आगरा से ग्राउंड रिपोर्ट: 'मेरी बेटी को ज़िंदा जला दिया, ये दरिंदों का राज है'

  • सिंधुवासिनी
  • बीबीसी संवाददाता
संजलि

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संजलि

'इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया?

मैं नहीं जानता

लेकिन जो भी रही हो मेरी माँ रही होगी,

मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आखिरी स्त्री कौन होगी

जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?'

आग में जलाकर मार डाली गई संजलि की मां अनीता के रोने की आवाज़ सुनकर रमाशंकर 'विद्रोही' की कविता की ये पंक्तियां याद आती हैं और ऐसा लगता है जैसे कानों के पर्दे फटने वाले हैं.

दिसंबर का आखिरी हफ़्ता और उत्तर भारत में बह रही सर्द हवाएं भी जैसे 15 साल की संजलि की मौत का मर्सिया पढ़ती मालूम होती हैं.

संजलि वो लड़की है जिसे मंगलवार, 18 दिसंबर को आगरा के पास मलपुरा मार्ग पर ज़िंदा ही आग के हवाले कर दिया गया.

"मरने से पहले मेरी बच्ची बार-बार कह रही थी कि मम्मी कुछ खाने को दे दो, भूख लगी है. पानी पिला दो, प्यास लगी है. लेकिन डॉक्टर ने कुछ खिलाने-पिलाने से मना किया था तो मैं उसे कुछ नहीं दे पाई." आग में झुलसी और भूख-प्यास से तड़पती अपनी बच्ची संजलि को याद करके उसकी मां अनीता फफक उठती हैं.

वो कहती हैं "मेरी बेचारी बच्ची भूखे-प्यासे ही इस दुनिया से चली गई."

ताजनगरी आगरा में एक ओर जहां क्रिसमस से पहले की चहल-पहल अपने पूरे उफ़ान पर दिखाई देती है वहीं यहां से महज़ 15 किलोमीटर दूर लालऊ गांव की जाटव बस्ती में मातम पसरा हुआ है.

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'मेरी बेटी स्कूल जा रही थी, किसी ने पेट्रोल डालकर जला दिया...'

'नमस्ते करके निकली थी, वापस नहीं लौटी'

संजलि की मां की आंखों के नीचे काले घेरे उभर आए हैं. शायद पिछले एक हफ़्ते से वो लगातार रो रही हैं.

बेहद कमज़ोर आवाज़ में वो बताती हैं, "रोज़ की तरह हंसी-ख़ुशी वाला दिन था. संजलि मुझे हमेशा की तरह नमस्ते करके स्कूल के लिए निकली थी. कौन जानता था कि वो वापस ही नहीं आएगी..."

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संजलि की मां, अनीता

'आपकी बेटी को आग लगा दी है'

18 दिसंबर को दोपहर के तक़रीबन डेढ़ बजे होंगे. संजलि की मां घर के कामों में लगी थीं तभी बस्ती के एक लड़का दौड़ता हुआ आया और बोला, "संजलि को कुछ लोगों ने आग लगा दी है, मैंने आग बुझाने की कोशिश की लेकिन बुझी नहीं. आप जल्दी जाइए."

ये सुनकर संजलि की मां भागती हुई वहां पहुंचीं. वो कहती हैं, "जाकर देखा तो मेरी बेटी तड़प रही थी. मेरे पहुंचने से कुछ देर पहले ही पुलिस की गाड़ी भी वहां पहुंच चुकी थी. हम लोग उसे पुलिस की गाड़ी में लेकर एसएम हॉस्पिटल पहुंचे."

"मैं उसे छाती से लगाए गाड़ी में बैठी थी. मैंने उससे पूछा कि किसने उसके साथ ऐसा किया. वो बस इतना ही बता पाई कि हेलमेट लगाए लाल बाइक पर दो लोग आए थे जिन्होंने उस पर पेट्रोल जैसी कोई चीज़ छिड़ककर आग लगाई और फिर गड्ढे में धकेल दिया."

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जिस सड़क पर संजलि को जलाया गया वो मलपुरा रोड को लालऊ गांव से जोड़ती है और संजलि का घर यहां से लगभग तीन किलोमीटर दूर है.

इस सड़क के किनारे अब भी वो जली हुई झाड़ियां और राख दिखती हैं जिनमें संजलि को धकेल दिया गया था.

हैरत कि बात ये है कि ये वाकया भरी दोपहर में हुआ जब संजलि स्कूल की छुट्टी के बाद साइकिल से घर लौट रही थीं. चौंकाने वाली बात ये भी है कि ये सड़क कभी सुनसान नहीं रहती. यहां दोनों तरफ़ से वाहनों और लोगों का आना-जाना लगा रहता है.

