आर्य बाहर से भारत आए थे: नज़रिया

  • 2 जनवरी 2019
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भारतीय कौन हैं और वे कहां से आए?

पिछले कुछ सालों में इन सवालों पर होने वाली बहस और गरमा गई है.

हिंदू दक्षिणपंथी मानते हैं कि भारतीय सभ्यता उनसे निकली है, जो ख़ुद को आर्य कहते थे. यह घुड़सवारी करने वाले और पशुपालन करने वाले योद्धाओं और चरवाहों की एक घुमंतू जनजाति थी जिन्होंने हिंदू धर्म के सबसे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों यानी वेदों की रचना की थी.

वे कहते हैं कि आर्य भारत से निकले और फिर एशिया और यूरोप के बड़े हिस्सों में फैल गए. इसी से उन इंडो-यूरोपियन भाषाओं का विस्तार हुआ जो आज यूरोप और भारत में बोली जाती हैं.

एडोल्फ़ हिटलर और मानव जाति के इतिहास का अध्ययन करने वाले यूरोप के कई लोग 19वीं सदी में यह मानते थे कि आर्य ही वह मुख्य नस्ल थी जिसने यूरोप को जीता. लेकिन एडोल्फ़ हिटलर का मानना था कि आर्य नॉर्डिक थे यानी वे उत्तरी यूरोप से निकले थे.

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Image caption हड़प्पा काल की एक प्रतिमा

जब भी जानकार लोग आर्य शब्द इस्तेमाल करते हैं, इसका मतलब उन लोगों से होता है जो इंडो-यूरोपियन भाषाएं बोलते थे और ख़ुद को आर्य कहते थे. ऐसे में मैंने भी इस लेख में 'आर्य' को इसी संदर्भ में इस्तेमाल किया है. यह किसी नस्ल के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया है, जैसे कि हिटलर ने इसे इस्तेमाल किया या फिर कुछ हिंदू दक्षिणपंथी इसे इस्तेमाल करते हैं.

भारत के बहुत सारे विद्वानों ने 'भारत के बाहर से आने वाली' बात पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि ये इंडो-यूरोपीय भाषा बोलने वाले या आर्य शायद उन प्रागैतिहासिक ख़ानाबदोशों में से थे, जो पहले की किसी सभ्यता के कमज़ोर होने के बाद भारत आए थे.

यह हड़प्पा (या सिंधु घाटी) सभ्यता थी जो आज भारत के उत्तर-पश्चिम और पाकिस्तान में है. यह सभ्यता लगभग मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं के समय ही पनपी थी.

हालांकि, हिंदू दक्षिण पंथी मानते हैं कि हड़प्पा सभ्यता ही आर्यन या वैदिक सभ्यता थी.

इन विरोधाभासी विचारों का समर्थन करने वाले दो समूहों के बीच का तनाव हाल के कुछ सालों में बढ़ा है, ख़ासकर 2014 में हिंदू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद.

इस पुराने विवाद में अब पॉप्युलेशन जेनेटिक्स का अध्ययन विषय जुड़ गया है जो अपेक्षाकृत नया है. इसमें प्राचीन डीएनए के माध्यम से पता लगाया जाता है कि कब लोग कहां गए.

प्राचीन डीएनए के माध्यम से किए जाने वाले शोध ने पूरी दुनिया में इतिहास का पुर्नलेखन किया है. भारत में भी अब एक के बाद एक रोमांचक जानकारियां सामने आ रही हैं.

इस विषय पर सबसे ताज़ा अध्ययन जेनेटिसिस्ट (आनुवांशिकी विज्ञानी) हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के डेविड रेक ने किया है. मार्च 2018 में छपे इस शोध में पूरी दुनिया के 92 विद्वान सह-लेखक हैं. इनमें से कई नाम ऐसे हैं जो जेनेटिक्स, इतिहास, पुरातत्व और मानव-शास्त्र के प्रतिष्ठित विद्वान हैं.

