ममता बनर्जी की चुनावी नैया के लिए कितना बड़ा ख़तरा है चिटफंड घोटाला?

  • 24 दिसंबर 2018
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पश्चिम बंगाल की राजनीति में चिटफंड घोटाला राजनीतिक सुनामी बनता जा रहा है. बीते लगभग छह सालों के दौरान थोड़े-थोड़े अंतराल पर उठने वाली इस सुनामी की लहरें राजनीति और पत्रकारिता के क्षेत्र के बड़े-बड़े दिग्गजों को धराशायी करती रही हैं.

राज्य की ममता बनर्जी सरकार और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के बीच लगातार बढ़ती कड़वाहट का भी इस सुनामी की लहरों से सीधा संबंध नजर आता है.

तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी समेत तमाम दिग्गज नेता शुरू से ही केंद्र पर सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) समेत तमाम एजेंसियों को सरकार के ख़िलाफ़ राजनीतिक हथियार बनाने के आरोप लगाते रहे हैं.

अब ताजा मामले में इस सुनामी ने एक दिग्गज पत्रकार और संपादक को अपनी चपेट में ले लिया है. तृणमूल कांग्रेस सरकार लाख कोशिशों के बावजूद इन चिटफंड घोटालों और नारदा स्टिंग के कलंक से पीछा नहीं छुड़ा सकी है.

वैसे, विपक्ष की तमाम कोशिशों के बावजूद चुनावों पर इस घोटाले का अब तक तो कोई असर नहीं हो सका है. लेकिन इससे ममता के कई सारथी तो शहीद हो गए हैं. अब अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले इन सुनामी की लहरों के और तेज़ होने का अंदेशा है.

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Image caption सुमन भट्टाचार्य पर चिटफंड कंपनी आई-कोर समूह से पैसे लेने के आरोप हैं

ताज़ा मामला

अप्रैल, 2013 में शारदा को जेल की रोटियां तोड़नी पड़ी हैं या फिर सीबीआई के दफ्तर के चक्कर काटने पड़े हैं.

इससे आजिज आकर सांसद और ममता के दाहिने हाथ रहे मुकुल राय ने जहां पार्टी बदल ली, वहीं एक अन्य राज्यसभा सदस्य सृंजय बसु ने तो राजनीति को ही अलविदा कह दिया.

अब ताज़ा मामले में बीते सप्ताह सीबीआई ने राज्य के एक वरिष्ठ पत्रकार और आनंद बाज़ार समूह के अलावा टाइम्स समूह के बांग्ला दैनिक के संपादक रहे सुमन भट्टाचार्य को गिरफ्तार कर लिया है.

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Image caption पत्रकार-संपादक कुणाल घोष (हरी शर्ट में) के कार्यालय में जांच करती पुलिस

उन पर एक चिटफंड कंपनी आई-कोर समूह से पैसे लेने का आरोप है. उनसे पहले एक अन्य पत्रकार-संपादक कुणाल घोष को भी शारदा समूह के चिटफंड घोटाले के सिलसिले में कई साल जेल की सजा काटनी पड़ी थी.

अप्रैल, 2013 में शारदा समूह के चिटपंड घोटाले के खुलासे ने बंगाल की राजनीति में भूचाल पैदा कर दिया था. इस घोटाले में तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं की हिस्सेदारी के आरोप सामने आने के बाद विपक्षी दलों ने जहां महज दो साल पुरानी ममता सरकार पर हमले तेज कर दिए थे, वहीं पूरे राज्य में ठगे गए हजारों निवेशक भी सड़कों पर उतर आए थे.

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Image caption सुदीप बंद्योपाध्याय रोज़ वैली चिटफंड घोटाले में गिरफ़्तार हुए थे

निवेशकों और एजंटों समेत लगभग एक दर्जन लोगों ने तो अपनी गाढ़ी कमाई डूब जाने के गम में आत्महत्या तक कर ली थी. राज्य सरकार ने शारदा समूह के घोटाले की जांच के लिए विशेष जांच आयोग तो बनाया ही, जांच आयोग का भी गठन कर दिया था.

उस समय ममता ने निवेशकों के ठगे जाने पर दुख जताते हुए मौजूदा हालात के लिए वाम मोर्चा सरकार और केंद्र को जिम्मेदार ठहराया था. उनका आरोप था कि विपक्ष इस घटना के बहाने उनकी और राज्य सरकार की छवि खराब करने का प्रयास कर रहा है.

ममता के मुताबिक, चिटफंड कंपनियों पर अंकुश लगाने के लिए पूर्व सरकार ने जो अध्यादेश पारित किया था उसमें कई खामियां थीं. तृणमूल कांग्रेस प्रमुख शुरू से ही कहती रही हैं कि केंद्र सरकार राजनीतिक हितों के लिए केंद्रीय एजंसियों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है.

शारदा समूह के घोटाले के खुलासे के बाद ही चिटफंड का बुलबुला तेज़ी से फूटने लगा और रोजवैली समेत कई समूहों के घोटाले सामने आने लगे. राज्य सरकार की जांच टीम ने शारदा समूह के प्रमुख सुदीप्त सेन और उनकी सहोगी देवयानी को उसी समय कश्मीर से गिरफ्तार कर लिया था.

