मोदी-शाह की मजबूरी है सहयोगी दलों के आगे झुकना?: नज़रिया

  • 27 दिसंबर 2018
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बीजेपी ने अपने सहयोगी दलों को हमेशा दो स्वरूपों में देखा है - पहले, जो एनडीए के चुनावी आंकड़ों में इज़ाफा करते हैं और दूसरे, जो भारतीय राजनीति की मुख्य धुरी के रूप में उसकी पहचान मजबूत करते हैं.

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे हिन्दी बहुल क्षेत्रों में करारी हार के बाद हिन्दूवादी पार्टी के दृष्टिकोण में बड़े परिवर्तन हो रहे हैं.

एनडीए सहयोगियों के शब्दबाण तीखे हो चले हैं और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को उनकी कड़वाहट झेलने को मजबूर होना पड़ा है.

मोदी और शाह, दोनों नए सिरे से गठबंधन का ताना-बाना बुनने में जुटे हैं, जो उनके पुराने तौर-तरीकों के लिए एक चुनौती से कम नहीं.

मोदी शाह को आई घटक दलों की याद

कुछ महीने पहले तक ये मुमकिन नहीं लगता था कि दोनों नेता सहयोगियों के साथ नरम व्यवहार करेंगे, चाहे परिणाम के रूप में बीजेपी को 2019 के चुनावों से हाथ ही क्यों न धोना पड़े.

2014 के लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत हासिल करने और उसके बाद कई विधानसभा चुनावों में लगातार जीत के बाद बीजेपी को महसूस होने लगा था कि पूरी राजनीति के केन्द्र में नरेंद्र मोदी को रखना ही काफी है और उनके लिए सहयोगियों की फुसफुसाहट कोई मायने नहीं रखती.

लेकिन मोदी और शाह को ये बात समझ में आ गई है कि बीजेपी के लिए अपने एनडीए सहयोगियों को खोना तुलनात्मक दृष्टि से ज़्यादा खराब है, बजाय इसके कि लोकसभा चुनाव के लिए अधिक सीटों की मांग करनेवाले दलों के सामने पूरी तरह असहाय हो जाना.

बीजेपी को चुनाव से पहले और चुनाव के बाद, दोनों ही स्थितियों में सहयोगियों की ज़रूरत है, क्योंकि आत्मविश्वास से लबरेज़ राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष प्रदेश स्तर पर विशिष्ट गठबंधन तैयार करने की कोशिश कर रहा है.

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अमित शाह अब भी मान रहे हैं कि शिवसेना एनडीए का सहयोगी है और बीजेपी उसके साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ेगी, जबकि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे स्पष्ट कर चुके हैं कि वो अकेले बूते पर चुनावी जंग लड़ेंगे.

इसी प्रकार बीजेपी को राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) की भारी-भरकम मांग मानने से भी परहेज नहीं, जबकि हक़ीक़त के धरातल पर पार्टी के प्रभाव और नेताओं के दावों में ज़मीन-आसमान का अंतर है.

मौजूदा हालात में बीजेपी के लिए मोदी की आलोचक शिवसेना को गठबंधन से दूर जाने देना मुमकिन नहीं दिखता क्योंकि एन चन्द्रबाबू नायडू की टीडीपी और उपेन्द्र कुशवाहा पहले ही गठबंधन से किनारा कर चुके हैं.

बीजेपी के सामने हैं कैसी चुनौतियां?

इसी प्रकार अगर पासवान और उनके बेटे को एनडीए से नाता तोड़ना पड़ता तो ये राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के लिए भारी क्षति होती.

लिहाज़ा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दल (यूनाइटेड) के साथ बराबरी के आधार पर सीटों का समझौता करने वाली बीजेपी के लिए एलजेपी की मांगों के सामने झुकना मजबूरी है.

पासवान के बेटे चिराग पासवान ने स्पष्ट कर दिया है कि तोलमोल के मामले में वो अपने पिता की तुलना में अधिक समर्थ हैं.

वो लोकसभा की छह और राज्यसभा की एक सीट पर समझौता कराने में कामयाब रहे. राज्यसभा की सीट संभवत: असम से रामविलास पासवान को दी जाएगी.

पासवान की पार्टी को दी गई अधिक सीटें बीजेपी के खाते से गई हैं.

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अब बीजेपी और जेडीयू बराबर, यानी 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी. बीजेपी ने 2014 में 30 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 22 सीटों पर जीत दर्ज की थी.