इस शोध का शीर्षक The Genomic Formation of South and Central Asia है और यह कई चौंका देने वाली बातें सामने रखता है.

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Image caption गुजरात में भी हड़प्पा सभ्यता के अंश हैं

शोध दिखाता है कि पिछले 10 हज़ार सालों में भारत में दो मौक़ों पर बड़ी संख्या में लोग आए.

पहले तो दक्षिण-पश्चिम ईरान के ज़ैग्रोस प्रांत से बड़े पैमाने पर लोग भारत में आए. इनमें कृषक और संभवत: पशुपालक भी थे. ज़ैग्रोस वही इलाक़ा है, जहां इंसान द्वारा पहली बार बकरी को पालतू बनाने के सबूत मिले हैं.

यह 7,000 से 3,000 ईसा पूर्व के बीच हुआ होगा. इन ज़ैग्रोसयाई पशुपालकों का भारतीय उपमहाद्वीप पर पहले से रह रहे लोगों के साथ मिश्रण हुआ. यहां पर पहले से रहने वाले लोग जिन्हें आप शुरुआती भारतीय या फर्स्ट इंडियंस कह सकते हैं, वे 65000 साल पहले एकसाथ अफ़्रीका से भारत आए थे. इन्हें आउट ऑफ़ अफ़्रीका या OoA माइग्रेंट कहा जाता है. तो इस तरह इन दोनों ने मिलकर हड़प्पा सभ्यता बसाई.

2000 ईसा पूर्व की शताब्दियों में यूरेज़ियन स्टेपी (घास के मैदानों) से प्रवासियों का दूसरा जत्था आया. संभवत: वे उस हिस्से से आए थे, जिसे आज कज़ाख़स्तान कहा जाता है.

इस बात की संभावना है कि यही लोग संस्कृत का शुरुआती प्रारूप अपने साथ लाए. वे घुड़सवारी करना और बलि परंपरा जैसे नई सांस्कृतिक तौर-तरीक़े भी अपने साथ लाए. इसी से हिंदू/वैदिक संस्कृति का आधार बना. (एक हज़ार साल पहले यूरोप में भी स्टेपी से लोग गए थे जिन्होंने वहां के खेतिहरों की जगह ली थी या उनके साथ मिश्रित हो गए. इसी से नई संस्कृतियां उभरी थीं और इंडो-यूरोपीय भाषाओं का विस्तार हुआ था.)

अन्य जेनेटिक शोध भी भारत में बाहर से लोगों के आने पर रोशनी डालते हैं. जैसे कि इससे यह भी पता चलता है कि दक्षिण-पूर्व एशिया से आए दक्षिण ऑस्ट्रियाई-एशियाई भाषाएं बोलने वाले कब आए थे.

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Image caption हरिद्वार में कुंभ मेले के लिए जाते तीर्थयात्री

जैसा कि मैंने अपनी किताब में लिखा है, अगर भारत की आबादी को समझना है तो ऐसा मान लीजिए कि यह एक पित्ज़ा है. भारत के शुरुआती लोग, जिन्हें पहले भारतीय या फ़र्स्ट इंडियंस कहा जाता है, वे इस पित्ज़ा का बेस हैं. इस पित्ज़ा का बेस कुछ हिस्सों में बाक़ी हिस्सों की तुलना में पतला है. फिर भी यह बाक़ी पित्ज़ा के लिए एक बेस की तरह काम कर रहा है क्योंकि अध्ययन बताता है कि भारतीयों की जेनेटिक्स में 50 से 65 प्रतिशत का हिस्सा फ़र्स्ट इंडियंस का है.

