उत्तर प्रदेश: अवैध हिरासत में दलित की मौत, ना संवेदना मिली ना सहायता

  • 30 दिसंबर 2018
पुलिस हिरासत में दलित की मौत

दिसंबर की एक सर्द रात में गुड्डी अमरोहा के पोस्टमार्टम हाउस के बाहर हाथ में एक लाख रुपए लिए खड़ी हैं.

पड़ोसियों, रिश्तेदारों और मिलने वालों से उधार लिए ये पैसे अब उनके किसी काम के नहीं हैं.

जिस बालकिशन को हवालात से छुड़ाने के लिए ये पैसे उन्हें कथित तौर पर पुलिस अधिकारी को रिश्वत के तौर देने थे, उनकी लाश का अब पोस्टमार्टम होना है.

उत्तर प्रदेश के अमरोहा ज़िले की धनौरा तहसील में बसी मुस्तकमपुर गांव के रहने वाले बालकिशन की पुलिस की अवैध हिरासत में संदिग्ध हालात में बीते बुधवार को मौत हो गई थी.

बालकिशन के परिवार का आरोप है कि धनौरा थाने की पुलिस ने उन्हें चार दिन तक गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखकर प्रताड़ित किया.

जिस धनौरा थाने की हवालात में उन्हें रखा गया था उसी में अब उनकी हत्या का मुक़दमा दर्ज हो गया है.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया है.

पुलिसवाले अभियुक्त बनाए गए

थाने के एसएचओ अरविंद मोहन शर्मा, सब-इंस्पेक्टर मनोज उपाध्याय, सिपाही विनीत चौधरी, सिपाही जितेंद्र बांसले, सिपाही विवेक काकराज, हेड मोहर्रिर रविंद्र राणा समेत थाने के अन्य कर्मचारियों को बालकिशन की हत्या के केस में अभियुक्त बनाया गया है.

परिवार के सभी आरोपों पर अमरोहा के पुलिस उपाधीक्षक ब्रजेश सिंह कहते हैं, "परिवार की शिकायत के आधार पर हत्या का मुक़दमा दर्ज किया गया है. अन्य सभी आरोपों की जांच गजेटेड अधिकारी से कराई जा रही है."

ब्रजेश सिंह का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बालकिशन की मौत की वजह 'दिल का दौरा' बताया गया है.

वहीं बालकिशन के परिवार का आरोप है कि उन्हें अवैध हिरासत में प्रताड़ित किया गया जिसकी वजह से उनकी जान गई.

'एक लाख रुपए रिश्वत दी'

37 वर्षीय बालकिशन इको कार चलाकर परिवार का गुज़ारा करते थे. उनकी करीबी रिश्तेदार गुड्डी के मुताबिक रविवार देर शाम जब वो लौट रहे थे तब पुलिस ने दस्तावेज़ों की जांच के लिए उनकी कार रोकी. बालकिशन के पास पूरे दस्तावेज़ नहीं होने पर पुलिस ने कार ज़ब्त कर ली और उन्हें थाने में बिठा लिया.

बालकिशन को बताया गया कि जो कार वो चला रहे हैं वो चोरी की है और अब उन पर कार चोरी का मुक़दमा चलेगा.

उनके परिवार का दावा है कि कार एक डीलर से ख़रीदी गई थी और वो बीते एक साल से इससे सवारियां ढो रहे थे.

गुड्डी कहती हैं, "हम अगले दिन थाने गए और पुलिस से उन्हें छोड़ने के गुहार लगाई. जब उन्होंने छोड़ने से इनकार किया तो हमने कहा कि अदालत में पेश करके जेल भेज दो हम ज़मानत करा लेंगे लेकिन पुलिस ने हमसे पांच लाख रुपए रिश्वत की मांग की."

गुड्डी के मुताबिक चौबीस घंटे अवैध हिरासत में रखने के बाद भी जब बालकिशन को न जेल भेजा गया और न छोड़ा गया तो परिवार रिश्वत की व्यवस्था करने लगा.

वो कहती हैं, "यार-रिश्तेदारों से पैसे लिए, ब्याज़ पर क़र्ज़ लिया, छोटा-मोटा सामान बेचकर किसी तरह एक लाख रुपए की व्यवस्था की. मंगलवार शाम हम ये पैसे लेकर थाने पहुंचे. इंस्पेक्टर मनोज उपाध्याय ने पैसे लेने के बाद कहा कि एक लाख रुपए कल और लेकर आना और उन्हें ले जाना."

