BJP से क्यों नाराज़ है उत्तर प्रदेश का NDA कुनबा

  • 28 दिसंबर 2018
अमित शाह, अनुप्रिया पटेल इमेज कॉपीरइट Facebook/AmitShah/AnupriyaSPatel

बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के घटक दलों की उठापटक और फिर सीटों के स्पष्ट बँटवारे के बाद अब नाराज़गी की आँच उत्तर प्रदेश में भी पहुंच चुकी है.

वैसे तो उत्तर प्रदेश में एनडीए के प्रमुख घटक सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर आए दिन राज्य सरकार और बीजेपी को आँखें दिखाते रहते हैं लेकिन अब एक अन्य अहम घटक दल अपना दल (एस) की ओर से भी बीजेपी को अल्टीमेटम मिलने लगा है.

अपना दल (एस) ने बीजेपी पर घटक दलों के साथ भेदभावपूर्ण बर्ताव करने और महत्व न देने का आरोप लगाया है. अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल केंद्र की मोदी सरकार में राज्य मंत्री हैं.

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Image caption आशीष पटेल, अनुप्रिया पटेल

'भाजपा ने बड़े भाई का धर्म नहीं निभाया'

बीबीसी से ख़ास बातचीत में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और अनुप्रिया के पति आशीष पटेल कहते हैं कि सहयोगी दलों के प्रति बीजेपी का ये उपेक्षापूर्ण रवैया तब से शुरू हुआ है जबसे उत्तर प्रदेश में एनडीए की सरकार बनी है.

आशीष पटेल कहते हैं, "मुख्य रूप से बीजेपी की प्रदेश इकाई का रवैया बेहद असहयोगात्मक है. सुहेलदेव समाज पार्टी और अपना दल (एस) के साथ आने से ही बीजेपी को दलितों-पिछड़ों का वोट मिला लेकिन सरकार बनने के बाद अब वो सहयोगी दलों की अहमियत को नज़रअंदाज कर रही है."

आशीष पटेल कहते हैं, "हमने बीजेपी के साथ 2014 का लोकसभा चुनाव और 2017 में विधानसभा चुनाव पूरी ताक़त और मेहनत से लड़ा जिसका परिणाम भी बेहतरीन रहा. हम दोनों ही दलों ने गठबंधन में छोटे भाई की भूमिका का बख़ूबी निर्वाह किया और अभी भी कर रहे हैं लेकिन बीजेपी बड़े भाई का धर्म अब तक नहीं निभा पाई."

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नाराज़गी की वजह

आशीष पटेल के मुताबिक, उनकी पार्टी ने कई बार बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस बारे में शिकायत की लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.

वो कहते हैं, "सरकार में रहते हुए भी लगता है हम सरकार में नहीं हैं. किसी भी सरकारी नियुक्ति या मनोनयन में हमारी सिफ़ारिश नहीं सुनी जाती. अब तक सैकड़ों की संख्या में सरकारी वकील बनाए गए हैं लेकिन हमारी सिफ़ारिश से एक भी व्यक्ति को नहीं बनाया गया."

अपना दल (एस) उत्तर प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनाव लड़ चुका है.

लोकसभा में इस पार्टी के दो सांसद जीते थे. विधानसभा में पार्टी के आठ विधायक हैं और पार्टी अध्यक्ष आशीष पटेल विधान परिषद के सदस्य हैं.

आशीष पटेल आरोप लगाते हैं कि केंद्रीय मंत्री होने के बावजूद अनुप्रिया पटेल को अब महत्व नहीं दिया जा रहा है, "पहले उन्हें उत्तर प्रदेश में होने वाले सरकारी कार्यक्रमों में बुलाया जाता था लेकिन अब तो स्वास्थ्य मंत्रालय के कार्यक्रमों में भी बुलाना बंद कर दिया गया है."

अपना दल (एस) एनडीए का एक ऐसा सहयोगी है जिसकी बीजेपी से नाराज़गी की ख़बर पिछले पांच साल के दौरान सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई.

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Image caption केंद्र सरकार में मंत्री हैं अनुप्रिया पटेल

'सबक लेने की ज़रूरत'

बिहार में एनडीए गठबंधन में उतार चढ़ाव और तीन राज्यों में बीजेपी की हार के बाद पार्टी की इस क़दर नाराज़गी को काफ़ी महत्वपूर्ण समझा जा रहा है.

हालांकि आशीष पटेल साफ़ तौर पर कहते हैं कि उनकी पार्टी 2019 का चुनाव एनडीए में रहकर ही लड़ेगी, लेकिन कार्यकर्ताओं की नाराज़गी के बहाने वो स्पष्ट संकेत भी देते हैं.

बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "जिन राज्यों में एनडीए हारा है उससे हमें सबक लेने की ज़रूरत है. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में जहां पिछड़ों और दलितों ने 324 सीटें जिताकर भारी बहुमत दिया है, वहां इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनकी अपेक्षाओं को भी ध्यान में रखना होगा. कहीं ऐसा न हो कि वे उपेक्षा के चलते कहीं और चले जाएं."

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प्रतिक्रिया से बच रही बीजेपी

हालांकि बीजेपी की ओर से अपना दल के आरोपों के बारे में अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है.

बीजेपी प्रवक्ता फ़िलहाल इस मुद्दे पर बात करने से बच रहे हैं लेकिन जानकारों का कहना है कि तीन राज्यों में बीजेपी की हार और बिहार में हुए सीट समझौते में गठबंधन में शामिल दलों का दबाव एनडीए के अन्य घटकों को भी प्रोत्साहित कर रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं, "केंद्र और उत्तर प्रदेश दोनों जगह बीजेपी के पास इतना बड़ा बहुमत है कि उसे गठबंधन में शामिल दलों के आगे झुकने की अब तक ज़रूरत ही नहीं थी. गठबंधन में शामिल दलों की भी अब तक चुपचाप बैठने की मजबूरी थी. लेकिन अब लोकसभा चुनाव को देखते हुए उससे ठीक पहले पार्टी की जो स्थिति बन रही है, उसने अब गठबंधन में शामिल दलों को फ्रंट फ़ुट पर ला दिया है. इस दबाव की राजनीति का असर भी पड़ेगा और यहां भी ये छोटे दल फ़ायदे में रहेंगे."

प्रधान कहते हैं कि बीजेपी अभी तक ओमप्रकाश राजभर की मुखरता के बावजूद उनकी अनदेखी कर रही थी लेकिन अब ऐसा करना शायद उसके लिए संभव न हो.

वो कहते हैं, "ग़ाज़ीपुर में सुहेलदेव पर डाक टिकट जारी करके और प्रधानमंत्री मोदी की जनसभा करके बीजेपी भले ही राजभर समुदाय को लुभाने की कोशिश करे लेकिन ओमप्रकाश राजभर का अपने समुदाय में महत्व इतने भर से नहीं ख़त्म हो जाएगा. राजभर जो मांग कर रहे हैं वो अपने समुदाय के लिए ही कर रहे हैं और फिर अब उनके पास भी विकल्प हैं."

पीएम मोदी पर निशाना

ओमप्रकाश राजभर तो अब सीधे प्रधानमंत्री पर निशाना साध रहे हैं. 29 दिसंबर को ग़ाज़ीपुर में होने वाली प्रधानमंत्री की जनसभा का बहिष्कार करने की घोषणा वो पहले ही कर चुके हैं.

सुहेलदेव पर डाक टिकट जारी करने के मामले में वो कहते हैं, "जब सरदार बल्लभ भाई पटेल की मूर्ति लग सकती है तो महाराजा सुहेलदेव राजभर की मूर्ति क्यों नहीं बनवाते? ई-मेल के ज़माने में डाक टिकट जारी कर झुनझुना मत थमाइए."

राजभर ने तो स्पष्ट कर दिया है कि यदि बीजेपी ने उनकी बातें नहीं मानीं तो वो उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटों पर और बिहार की 16 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेंगे.

जानकारों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने इन दो दलों के ज़रिए अन्य पिछड़ा वर्ग को अपनी ओर करने की कोशिश की थी और उसकी ये कोशिश ज़बरदस्त परिणाम में भी बदल गई.

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बीजेपी के सामने चुनौती

बीजेपी के सामने अब मुश्किल भी यही है कि वो इन दलों के दबाव के आगे उसी तरह झुके जैसा कि उसे बिहार मे झुकना पड़ा या फिर इन्हें नज़रअंदाज़ करके किसी और समीकरण की तलाश करे.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के मुताबिक, बीजेपी के लिए ऐसा करना 2014 में तो संभव भी था और आसान भी, लेकिन केंद्र में क़रीब पांच साल और राज्य में डेढ़ साल सरकार चलाने और सपा-बसपा के संभावित गठबंधन से मुक़ाबले की चुनौती के आगे यह सब टेढ़ी खीर है.

बीजेपी के लिए अब नई राजनीतिक गोटियां फेंकना और उन पर अन्य राजनीतिक दलों को खेलने के लिए विवश करना इसलिए भी आसान नहीं रहा क्योंकि अब उसे सिर्फ़ एनडीए के घटक दल ही नहीं बल्कि अपनी पार्टी के नेता भी रह-रह कर चुनौती पेश करने लगे हैं

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