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'IPS या पायलट बनना चाहती थी संजलि'

एसएम हॉस्पिटल के डॉक्टर जब हालात संभाल नहीं पाए तो संजलि को दिल्ली के सफ़दरजंग अस्पताल में रेफ़र किया गया.

उसकी मां बताती हैं, "वो मुझसे लगातार कहती रही कि मां, अगर मैं ज़िंदा बची तो अपने इंसाफ़ की लड़ाई ख़ुद लड़ूंगी और अगर नहीं बच पाई तो आप मेरी लड़ाई लड़िएगा."

"मेरी बच्ची तो चली गई लेकिन अब मुझे उसके इंसाफ़ की लड़ाई लड़नी होगी."

संजलि की मां अपनी बेटी को याद करते हुए कहती हैं, "वो पढ़ाई करती थी, कोचिंग जाती थी, होमवर्क करती थी, भाई-बहनों के साथ खेलती थी, घर के कामों में मेरा हाथ भी बंटाती थी... जब मेरी और उसके पापा की लड़ाई हो जाती थी तो मुझे मनाकर खाना खिलाती थी... अब कौन करेगा ये सब?"

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संजलि के पिता हरेंद्र सिंह जाटव

संजलि के पिता हरेंद्र सिंह जाटव कहते हैं, "मेरी बेटी होशियार थी. कुछ अच्छा करना चाहती थी वो. पायलट या आईपीएस बनने की बात कहती थी... अभी तो आप सब लोग आ रहे हैं हमारे पास. रोज़ हज़ारों मीडिया वाले आ रहे हैं, रिश्तेदार आ रहे हैं तो हमें ज़्यादा कुछ पता नहीं चल रहा है. कुछ दिनों बाद जब कोई नहीं आएगा, तब हम पर असली पहाड़ टूटेगा."

संजलि की बड़ी बहन अंजलि कभी लोगों के फ़ोन कॉल्स का जवाब देती है तो कभी मां को संभालती है.

अंजलि ने बीबीसी को बताया, "वो मुझसे कहती थी कि आपके दसवीं में 81 पर्सेंट आए थे, मैं 90 पर्सेंट लाकर दिखाऊंगी. वो कुछ अलग करना चाहती थी. ज़िंदगी में आगे बढ़ना चाहती थी."

संजलि की मौत के बाद अब कुल पांच भाई-बहनों में से चार ही बचे हैं. दो बहनें और दो भाई.

संजलि के स्कूल 'अशर्फ़ी देवी छिद्दू सिंह इंटरमीडिएट कॉलेज' में विज्ञान पढ़ाने वाले उसके शिक्षक तोरन सिंह का कहना है कि उन्होंने उसे कभी परेशान या तनाव में नहीं देखा. वो हंसने-खेलने वाली बच्ची थी.

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संजलि की बहन अंजलि

'किसी से कोई दुश्मनी या मनमुटाव नहीं'

संजलि की दोस्त और अक्सर उसके साथ स्कूल जाने वाली दामिनी कहती है कि इस घटना के बाद से ही बस्ती की लड़कियों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है.

दामिनी ने बीबीसी से कहा, "हम सब लड़कियां बहुत डरी हुई हैं. कोई नहीं जानता कब किसके साथ क्या हो जाए."

बस्ती में रहने वाली कुछ औरतों ने बताया कि लड़कियां तो दूर सातवीं-आठवीं क्लास में पढ़ने वाले लड़कों ने भी डर के मारे स्कूल जाना बंद कर दिया है.

संजलि ने मौत से पहले अपने बयान में कहा था कि वो हमलावरों को नहीं पहचानती. उसके परिवार का कहना है कि उनकी किसी के कोई दुश्मनी या मनमुटाव नहीं था.

संजलि के पिता हरेंद्र सिंह जाटव कहते हैं, "मैं हर शाम अपने बच्चों को बुलाकर पूछते था कि उनका दिन कैसा रहा, किसी ने कुछ कहा तो नहीं या किसी ने तंग तो नहीं किया. अगर ऐसा कुछ होता तो संजलि हमें ज़रूर बताती."

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संजलि के घर के सामने पुलिस की भीड़

तक़रीबन 200-250 घरों वाले ललाऊ गांव में आबादी का एक बड़ा हिस्सा जाट और जाटव हैं. जाटव दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं और संजलि भी जाटव परिवार की थी.

हालांकि संजलि के पिता हरेंद्र का कहना है कि गांव में अच्छे-बुरे हर तरह के लोग हैं लेकिन उन्हें अपनी बेटी की हत्या के पीछे कोई जातीय वजह नहीं लगती.

चचेरे भाई की ख़ुदकुशी और पुलिस का नतीजे पर पहुंचना

इस पूरे मामले ने एक और अजीबोगरीब मोड़ तब ले लिया जब संजलि के ताऊ के बेटे योगेश ने भी उसकी मौत की अगली सुबह ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली.

