झारखंड: 323 करोड़ के विज्ञापन ख़र्च पर घिरी रघुवर सरकार

  • 28 दिसंबर 2018
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झारखंड सरकार ने पिछले चार साल में विज्ञापनों पर तीन अरब से भी ज़्यादा रुपए खर्च किए हैं.

राज्य में विज्ञापन जारी करने वाली संस्था सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (पीआरडी) ने सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई) के तहत यह जानकारी दी है.

सरकार के अवर सचिव रामेश्वर लेयांगी ने बताया है कि राज्य सरकार ने साल 2014 से 12 दिसंबर 2018 तक विज्ञापन मद में ख़र्च के लिए 323 करोड़, 76 लाख, 81 हजार रुपये का आवंटन किया है.

इसमें से अधिकतर राशि खर्च भी कर दी गई है. इस दौरान दो वित्तीय वर्षो में सरकार ने एक रुपये भी नहीं बचाए और एक वित्तीय वर्ष में सिर्फ 620 रुपये की बचत की. इस साल 12 दिसंबर तक सरकार 62 करोड़ 20 लाख से भी अधिक रुपए ख़र्च कर चुकी है.

कोडरमा के सामाजिक कार्यकर्ता ओंकार विश्वकर्मा ने आरटीआई के तहत सरकार से यह जानकारी मांगी थी. सूचना एवं जनसंपर्क विभाग ने 17 दिसंबर को उनसे यह सूचना साझा की.

यह इत्तेफाक ही है कि यह सूचना झारखंड की भाजपा सरकार की चौथी वर्षगांठ से ठीक पहले सार्वजनिक हुई. इस कारण विपक्ष को बैठे-बिठाए बड़ा मुद्दा मिल गया है और संपूर्ण विपक्ष ने सरकार की आलोचना की है.

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भाजपा नेता रघुवर दास ने 28 दिसंबर 2014 को झारखंड के दसवें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी. अपने कार्यकाल के चार साल पूरे होने पर भी सरकार ने ख़ूब विज्ञापन दिए हैं.

पूरे राज्य में सरकार की उपलब्धियों के होर्डिंग्स लगाए गए हैं. साथ ही अ़खबारों और निजी चैनलों को भी विज्ञापन जारी किए गए हैं.

क्यों मांगी यह सूचना

ओंकार विश्वकर्मा ने बीबीसी से कहा, "मैं हर जगह सरकार के होर्डिंग्स देखता हूं. इनमे मुख्यमंत्री जी की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी होती हैं. अख़बारों के पहले पन्ने सिर्फ सरकारी विज्ञापनों से भरे रहते हैं. पहले ऐसा नहीं होता था."

"इस कारण मुझे जिज्ञासा हुई कि इन विज्ञापनों मे सरकार आखिर कितने पैसे खर्च कर रही है. तब मैंने आरटीआई लगाकर सरकार से इस ख़र्च का ब्योरा मांगा. इसमें ख़ुलासा हुआ कि चार साल के अंदर सरकार ने विज्ञापन मद में आवंटन सीधे दोगुना कर दिया है."

उन्होंने कहा कि साल 2014-15 के लिए इस मद में आवंटित 40 करोड़ की जगह 2018-19 में यह बजट 80 करोड़ कर दिया गया है.

"इस राज्य में लोगों की भूख से मौतें हो रही है और सरकार अपनी ब्रांडिंग करने में मस्त है. इन्हें बेपर्दा किया जाना चाहिए."

साल 2017 में 28 सितंबर को प्रदेश के सिमडेगा ज़िले के कारीमाटी में 11 साल की संतोषी कुमारी की मौत भूख से हो गई थी. उनकी मां कोयली देवी बताती हैं कि उनकी बेटी ने 'भात-भात' की रट लगाते हुए दम तोड़ दिया था.

