पंजाब यूनिवर्सिटी में लड़कियों को आज़ादी मिलने पर मुझे डर क्यों लग रहा है?: ब्लॉग

  • 26 दिसंबर 2018
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औरतों और उनके मसलों पर बात करने का लाइसेंस लेना मुश्किल नहीं है. बस आपकी कोई बहन होनी चाहिए. आपको तो कुछ नहीं करना, बस परिवार में बहनें हों.

मेरी तो तीन बहनें हैं. मैं अक्सर ही खुद को यह लाइसेंस इश्यू कर लेता हूँ.

इस बार तो मामला इतना गंभीर है कि लाइसेंस के बगैर ही चल निकला हूँ. अपने अधिकार बचाने का दौरा जो पड़ा है.

इस लड़की की हिम्मत हुई तो हुई कैसे? आप जानते हैं क्या?

चंडीगढ़ में पंजाब यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट काउन्सिल की पहली महिला प्रधान को? जब बनीं थीं तो हम सबने तो तालियां बजाईं थीं.

वहां तक ठीक था. अब तो मोहतरमा गाड़ी ज़रा आगे ही निकालने लगी हैं. "दूसरी बड़ी जीत" का ऐलान कर चुकी हैं.

ये ऐसे कैसे हो रहा है?

देखिए, बराबरी वाले कांसेप्ट का ख्याल रखने के लिए हम आजकल महिला क्रिकेट टीम के जीतने पर खुश और हारने पर दुखी हो ही रहे हैं. देशभक्ति की देशभक्ति, बराबरी की बराबरी.

पर यह तो नया पंगा है, ऑउट ऑफ़ सिलेबस है.

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सच्ची, अभी तो हमने बताया ही नहीं कि मामला क्या है.

हुआ यूं है कि कनुप्रिया कि अगुआई में चल रहा एक 'पिंजरा तोड़' धरना कामयाब हो गया है. पंजाब यूनिवर्सिटी में अब लड़कियां अपने हॉस्टलों में 24 घंटे आ-जा सकेंगी.

ये क्या बात हुई?

मुझे मालूम है कि यह बड़ी बात है, बड़ा हक है. पर इस हक से हम जैसे मर्दों के सदियों पुराने हकों का क्या होगा?

अगर लड़कियां अब सड़कों पर भी अपना हक रखेंगीं तो मुझ जैसे आम मर्द अपनी मर्दानगी की परफॉर्मेंस क्या सिर्फ़ घर के अंदर ही देंगे?

लड़कियों को हॉस्टल के अंदर भी कुछ न कुछ मिल ही जाएगा करने को. हम बाहर अपनी मर्दानगी का रायता फ़ैलाते रहेंगे.

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अब बताइए, यह काम भी चला गया तो पहले बेरोज़गारी कम है क्या हिंदुस्तान में?

मुझे ग़लत न समझिएगा. मैं बराबरी का तरफ़दार हूँ मेरी बहनों पर भी बराबर वही पाबंदियां रही हैं जो किसी और भारतीय महिला पर लागू हैं.

जहाँ तक सुरक्षा वाला मामला है, मैं तो शुरू से ही इसमें आगे रहा हूँ. छोटी उम्र से ही मैं अपनी बड़ी बहनों के गार्ड के तौर पर उनके साथ-साथ चलता आया हूँ.

लेकिन ख़तरा ये है कि हॉस्टल में 24 घंटे आने जाने की आज़ादी के बाद कई और आज़ादी की मांग बढ़ जाएगी.

अरे...अब ये सब भी होगा!

आज हॉस्टल टाइमिंग है, कल कपड़े पहनने का तरीका, फिर संगी-साथी चुनने की मर्ज़ी, फिर अकेले जीने की मर्ज़ी, यह भी मर्ज़ी कि हम ग़लती भी करेंगीं. मतलब, ग़लती करने की भी मर्ज़ी.

ऐसे तो सभी लड़कियां सभी हक़ मांगने लगेंगीं. मांग लें. पर अगर मिल गए तो?