इस बेस के टॉप पर सॉस है जो पूरे पित्ज़ा पर फैली हुई है. इस सॉस को आप हड़प्पा सभ्यता मान लीजिए. फिर टॉपिंग्स और चीज़ का नंबर आता है. तो ये ऑस्ट्रियाई-एशियाआई, तिब्बती-बर्मी और भारतीय-यूरोपियन भाषा बोलने वाले या आर्य हैं. ये वो लोग हैं जो बाद में भारतीय उपमहाद्वीप में आए.

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दुनिया के आख़िरी शद्ध आर्य

हिंदू दक्षिणपंथियों में कई को ये बातें पसंद नहीं आएंगी. वे तो स्कूलों का सिलेबस बदलने और वहां पर आर्यों के बाहर से आने का ज़िक्र हटाने को लेकर अभियान चलाते रहे हैं. ट्विटर पर इतिहास की बात करने वाले कई प्रसिद्ध दक्षिण पंथी हैंडल भारत के उन प्रमुख इतिहासकारों को निशाना बनाते रहे हैं, जो आर्यों के बाहर से आने के सिद्धांत का समर्थन करते हैं.

अगर हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल है कि आर्य भारत के पहले निवासी नहीं थे और हड़प्पा संस्कृति उनके आने से पहले से मौजूद थी.

इसका मतलब यह मानना होगा कि भारतीय सभ्यता का उद्गम आर्यों या उनकी वैदिक संस्कृति में नहीं बल्कि कहीं और है.

मीडिया में हाल ही में भारत के मानव संसाधन राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह का बयान छपा था, जिसमें उन्होने कहा था, "हमारे बच्चों को सिर्फ़ वैदिक शिक्षा ही विकसित कर सकती है और उन्हें मानसिक अनुशासन वाले देशभक्त बना सकती है."

हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए विभिन्न समूहों के मिश्रण का विचार भी पसंद नहीं आता क्योंकि वे नस्लीय शुद्धता को ज़्यादा तरजीह देते हैं.

ऊपर से बाहर से आने की थ्योरी आर्यों को बाद में भारत पर अधिकार करने वाले मुस्लिमों, जैसे कि मुग़लों की ही श्रेणी में डाल देती है.

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Image caption वाराणसी में अभ्यास करते युवा ब्राह्मण

ये सिर्फ़ सैद्धांतिक बहस नहीं है. देश की राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा में सत्ताधारी बीजेपी सरकार ने मांग की है कि हड़प्पा सभ्यता का नाम बदलकर सरस्वति नदी सभ्यता कर दिया जाए. चूंकि शुरुआती चार वैदिक ग्रंथों में सरस्वति नदी अहम नदी है, ऐसे में इसका नाम इस्तेमाल करने से सभ्यता और आर्यों के बीच संबंध मज़बूत होगा.

नया अध्ययन इन चर्चाओं पर विराम लगाता है और यह हिंदू दक्षिणपंथियों के लिए झटका है. सत्ताधारी पार्टी के सांसद और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर सुब्रमण्यन स्वामी ने इस अध्ययन के सह लेखक प्रोफ़ेसर रेक पर एक ट्वीट के ज़रिये हमला करते हुए लिखा है, "इसमें झूठ हैं, घिनौनै झूठ और (हार्वर्ड की तीसरी रेक एंड कंपनी के) आंकड़े हैं."

हालांकि नए रिसर्च से जो असली संदेश निकलता है, वह बहुत रोमांचक और आशापूर्ण है. वो ये कि भारतीयों ने विभिन्न वंशों और इतिहासों से एक चिर-स्थायी सभ्यता का निर्माण किया है.

भारतीय सभ्यता का सबसे अच्छा गुण समावेश करना यानी सबको अपने में मिलाना रहा है, न कि बहिष्कार करना. विविधता में एकता असल में भारत के अनुवांशिक ताने-बाने की आत्मा है.

टोनी जोज़फ़ अर्ली इंडियंस: द स्टोरी ऑफ़ आर एनसेस्टर्स एंड वेयर वी केम फ्रॉम' के लेखक हैं.

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