दोनों अब तक जेल में हैं. बाद में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका के आधार पर इन घोटालों की जांच सीबीआई को सौंपी गई थी. दूसरी ओर, प्रवर्तन निदेशालय घोटालों के मनी लॉन्ड्रिंग पहलू की जांच कर रही है.

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हज़ारों करोड़ के घोटाले

शारदा समूह ने मोटे अनुमान के मुताबिक राज्य के ग़रीब निवेशकों से लगभग ढाई हजार हजार करोड़ की रकम जुटाई थी. रोजवैली घोटाले की रकम तो 17 हजार करोड़ से ज्यादा होने का अनुमान है.

केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, बंगाल में ऐसी कम से कम 64 चिटफंड कंपनियां सक्रिय थीं. जानकारों का कहना है कि इन कंपनियों ने आम लोगों से लगभग 10 लाख करोड़ रुपए जुटाए हैं.

यह कोई संयोग नहीं है कि इनमें से ज़्यादातर को दिग्गज राजनेताओं का संरक्षण हासिल था. शारदा घोटाले में राज्य सरकार को पहला झटका 12 दिसंबर, 2014 को ममता बनर्जी के दाहिने हाथ रहे परिवहन मंत्री मदन मित्र की गिरफ्तारी से लगा.

उनको 21 महीने जेल में काटने पड़े. उनके अलावा सांसद सृंजय बसु और तृणमूल उपाध्यक्ष के अलावा सांसद मुकुल राय को भी सीबीआई की पूछताछ का सामना करना पड़ा.

नतीजतन बसु ने राजनीति से ही संन्यास ले लिया. मुकुल राय के रिश्ते भी ममता से बिगड़ते रहे और आख़िर में उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया. रोजवैली चिटफंड घोटाले के सिलसिले में तो पार्टी के दो सांसदों- सुदीप बनर्जी और तापस पाल को महीनों जेल में रहना पड़ा था.

इसी दौरान आए नारदा स्टिंग के खुलासे ने भी तृणमूल कांग्रेस के एक दर्जन से ज़्यादा सांसदों और नेताओं को कटघरे में खडा कर दिया था. इस मामले की भी सीबीआई जांच चल रही है और कई नेताओं से पूछताछ की जा चुकी है.

फेडरेशन आफ कंज्यूमर एसोसिएशंस ऑफ वेस्ट बंगाल की अध्यक्ष माला बनर्जी कहती हैं, "बंगाल में ऐसी सैकड़ों कंपनियां हैं और ग्रामीण इलाक़ों में तो अब भी दर्जनों ऐसी कंपनियां सक्रिय हैं. इनको सत्तारूढ़ नेताओं का संरक्षण हासिल है."

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भरोसा कैसे

चिटफंड कंपनियां दूरदराज के इलाकों में फैले हजारों एजेंटों के नेटवर्क के जरिए धन उगाहती हैं. इसके लिए ख़ास कर मेहनतकश तबके को निशाना बनाया जाता है.

एजेंटों को भी अच्छा-खासा कमीशन मिलता है. इसलिए वह लोग बढ़-चढ़ कर निवेशकों को इन योजनाओं में निवेश से होने वाले फ़ायदे गिनाते हैं. संबंधित कंपनी के बड़े-बड़े नेताओं और फ़िल्मकारों के साथ संबंधों को देख कर ग्रामीण इलाक़ों के लोग इन कंपनियों पर भरोसा करते रहे हैं.

मिसाल के तौर पर शारदा समूह ने तृणमूल कांग्रेस के सांसद और पत्रकार कुणाल घोष को अपनी मीडिया कंपनी का मुख्य कार्यकारी अधिकारी बना रखा था तो फ़िल्म अभिनेत्री और तृणमूल सांसद शताब्दी राय को अपना ब्रांड अंबेसडर. अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती ने तो ऐसी ही एक कंपनी से ब्रांड अंबेसडर के तौर पर ली गई रकम लौटा दी थी.

जाने-माने अर्थशास्त्री और यादवपुर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर अजिताभ चौधरी कहते हैं, "रोजगार और बचत के मौके नहीं होने की वजह से ही कोई दो दशकों से ग्रामीण इलाक़ों में ऐसी कंपनियां फल-फूल रही हैं. सरकारी बचत योजनाएं ग्रामीण इलाकों में नहीं पहुंच सकी हैं."

अर्थशास्त्री और भारतीय सांख्यिकी संस्थान के पूर्व प्रमुख दीपंकर दासगुप्ता कहते हैं, "इन कंपनियों पर लगाम लगाने के लिए कानून और सख्त होना चाहिए और इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारों को दे दी जानी चाहिए."

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि आने वाले लोकसभा चुनावों से पहले चिटफंड घोटाले की इस सुनामी के और जोर पकड़ने का अंदेशा है. तब कुछ और दिग्गज इसकी चपेट में आ सकते हैं. ममता बनर्जी भी कई बार यह अंदेशा जता चुकी हैं.

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