क्या होगा जब कल को लड़कियां पूछेंगीं कि वे ही क्यों अपने बुज़ुर्ग माँ-बाप को छोड़ कर आएं, "तुम क्यों नहीं रह सकते मेरे घर में?" तो क्या लड़के लड़की के माँ-बाप भी बराबर हो जाएंगे?

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Image caption गेड़ी रूट पर प्रदर्शन करती हुई महिलाएं

यह तो कुछ ज़्यादा डरावनी बात हो गई.

मैंने तो पहले ही कहा है, बात सारी सेफ्टी इश्यू की है. कई लड़कियां इस लॉजिक को भी लताड़ देती हैं, कहती हैं कि जब हम आम जगहों पर जाएंगीं तभी तो अपना हक जमाएंगीं, सुरक्षित होंगीं.

चंडीगढ़ का गेड़ी रूट

चंडीगढ़ की ही बात करते हैं. क्या अब 'गेड़ी रूट' पर भी लड़कियां हक़ रखेंगीं? गेड़ी रूट के बारे में तो आप जानते ही होंगे. नहीं पता तो मैं बताता हूँ.

सांप की तरह बल खाकर चलती एक सड़क है जो चंडीगढ़ के पॉश यानी महंगे सेक्टरों से होकर निकलती है. यहाँ लड़के अपना जौहर दिखाते हैं. ज़्यादा सयानों की भाषा में कहें तो लड़के यहाँ लड़कियों का पीछा करके उनको तंग करते हैं.

'गेड़ी' शब्द पंजाबी के 'गेड़ा' शब्द का स्त्रीलिंग है. गेड़ा मतलब घोड़े पर बैठ कर अपने खेतों का चक्कर लगाना, गेड़ी का अर्थ ज़रा अलग है.

पिछले साल लड़कियों की 'बेख़ौफ़ आज़ादी' मुहिम के बाद इसका नाम गूगल मैप्स में बदल कर 'आज़ादी रुट' भी हुआ है. मैंने इस पर ख़ुश हो कर फ़ेसबुक स्टेटस डाला था. तब भी बताया था कि मेरी तीन बहनें हैं.

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पर गेड़ी/आज़ादी रूट पर वाकई हक़ रख कर लड़कियां करेंगीं क्या? क्या हमारे पीछे गेड़ी लगाएंगीं, कमेंट मारेंगीं, इशारे करेंगीं? फिर हम क्या करेंगे? क्या तब भी गेड़ी को गेड़ी ही कहा जाएगा या बराबरी वाला कोई व्याकरण ढूंढना पड़ेगा?

सवाल कई हैं, पर अब ज़रा जल्दी से हॉस्टल की बात पर वापस चलते हैं.

लड़कियों जैसी हरकतें...

रात को हॉस्टल से बाहर निकल कर भी लड़कियां जाएंगी कहाँ? सेक्टर 17 के बस स्टैंड पर अकेली ही परांठे खाने जाएंगी तो कुक भी कन्फ्यूज़िया जाएगा, सोचेगा कि साथ में लड़के तो हैं नहीं, परांठे ही बनाऊं या परांठियाँ? छोड़िए, अब तो हंसी भी नहीं आ रही.

अब बस फ़िक्र है कि क्या आप अब भी मान लेंगे कि यह लेख मैंने मज़ाकिया लहजे में लिखा है, व्यंग करने का दुस्साहस किया है. या फिर मुझे मानना पड़ेगा कि यह मेरे अंदर का डरा हुआ मर्द ही लिख-बोल रहा है.

डर यह भी है कि अगर समय वाकई बदल गया तो मैं अपने भांजे को क्या कहकर डाँटूंगा जब वह कोई ऐसी हरकत करेगा जिसे हम आमतौर पर लड़कियों की हरकत कहते हैं "ओए, लड़कियों जैसे हरकतें न कर!" अब तो शायद ये चलेगा नहीं.

अभी समय है, समझिए. इस कनुप्रिया की न मानिए. मेरी मानिए. मुझे इन मसलों का पूरा ज्ञान है. कितनी बार बताऊँ आपको? मेरी तीन बहनें हैं.

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