा है. इनमें जो कमज़ोर देश हैं, उनके लिए चीन की मदद और उससे आसान शर्तों पर मिलने वाले क़र्ज के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण की लुभावनी पेशकश से बच पाना मुश्किल है.

ये उच्च स्तरीय "कर्ज़ आधारित कूटनीति" है और इस मामले में हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में कोई भी देश चीन की बराबरी नहीं कर सकता. यहां तक कि जापान और भारत भी नहीं.

एक रास्ता तो श्रीलंका ने श्रीलंका ने हम्बनटोटा बंदरगाह को लेकर तलाश किया है. उच्च लागत वाली परियोजना के कारण पैदा होने वाली परेशानियां दूर करने के लिए उसने कर्ज़ चुकाया और चीन की कम्पनी के साथ 99 वर्षों का पट्टा समाप्त कर दिया.

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Image caption सांकेतिक तस्वीर

ये सबक महत्त्वपूर्ण है और इसे जल्द अपनाया भी गया. इसका अनुसरण करते हुए म्यांमार, मलेशिया और थाईलैंड ने चीन के कर्ज़ से चलनेवाली परियोजनाएं या तो समाप्त कर दी हैं या फिर कम कर दी हैं. यहां तक कि पाकिस्तान में, जो संभावित चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर को अपने लिए महत्वपूर्ण मान रहा था, ज़्यादा से ज़्यादा लोग उस कर्ज़ को सशंकित रूप से देख रहे हैं, जिसमें उनका देश फंस सकता है.

अपना प्रभुत्व जमाने के लिए चीन आर्थिक के अलावा सामरिक उद्देश्यों की पूर्ति पर भी ध्यान देता है जिसे चीन के रणनीतिकार "मलक्का डिलेमा" कहते हैं.

हिन्द महासागर के रास्ते होने वाले उसके 80% व्यापार की सुरक्षा आवश्यक है. यह रास्ता मलक्का, लम्बोक और सुन्डा जलडमरूमध्यों के "चेकप्वाइंट्स" से होकर जाता है. इसे देश के पूर्वी तटों पर और अंडमान निकोबार द्वीपसमूह में स्थित भारतीय नौसेना का एकीकृत कमांड प्रभावशाली तरीके से नियंत्रित करता है.

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ऐसे में चीन का बंदरगाहों और समुद्री ठिकानों की तलाश में लगे रहना जगज़ाहिर है. यह समस्या का वास्तविक समाधान तो नहीं है मगर उसकी समस्या को कुछ तो कम ज़रूर कर सकता है.

इसीलिए चीन ने उत्तर-दक्षिणी रोड और रेल परियोजनाओं में निवेश किया है ताकि म्यांमार में बंगाल की खाड़ी स्थित चॉकप्यू और पाकिस्तान के अरब सागर में ग्वादर में सालों भर उसे बंदरगाह उपलब्ध हों.

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कैसे रोका जा सकता है चीन को?

तो चीन के विशाल बवंडर को अगर रोका नहीं जा सकता तो उसका प्रभाव कम करने के लिए क्या किया जा सकता है?

दरअसल सैन्य रोकथाम ही इसका समाधान है. भारत समेत अन्य तटीय तथा दूरस्थ देशों को एक साथ सुरक्षा गुट बनाकर मज़बूत रणनीति विकसित करनी होगी.

भारत की सैन्य पहुंच ओमान के दुक़म, अफ्रीका स्थित जिबूती में फ्रांसिसी बेस 'हेरॉन', सेशेल्स, मालदीव और श्रीलंका के त्रिंकोमाली तक है. अब भारतीय नौसेना को सुमात्रा के बंदरगाह सबांग और मध्य वियतनाम स्थित ना थरांग में मज़बूत होने की आवश्यकता है.

वियतनाम ने इस बंदरगाह के भारतीय नौसेना द्वारा इस्तेमाल के लिए मदद देने की पेशकश की है. इसके साथ संयुक्त रूप से इलेक्ट्रॉनिक इंटेलिजेंस एकत्र करने का स्टेशन विकसित करने का प्रस्ताव भी रखा है ताकि हैनान द्वीप पर चीनी नौसेना के मुख्य ठिकाने सान्या पर नज़र रखी जा सके.