इसका अर्थ ये है कि पासवान की पार्टी का कोटा भरने के लिए बीजेपी के छह मौजूदा सांसदों के टिकट कट जाएंगे.

निश्चित रूप से 2014 में तीन सीट जीतने वाली कुशवाहा की पार्टी ने परोक्ष रूप से पासवान की मदद की थी.

नीतीश कुमार को 17 सीट देने पर बीजेपी के तैयार हो जाने के बाद कुशवाहा ने एनडीए गठबंधन छोड़ दिया.

कुशवाहा को कांग्रेस-आरजेडी गठबंधन का साथ ज़्यादा भा रहा है. उधर बीजेपी को लगता है कि कुशवाहा की पार्टी का मतदाताओं में ज़्यादा असर नहीं है.

अपना दल की ओर से भी दबाव

बीजेपी के सहयोगी ये बात समझ चुके हैं कि जब तक आप नहीं अड़ेंगे, मोदी या शाह आपकी परवाह नहीं करेंगे.

सुनने में आ रहा है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) भी यही रणनीति अपना रही है.

पार्टी का आरोप है कि उसे बीजेपी के राज्य नेतृत्व से उचित "सम्मान" नहीं दिया जा रहा.

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पार्टी प्रमुख आशीष पटेल, जिनकी पत्नी अनुप्रिया पटेल केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री हैं, का कहना है कि एसपी-बीएसपी गठबंधन उनके लिए चुनौती है, "हमारी और अपना दल (एस) जैसी छोटी पार्टियां सम्मान चाहती हैं." वह कहते हैं, "उचित सम्मान न मिलने पर हमारे नेता और कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस करते हैं."

पटेल का आरोप है कि अनुप्रिया पटेल को भी मेडिकल कॉलेजों के उद्घाटन के अवसर पर आमंत्रित नहीं किया गया.

2014 के लोकसभा चुनाव में तीन सीटें जीतने वाली पटेल की पार्टी चाहती है कि इस बार बीजेपी उन्हें चार या पांच सीट दे.

अपना दल की व्यथा उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी नेता ओम प्रकाश राजभर के समान है, जो बीजेपी की प्रदेश और केंद्रीय इकाई की कड़ी निन्दा कर रहे हैं.

हालांकि बीजेपी के लिए सबसे कठिन शिवसेना को मनाना होगा. उम्मीद है कि बीजेपी नेता ये मान रहे हैं कि सेना प्रमुख अपनी पार्टी के चुनाव चिह्न बाघ की तरह सिर्फ दहाड़ रहे हैं, ताकि उनकी पार्टी को अधिक सीटें दी जाएं.

बीजेपी के लिए बढ़ा एनडीए का महत्व

बीजेपी का विश्लेषण है कि जब शरद पवार की एनसीपी और कांग्रेस गठबंधन मैदान में सामने हो तो शिवसेना अकेली चुनाव नहीं लड़ सकती. लिहाजा, बीजेपी रणनीतिकारों का कहना है कि ठाकरे ने चुनाव पूर्व गठबंधन का मुद्दा खुला छोड़ा हुआ है.

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शिवसेना की रणनीति जनसभाओं में प्रधानमंत्री और बीजेपी की खुलकर आलोचना करना है, ताकि उसके सांसदों को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले मतदाताओं के एक तबके में छाई मौजूदा बीजेपी विरोधी लहर से बचाया जा सके. महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के बाद नवम्बर 2019 में होने हैं.

वैसे काफी संभावना है कि बीजेपी के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस अप्रैल-मई में लोकसभा चुनावों के साथ ही विधानसभा चुनाव कराना पसंद करें.

नए हालात का अर्थ ये भी है कि बीजेपी सिर्फ अपने अध्यक्ष अमित शाह पर ही गठबंधन की रूपरेखा तय करने पर निर्भर नहीं रह सकती. अरुण जेटली जैसे अन्य वरिष्ठ नेताओं को भी गठबंधन तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी.

अरुण जेटली पहले ही नीतीश कुमार के साथ विचार-विमर्श कर रहे थे. अमित शाह ने भी आपसी समझ विकसित करने के लिए नीतीश कुमार के साथ संबंध बेहतर किए हैं.

नए हालात में नई रणनीति आवश्यक है. बीजेपी आसानी से झुकने को तैयार नहीं. पर एनडीए की मज़बूती के लिए वह 2014 में जीती सीटों से भी कम सीटों पर चुनाव लड़ने की हद तक तैयार दिखती है.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व सीनियर एसोसिएट एडिटर और डेक्कन हेराल्ड के पूर्व राजनीतिक संपादक हैं.)

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