यह मामला सुर्ख़ियों में रहा था और झारखंड समेत पूरे देश में भूख से हो रही मौत पर गंभीर बहसों की शुरुआत हुई थी. कुछ सोशल एक्टिविस्ट द्वारा तैयार किए गए आंकड़ों के मुताबिक़, पिछले चार साल के दौरान देश में 56 लोगों की मौत भूख से हो चुकी है. इनमें से 42 मौतें 2017-18 के दौरान हुई हैं. इन आंकड़ों को मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता रितिका खेड़ा और सिराज दत्ता ने स्वाति नारायण की मदद से तैयार किया है.

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विज्ञापनों की रघुवर सरकार

विपक्ष ने मुख्यमंत्री रघुवर दास पर सिर्फ विज्ञापनों की सरकार चलाने का आरोप लगाया है. विपक्ष का कहना है कि जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा विकास के बजाय विज्ञापनों पर खर्च करना उचित नहीं है.

पूर्व मुख्यमंत्री और झामुमो नेता हेमंत सोरेन ने कहा कि राज्य के किसान आंसू बहा रहे हैं, पारा शिक्षक हड़ताल पर विवश हैं और सरकार जश्न मनाने में लगी है, इससे ग़लत स्थिति और क्या हो सकती है.

'80 गुना बढ़ा विज्ञापनों का बजट'

झारखंड के पहले मुख्यमंत्री और झाविमो (प्र) के नेता बाबूलाल मरांडी ने कहा कि अगर आप मेरी सरकार के दौरान साल 2000-2001 में इस मद में हुए ख़र्च की तुलना मौजूदा स्थिति से करेंगे, तो आपको इसमें 70-80 गुना वृद्धि दिखेगी. आखिर ऐसा क्यों हो रहा है, यह समझने की जरुरत है.

बाबूलाल मरांडी ने बीबीसी से कहा, "चाहे नरेंद्र मोदी की सरकार हो या रघुवर दास की, इनकी पूरी व्यवस्था सिर्फ विज्ञापनों पर टिकी हुई है. धरातल पर कोई काम हुआ नहीं है."

"ऐसे में ये लोग चेहरा चमका कर जनता को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन, लोग सच जानते हैं इसलिए 2019 के चुनावों में जनता इन्हें नकारने जा रही है."

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सरकार का पक्ष

वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष के आरोपों को अनर्गल बताया है. पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता दीनदयाल बर्णवाल ने कहा कि सदन में हंगामा कर उसे नहीं चलने देने का दंभ भरने वाला विपक्ष अब जनता के पैसे की चिंता कर रहा है.

"यह बात तब समझ में क्यों नहीं आती जब वे सदन का बहिष्कार करते हैं. दरअसल ऐसे आरोप झारखंड को बदनाम करने की साजिश हैं."

दीनदयाल बर्णवाल ने बीबीसी से कहा, "सरकार ने सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के लिए आवंटित बजट से अधिक खर्च किया होता, तब ना."

"विज्ञापनो में उतना ही पैसा ख़र्च किया गया है, जिसका बजटीय प्रावधान था. क्या विज्ञापनों का प्रकाशन आवश्यक नहीं है. यह इसलिए भी जरुरी है, ताकि जनता जान सके कि सरकार उनके लिए किन योजनाओं पर क्या काम कर रही है."

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कम ख़र्च में भी हो सकता है विज्ञापन

हालांकि, वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक मधुकर भाजपा प्रवक्ता के तर्क से इत्तेफाक नहीं रखते.

मधुकर कहते हैं, "आदिम जनजाति के लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा है. भूख से मौत की ख़बरें लगातार आ रही हैं और सरकार विज्ञापनों पर अरबों रुपये के ख़र्च को जायज़ ठहरा रही है."

"यह दरअसल जनता के साथ धोखाधड़ी है. सरकार चाहती तो रेडियो और टीवी के ज़रिये कम ख़र्च में अपनी बात जनता तक पहुंचा सकती थी लेकिन जब आपको इस बहाने अपनी पसंद की विज्ञापन कंपनियों को लाभ पहुंचाना हो तो कोई क्या कर सकता है."

मधुकर मानते हैं कि इतने धन में तो पेयजल आपूर्ति की समस्या हल की जा सकती थी.

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