योगेश की मां राजन देवी का आरोप है कि पुलिस ने योगेश को टॉर्चर किया इसलिए उसने सदमे में आकर ख़ुदकुशी कर ली.

वहीं पुलिस ने अपराध के आठवें दिन प्रेस कॉन्फ़्रेंस करके मृत योगेश को ही मुख्य अभियुक्त घोषित कर दिया.

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संजलि की तस्वीरें और ट्रॉफ़ी

पुलिस का क्या कहना है?

एसएसपी (आगरा) अमित पाठक ने बीबीसी को बताया, "योगेश पर हमारी शक़ की सुई जाने की एक नहीं, कई वजहें हैं. शक़ करने की पहली वजह तो योगेश की ख़ुदकुशी ही है. शायद वो संजलि की ओर आकर्षित था और उसके इनकार करने की वजह से उसने ये कदम उठाया.''

पुलिस ने योगेश के अलावा उसके ममेरे भाई आकाश और योगेश के ही एक और रिश्तेदार विजय को गिरफ़्तार किया है.

योगेश को मुख्य अभियुक्त मानने के पक्ष में पुलिस कुछ ऐसी दलीलें पेश कर रही है:

- पुलिस का कहना है कि उसे योगेश के घर से कुछ चिट्ठियां मिलीं हैं जो उसने संजलि के लिए लिखी थीं.

- योगेश के फ़ोन कॉल्स की डिटेल और वॉट्सऐप मेसेज.

- योगेश के फ़ोन में संजलि की तस्वीरें जिनमें उसकी स्कूल ड्रेस पहने भी एक तस्वीर है.

- पुलिस के मुताबिक योगेश ने संजलि को एक साइकिल तोहफ़े में दी थी और साथ ही एक जाली सर्टिफ़िकेट भी बनवाकर दिया था ताकि वो घर में साइकिल को इनाम बता सके.

- पुलिस का कहना है कि योगेश को 'क्राइम पेट्रोल' देखने का शौक़ था और मुमकिन है कि अपराध की योजना बनाने की पीछे यह एक वजह भी रही हो.

- पुलिस के मुताबिक अन्य दो अभियुक्तों ने भी कबूला है कि उन्हें इस अपराध को अंजाम देने से लिए योगेश ने ही उकसाया था और बदले में 15,000 रुपये देने की बात भी कही थी.

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संजलि का कमरा और उसकी मां

पुलिस की दलील से असंतुष्ट संजलि का परिवार

संजलि के माता-पिता और उसका परिवार पुलिस के इन नतीजों से असहमत हैं. संजलि के पिता हरेंद्र सिंह जाटव ने बीबीसी से कहा, "पुलिस मुझे आधी रात को मलपुरा थाने में ले गई. वहां मुझसे कहा गया कि मैं कुछ बोलूं न, बस चुपचाप सुनूं. उन्होंने मुझे एक लड़का दिखाया जो नीचे सहमा हुआ बैठा था. ऐसा लग रहा था जैसे उसे बहुत पीटा और डराया धमकाया गया हो... "

हरेंद्र सिंह के मुताबिक, "पुलिस वालों के पूछने पर उस लड़के ने पूरी कहानी ऐसे सुनाई जैसे उसे सब कुछ रटाया गया हो. पिछले महीने पहले काम से लौटते वक़्त मुझ पर दो लोगों ने हमला किया था. उन्होंने मेरे सिर पर किसी चीज़ से मारा था. उस लड़के ने कहा कि इस हमले को भी उन्होंने ही (योगेश और बाकी दो अभियुक्तों) ने अंजाम दिया. पुलिस ने मुझे उस लड़के से कोई बात नहीं करने दी."

पुलिस के दावों से असहमति की वजह बताते हुए हरेंद्र सिंह कहते हैं, "मुझ पर हमला रात 9 बजे के क़रीब हुआ था और उस लड़के ने कहा कि उन्होंने शाम 6 बजे हमला किया. यहीं, मैंने पुलिस का झूठ पकड़ लिया. पुलिस ने मुझे फ़ोन में चिट्ठियों की तस्वीरें दिखाईं, असली चिट्ठियां नहीं दिखाईं. फिर मैं कैसे मान लूं कि वो चिट्ठियां योगेश ने लिखीं? बाकी दो अभियुक्तों को भी वो हमारे रिश्तेदार बता रहे हैं, जबकि हम उनसे कभी मिले ही नहीं."

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मुख्य अभियुक्त योगेश की मां राजन देवी

योगेश की मां राजन देवी का भी मानना है कि उनका बेटा पहले ही मर चुका है और पुलिस असली गुनेहगार को पकड़ नहीं पा रही है इसलिए मरे हुए इंसान पर अपराध का बोझ डालकर मामला निबटाने की कोशिश कर रही है.