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सैनिक ठिकानों की इस श्रृंखला को मेज़बान, स्थानीय और क्षेत्रीय नौसेना के साथ मिलकर नियमित तथा कठिन अभ्यास के ज़रिये सशक्त करने की आवश्यकता है ताकि बीजिंग को स्पष्ट संदेश जाए कि वो तीनों जलडमरूमध्यों के दोनों ओर कितनी भी ताकत इकट्ठा क्यों ना कर ले, उसे परेशानियों का सामना करना ही पड़ेगा.

भारत को ब्रह्मोस क्रूज़ मिसाइल वियतनाम और इसकी चाहत रखनेवाले अन्य देशों को भी भारी संख्या में प्रदान करने को प्राथमिकता देनी होगी. निश्चित रूप से इससे चीन के दक्षिणी सागर बेड़े और हिन्द महासागर में गोपनीय "चौथे" बेड़े पर लगाम कस सकेगा.

इससे उन देशों के आत्मविश्वास में भी बढ़ोतरी होगी जो दक्षिणी चीन सागर में चीन के एकाधिकार का विरोध कर रहे हैं और अभी तक ऐसे सामरिक गठबंधन का अभाव महसूस कर रहे थे.

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ये आपसी सहयोग पर आधारित नौसैनिक रणनीति है, जो भारत सरकार की "थियेटर स्विचिंग" रणनीति की तुलना में बेहतर है. भारत की थियेटर स्विचिंग रणनीति स्पष्ट रूप से अस्थिर है. मगर नई रणनीति अपनाने से 4,700 किलोमीटर लंबी ज़मीनी सीमा और तथाकथित वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन का वर्चस्व कम हो जाएगा.

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भारत को बदलनी होगी रणनीति

दरअसल बीजिंग मानता है कि वह भारत की नौसेना और थल सेना पर एक साथ हावी हो सकता है. उसे लगता है कि वह ज़रूरत पड़ने पर ज़रूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करके सुदूर हवाई पट्टियों को स्थायी अड्डों में तब्दील कर सकता है और तिब्बत में अपनी वायुसेना और मिसाइलों की तैनाती बढ़ा सकता है.

इसके जवाब में भारत के पास कुछ भी सही नहीं है. ये पहाड़ों पर आक्रमण करने वाली इकलौती टुकड़ी विकसित कर रहा है जिसे हल्के टैंकों के बजाय मैदानी इलाकों के आधार पर आक्रमण करने में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियां दी जा रही हैं.

वहीं इस मामले में डोनल्ड ट्रंप की अगुवाई वाले अमेरिका पर विश्वास नहीं किया जा सकता. सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सेना की अचानक वापसी और जनरल जेम्स मैटिस की पेंटागन से अचानक रवानगी ने नरेन्द्र मोदी सरकार और उन एशियाई सरकारों को दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है जिन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर अमरीका पर भरोसा था.

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ट्रंप ने नेटो का दर्जा घटाया, दक्षिणी कोरिया के साथ सैन्य सहयोग कम किया और वह बिना नोटिस दिए अमेरिका के दोस्तों और सहयोगियों के हितों की अनदेखी करने पर उतारू हैं. यह सब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की चाहत के अनुरूप ही हो रहा है. साल 1947 के बाद से दोस्तों और सहयोगी लोकतांत्रिक देशों के साथ अमेरिका के संबंध न्यूनतम स्तर पर है और उसपर भरोसा नहीं किया जा सकता.

भारत सरकार भूल जाती है कि कैसे हाल ही में सार्वजनिक किए गए उन गोपनीय दस्तावेज़ों से पता चलता है कि 70 के दशक के अंतिम दौर में राष्ट्रपति जिमी कार्टर की डेमोक्रेट सरकार ने चीनी नेता डेंग शाओपिंग की इस सलाह को मान लिया था, कि क्षेत्र में स्थिरता के लिए, और अफ़ग़ानिस्तान को रूसी कब्ज़े से मुक्त कराने में पाकिस्तान से मदद लेने के बदले में, अमरीका को चीन को ये इजाज़त दे देनी चाहिए कि वो पाकिस्तान को परमाणु हथियारों से लैस करे.

कार्टर के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ज़्बिगनियव ब्रेज़िंस्की की ख़ैबर दर्रे पर एके-47 के साथ खिंचवाई गई तस्वीर याद है?

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