योगगुरु रामदेव क्यों बना रहे हैं मोदी और बीजेपी से दूरी?

  • 26 दिसंबर 2018
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योगगुरु बाबा रामदेव के राजनीतिक तौर पर 'तटस्थ' रहने के फ़ैसले और ठीक छह महीने पहले अपनाए रुख को बदलने से कई सवाल उठ रहे हैं.

सबसे अहम सवाल ये है कि किसी वक़्त भारतीय जनता पार्टी के समर्थन में घोषित तौर पर अभियान चलाने वाले योगगुरु रामदेव ख़ुद को 'सर्वदलीय और निर्दलीय' क्यों बता रहे हैं?

सवाल की वजह भी है. तीन महीने में ये दूसरा मौका है जब बाबा रामदेव ने ख़ुद को बीजेपी से अलग दिखाने की कोशिश की है. इसके पहले सितंबर में भी एक कार्यक्रम के दौरान रामदेव ने कहा था कि वो अगले चुनाव में बीजेपी का प्रचार नहीं करेंगे.

लेकिन, तब उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर ज़्यादा कुछ नहीं कहा था. मगर मंगलवार को रामदेव ने ख़ुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी अलग दिखाने की कोशिश की.

उन्होंने कहा कि वो 'किसी व्यक्ति का समर्थन नहीं करते.' बीते सालों में तमाम मौकों पर नरेंद्र मोदी की तारीफ कर चुके और उनके समर्थन में भविष्यवाणी करते रहे रामदेव ने अगले चुनाव को लेकर कहा कि वो नहीं जानते कि 'अगला प्रधानमंत्री कौन होगा.'

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'किसी का समर्थन नहीं'

योगगुरु रामदेव ने मंगलवार को मदुरै एयरपोर्ट पर पत्रकारों से कहा, "फिलहाल राजनीतिक हालात बहुत जटिल हैं. हम ये नहीं कह सकते हैं कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा या फिर देश की अगुवाई कौन करेगा. लेकिन हालात बहुत दिलचस्प हैं. संघर्ष की स्थिति है."

उन्होंने आगे कहा, "अब मैं राजनीति पर ध्यान नहीं लगा रहा हूं. मैं न तो किसी व्यक्ति और न ही किसी पार्टी का समर्थन कर रहा हूं."

योगगुरु रामदेव का ताज़ा बयान बहुत से लोगों के लिए हैरान करने वाला है. ख़ासकर उनके लिए जिन्होंने योगगुरु को भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पक्ष में सक्रिय अभियान चलाते देखा है.  

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छह महीने में बदले सुर

करीब छह महीने पहले 3 जून को बाबा रामदेव बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के साथ मौजूद थे और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के चार साल के कामकाज की तारीफ में जुटे थे.

अमित शाह से मुलाक़ात के बाद मीडिया रिपोर्टों में रामदेव के हवाले से कहा गया, " प्रधानमंत्री का इरादा और नेतृत्व देश को आगे ले जा रहा है." 

ये बयान उस वक़्त आया जब अमित शाह योगगुरू रामदेव से मिलने पहुंचे थे.

तब अमित शाह ने कहा था, " मैं बाबा रामदेव का समर्थन लेने आया हूं. मुझे जो कुछ कहना था, उन्होंने बड़े धैर्य से वो सब सुना."  

अमित शाह ने आगे कहा, "अगर हमें बाबा रामदेव की मदद मिलती है तो हम उनके करोड़ों समर्थकों तक पहुंच सकते हैं. जो 2014 में हमारे साथ थे, हम उन सभी का आशीर्वाद मांग रहे हैं."

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बाबा को व्यापार की चिंता?

जून से लेकर दिसंबर तक देश में राजनीतिक तौर पर सिर्फ़ एक बदलाव हुआ है. बीजेपी ने तीन हिंदीभाषी राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता गंवा दी है.

करीब साढ़े चार साल पहले हुए लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी के समर्थन में अभियान चलाने वाले योगगुरु का रुख क्या इसी वजह से बदल गया है?

इस सवाल पर वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अनिकेंद्रनाथ सेन कहते हैं, "अब रामदेव की बड़ी भूमिका एक बाबा या स्वामी के बजाए व्यापारी की है. इसलिए वो संभलकर चल रहे हैं. वो एक फैलते कारोबार के अधिपति की तरह ही हालात पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं."

सेन आगे कहते हैं, "दूसरी बात ये है कि हिंदीभाषी राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुए चुनाव के नतीजों से उन्होंने दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ लिया है. इन राज्यों में लोकसभा की अच्छी संख्या में सीटें आती हैं."

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सेन कहते हैं कि तटस्थ भूमिका अपनाकर "बाबा रामदेव 2014 की स्थिति से अलग हट गए हैं. पहले वो अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का हिस्सा थे. फिर वो रामलीला मैदान में ख़ुद आए जहां से वो महिलाओं के कपड़े में बचकर निकले. उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का फ़ायदा बीजेपी को हुआ. अब मोदी पर आरोप लग रहे हैं. अब वो आंदोलन ख़त्म हो चुका है." 

हालिया बरसों में बीजेपी और नरेंद्र मोदी का समर्थन करते रहे बाबा रामदेव ने इसके पहले सितंबर में भी एक कार्यक्रम में कहा था कि वो अगले चुनाव में बीजेपी का प्रचार नहीं करेंगे.

इस मौके पर उन्होंने ये भी कहा था कि कालाधन, भ्रष्टाचार और व्यवस्था में परिवर्तन से जुड़े मुद्दों पर उनका मोदी जी पर भरोसा था. ये भरोसा अभी है या नहीं, पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इन मुद्दों पर उन्होंने फ़िलहाल मौन रखा है.

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