राजन देवी कहती हैं, "आप मेरा भरोसा मत कीजिए, पूरे मुहल्ले से पूछिए कि योगेश कैसा लड़का था. मेरा बेटा तो मर गया लेकिन मैं चाहती हूं कि असली गुनहगार पकड़े जाएं ताकि संजलि को इंसाफ़ मिले और मेरे बेटे के नाम से ये दाग़ धुले."

क्या चाहता है संजलि का परिवार?

संजलि की मां रोते-रोते कहती हैं, "जबसे बेटी गई है, मेरे घर में ठीक से चूल्हा नहीं जला है. गुनाहगार को फांसी मिलेगी तभी मेरी बेटी को इंसाफ़ मिलेगा." वहीं, संजलि के पिता मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं.

आगरा के ज़िलाधिकारी रवि कुमार एमजी ने संजलि के परिवार को 50,000 रुपये मुआवज़ा दिया है. उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा ने भी परिवार को पांच लाख रुपये दिलाने का वादा किया है.

हालांकि ये पैसे कब और कैसे मिलेंगे, इस बारे में संजलि के परिजनों को कोई जानकारी नहीं है.

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संजलि के घर पर लोगों और मीडिया का जमावड़ा है

मामले का जातीय एंगल और राजनीतीकरण

हालांकि संजलि का परिवार मामले के पीछे कोई जातीय वजह न होने की बात कह रहा है, कई राजनीतिक पार्टियां और तबके इसमें जातीय एंगल शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं.

चुंकि संजलि दलित परिवार से थीं, भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि अगर जल्दी कोई कार्रवाई नहीं की गई तो पूरा देश थम जाएगा.

भीम आर्मी ने मंगलवार को आगरा बंद का आह्वान भी किया था. इसके अलावा भीम आर्मी के सदस्यों ने संजलि को इंसाफ़ दिलाने की मांग करते हुए कैंडिल लाइट मार्च भी निकाला था.

गुजरात से दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने कहा है, "संजलि के मुद्दे पर टीवी चैनल खामोश हैं, ये शर्मनाक है."

आगरा से लोकसभा सांसद और अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष रामशंकर कठेरिया ने संजलि के परिवार के लिए 10 लाख रुपये के मुआवजे का ऐलान किया है.

वहीं, बस्ती के लोगों में राज्य की क़ानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा के मसले पर योगी सरकार से गहरी नाराज़गी है.

संजलि के पिता ने कहा, "वो कहते हैं, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ. मैं अपनी बेटी को पढ़ा तो रहा था लेकिन उसे बचा नहीं पाया. ये दरिंदों का राज है."

संजलि के घर के बाहर जुटी भीड़ में से कई लोग बोल उठते हैं, "योगी जी ने सरकार बनने के बाद एंटी-रोमियो स्क्वैड का हल्ला किया था. मुश्किल से एक हफ़्ते तक कुछ पुलिसवाले स्कूल-कॉलेज के आस-पास दिखे. रोमियो के नाम पर कुछ बेगुनाहों को जेल में भी डाल दिया उसके बाद सब शांत. अब एंटी रोमियो स्क्वैड कहां है, किसी को कुछ नहीं पता. हमें तो कहीं नहीं दिखता."

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जिस जगह पर संजलि को जलाया गया, वहां की झाड़ियां अब भी आग से झुलसी दिखाई देती हैं

'आगे चाहे जो हो, संजलि तो चली गई'

संजलि की मां उस छोटे से कमरे में सिर पर हाथ रखे बैठी हैं.

उनकी आंखों के आंसू गालों को गीला करते हुए बह रहे हैं और वो उसे पोंछने की कोशिश नहीं करतीं.

बस धीमी आवाज़ में कहती हैं, "अब आगे चाहे जो हो, संजलि तो चली गई…"

उसी छोटे से कमरे में एक चारपाई है जिस पर एक नन्हा टेडी बियर उल्टा पड़ा है, जैसे संजलि के चले जाने से रूठ गया हो.

चारपाई के नीचे संजलि के जूते रखे हैं, मानों संजलि के लौटते पांवों का इंतज़ार कर रहे हों.

आलमारी में संजलि की तस्वीरों पर चढ़ाई गई गुलाब की पंखुड़ियां जैसे ख़ुद उसकी मौत की ख़बर पर ऐतबार नहीं कर पा रही हैं...

संजलि के घरवालों से विदा लेकर हम बाहर निकलते हैं जहां कुछ अलाव ताप रहे हैं. खुले आसमान के नीचे वहां भी संजलि की ही चर्चा हो रही है.

मुझे फिर विद्रोही की कविता याद आती है:

'औरत की लाश धरती माता की तरह होती है,

जो खुले में फैल जाती है, थानों से लेकर अदालतों तक.'

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