उनका कहना है, "बुधवार को जब हम एक लाख रुपए और लेकर थाने पहुंचे तो हमें बताया गया कि बालकिशन की तबियत ख़राब हो गई है और उन्हें ज़िला अस्पताल ले जाया गया है. अस्पताल पहुंचे तो हमें बताया गया कि उनकी मौत हो गई है."

गुड्डी जब बालकिशन की लाश लेने पोस्टमार्टम हाउस पहुंची थी, तब भी वो एक लाख रुपए उनके पास थे. वो रोते हुए कहती हैं, "ये कौन सा क़ानून है जो ग़रीबों की जान ले रहा है. ब्याज़ पर क़र्ज़ लेकर भी जान नहीं बच पा रही है."

बालकिशन की मौत के बाद स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन किया था, जिस दौरान एसडीएम की गाड़ी भी तोड़ दी गई थी.

वहीं बालकिशन की पत्नी कुंती पति की मौत के बाद सुधबुध खो चुकी हैं. रोते-रोते आवाज़ उनके गले में दबी रह जाती है. बहुत कोशिश करके वो इतना ही कह पाती हैं, "मेरे छोटे-छोटे बच्चों का अब क्या होगा. उन्हें इंसाफ़ मिलना चाहिए."

कुंती और उनके परिवार से मिलने कोई जनप्रतिनिधि अभी तक नहीं पहुंचा है. भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय विधायक राजीव तरारा ने गांव के लोगों को संबोधित करके बालकिशन को न्याय दिलाने का भरोसा दिया.

'दलित होने की वजह से नहीं मिली मदद?'

छठी क्लास में पढ़ने वाली बालकिशन की बेटी घर के एक कोने में गुमसुम बैठी हैं. वो अपने अबोध भाई को चुप कराने की कोशिश करती हैं.

गुड्डी कुंती के भाई की पत्नी हैं और इन मुश्किल हालातों में वो परिवार का सहारा बनने की कोशिश कर रही हैं.

वो सवाल करती हैं, "जो एक लाख रुपए हमने उन्हें छुड़ाने के लिए दिए थे वो किसी तरह वापस करवा दो."

इस कथित रिश्वत के सवाल पर एएसपी ब्रजेश सिंह कहते हैं, "परिवार के सभी आरोपों की गंभीरता से जांच की जा रही है. जांच में जो भी सामने आएगा उसी के आधार पर कार्रवाई की जाएगी."

स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता जितेश चौधरी बालकिशिन को इंसाफ़ दिलाने की मांग करने वाले प्रदर्शनकारियों में शामिल थे.

जितेश सवाल करते हैं, "लखनऊ में जब विवेक तिवारी पुलिस के हाथों मारे गए तो पूरा प्रदेश हिल गया. पुलिसकर्मियों को तुरंत गिरफ़्तार किया गया और परिवार को नौकरी के अलावा आर्थिक मदद भी दी गई. बालकिशन की मौत भी पुलिस के हाथों हुई लेकिन न कोई गिरफ़्तार हुआ न कोई मदद मिली. उनके परिवार को न संवेदना मिल रही है, न आर्थिक सहयोग और न राजनीतिक हमदर्दी. इसकी वजह सिर्फ़ यही है कि वो दलित परिवार से हैं."

शनिवार को स्थानीय दलित समुदाय ने बालकिशन को न्याय दिलाने के लिए सम्मेलन भी किया. सम्मेलन में शामिल समाजवादी पार्टी के टीपी सिंह ने कहा कि परिवार को इंसाफ़ दिलाने के लिए आंदोलन किया जाएगा.

वहीं बहुजन समाज पार्टी की सरकार में मंत्री रहे आरके चौधरी कहते हैं, "भारत के संविधान ने भले ही दलितों को सभी नागरिकों के बराबर अधिकार दिए हैं लेकिन समाज में उन्हें बराबरी मिलना अभी बाकी है. अगर दलित बराबर होते तो बालकिशन की मौत की भी ऐसे ही चर्चा होती जैसे विवेक तिवारी की मौत की हुई थी."

वो कहते हैं, "बाल किशन की मौत प्रदेश की ख़राब क़ानून व्यवस्था का उदाहरण है. लेकिन कोई इस पर चर्चा नहीं करेगा क्योंकि इससे योगी आदित्यनाथ की सरकार पर सवाल उठेंगे."

उधर, स्थानीय प्रशासन का कहना है कि वो बालकिशन के परिवार को आर्थिक मदद देने के विकल्प तलाश रहा है.

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