बिहार में बीजेपी क्यों मजबूर नज़र आ रही है: नज़रिया

  • 24 दिसंबर 2018
पटना में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इमेज कॉपीरइट Twitter/@AmitShah
Image caption पटना में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह

आगामी लोकसभा चुनाव के लिए बिहार से सीटों के बँटवारे में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की जो तस्वीर उभरी है, उसमें भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) मज़बूत नहीं, मजबूर नज़र आती है.

बीजेपी ने यहाँ के दोनों सहयोगी दलों - जनता दल युनाइटेड (जेडीयू) और लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) को अपने साथ बनाए रखने की ख़ातिर अप्रत्याशित समझौते किये हैं.

चूँकि नीतीश कुमार जेडीयू के लिए सत्रह सीटों पर और रामविलास पासवान एलजेपी के लिए छह सीटों पर दावेदारी झटकने में कामयाब हो गए, इसलिए बीजेपी को अपनी जीती हुई पाँच सीटों पर दावा छोड़ना पड़ा.

याद रहे कि गत चुनाव में बिहार से लोकसभा की कुल चालीस सीटों में से मात्र दो पर जेडीयू, सात पर एलजेपी और बाइस पर बीजेपी को जीत मिली थी.

ऐसे में बाइस की जगह सत्रह सीटों पर चुनाव लड़ने की विवशता में फँसी बीजेपी का कमज़ोर दिखना स्वाभाविक है.

साथ ही सीटों के बँटवारे को लेकर एनडीए के घटक दलों के बीच हुई खींचतान में एक सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा का गठबंधन से अलग हो जाना भी बीजेपी को झटका दे गया.

इसी बीच रामविलास पासवान के पुत्र चिराग़ पासवान भी बीजेपी नेतृत्व को बाग़ी तेवर दिखाने लगे, ताकि लोकसभा की छह सीटों पर उनकी दावेदारी और रामविलास पासवान के लिए राज्यसभा की सीट सुनिश्चित हो जाए.

यही हुआ भी. राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के उपेंद्र कुशवाहा का दबाव तो काम नहीं कर सका, लेकिन रामविलास पासवान के दलित वोट वाले दबाव ने असर दिखा दिया.

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ऐसा इसलिए भी संभव हुआ, क्योंकि उपेंद्र कुशवाहा के प्रति गरम रहने वाले नीतीश कुमार रामविलास पासवान के लिए नरम रहे.

दूसरी तरफ़ बीजेपी क़तई नहीं चाहती थी कि उसके प्रति दलितों के समर्थन की गुंजाइश घट जाने जैसी स्थिति उत्पन्न हो.

हालाँकि बिहार में उभरती चुनौती से एलजेपी आशंकित ज़रूर है, लेकिन बीजेपी-जेडीयू से अलग हो कर आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन में मनोनुकूल जगह बना लेने जैसी कोई स्पष्ट संभावना भी उसे नहीं दिख रही होगी.

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लगता है इसबार सियासी 'मौसम विज्ञानी' रामविलास दुविधा में फँस गये, क्योंकि हार जैसी मुसीबत की घड़ी में कम-से-कम राज्यसभा की एक सीट पर उन्हें बिठाने की गारंटी तो बीजेपी दे ही रही है.

यहाँ भी बीजेपी की विवशता इतनी बढ़ी हुई थी कि उसे केंद्र सरकार के प्रति चिराग़ पासवान की सख़्त बयानबाज़ी बर्दाश्त करनी पड़ी.

एलजेपी नेताओं ने यहाँ तक कह दिया कि केंद्र की तरफ़ से युवाओं और किसानों के हित में कारगर क़दम नहीं उठाये जा रहे.

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दूसरी तरफ़ धमकाया भी कि सीटों का बँटवारा शीघ्र और सम्मानजनक नहीं हुआ तो एलजेपी उचित रास्ता अपनाने को बाध्य होगी.

कुछ माह पूर्व जेडीयू ने भी बीजेपी को अपने कड़े तेवर दिखाने शुरू कर दिये थे, जब उसके लिए अगले लोकसभा चुनाव में दस से ज़्यादा सीटें नहीं छोड़ने की चर्चा ज़ोर पकड़ने लगी थी.

लेकिन नीतीश कुमार ने अपने आक्रामक रुख़ से ऐसी हवा बनाई कि अमित शाह ने उन्हें अगले लोकसभा चुनाव में बराबरी का हिस्सेदार घोषित कर दिया.

वैसे, थोड़ी गहराई में उतर कर देखें तो बीजेपी ने बिहार में आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन की तरफ़ से उभरती चुनौती को भाँप कर ही अपनी दावेदारी घटाई.

जेडीयू के लिए सत्रह सीटें छोड़ने के पीछे बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की रणनीति में ख़ासकर दो पहलू साफ़ नज़र आते हैं.

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पहला ये कि एनडीए में जेडीयू जैसे वज़नदार सहयोगी का शामिल रहना, या कहें कि नीतीश कुमार को किसी विरोधी ख़ेमे का हिस्सा बनने से रोके रखना.

दूसरी बात कि बिहार में नीतीश कुमार से जुड़ी बहुआयामी ताक़तों को साथ लेकर ही यहाँ यादव-मुस्लिम के मुख्य जनाधार वाले महागठबंधन से मुक़ाबले में टिकना बीजेपी को संभव लगा.

इसी तरह मतदाताओं की बड़ी तादाद वाले पासवान समाज का समर्थन खो देने के भय से एलजेपी को साथ रखना भी बीजेपी की मजबूरी बना.

दरअसल मोदी सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाने में जुटे विपक्ष की सफलता से बीजेपी के सहयोगी दल भी उत्साहित होते रहे हैं. इसे वो अपनी बातें मनवाने का सही मौक़ा समझते हैं..

इसका ताज़ा उदाहरण बना है हाल ही तीन राज्यों में बीजेपी की हार के बाद एलजेपी की तरफ़ से बीजेपी पर बढ़ाया गया दबाव.

कुछ लोग यह भी समझते हैं कि बदले हालात में बीजेपी अपनी औक़ात से बाहर जा कर वर्चस्व दिखाती, तो बात और बिगड़ जाती.

शायद यही वजह है कि बीजेपी अपनी इस रणनीति को मजबूरी नहीं, व्यावहारिक बताती है. लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि इससे बीजेपी कार्यकर्ताओं का मनोबल घटा है.

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उधर मोदी सरकार से ही नहीं, राज्य की नीतीश सरकार से भी मोहभंग की चर्चा बिहार के गाँवों में ख़ूब हो रही है. और दिलचस्प ये भी है कि आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन का भी विकल्प उन्हें क़बूल नहीं.

ख़ासकर जो मतदाता जातीय दायरे में बंद नहीं हैं और महँगाई, भ्रष्टाचार, अपराध जैसी समस्याओं पर सचमुच उबलते हैं, उन्हें अब किसी सियासी गठबंधनों पर भरोसा नहीं रह गया है.

लेकिन फिर वही सवाल कि इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है !?

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