छत्तीसगढ़: दनादन फ़ैसले, पर पैसा कहाँ से लाएगी सरकार?

  • आलोक प्रकाश पुतुल
  • रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिये
छत्तीसगढ़, किसान, कर्ज़ माफ़

कांग्रेस पार्टी के लिये यह राहत की बात हो सकती है कि सरकार बनने के 10 दिनों के भीतर कर्ज़ माफ़ी की शुरुआत पिछले गुरुवार से हो गई है और किसानों के खाते में पैसे भी आने शुरू हो गये हैं.

सरकार का दावा है कि गुरुवार को 3 लाख 57 हज़ार किसानों के खाते में 1,248 करोड़ की रकम ट्रांसफ़र भी कर दी गई है.

राज्य के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कहते हैं, "राज्य सरकार पक्के वादे और नेक इरादे के साथ अपना वचन पूरा कर रही है."

छत्तीसगढ़ में 15 सालों तक सत्ता से बाहर रही कांग्रेस पार्टी की सरकार ताबड़तोड़ फ़ैसले ले रही है. शाम को मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपने अधिकारियों के साथ बैठक करते हैं और देर रात फ़ैसले जारी हो जा रहे हैं.

अलग-अलग इलाकों के पचासों कलेक्टर, कमिश्नर, एसपी प्रशासनिक फेरबदल में इधर से उधर हो चुके हैं.

रामानुजगंज से लेकर कोंटा तक भूपेश बघेल के देर रात आने वाले फ़ैसलों की चर्चा हो रही है. कुछ फ़ैसले ऐसे भी हैं, जिन्होंने राज्य से बाहर भी अपनी धमक बनाई है.

लेकिन इन फ़ैसलों को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं.

भाजपा की सरकार में कई विभागों के मंत्री रहे विधायक अजय चंद्राकर कहते हैं, "कांग्रेस कभी भी अपना वादा नहीं निभाती. कांग्रेस की कोई विश्वसनीयता नहीं है, उनके नेताओं की कोई विश्वसनीयता नहीं है."

हालांकि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का दावा है कि उनकी पार्टी ने चुनाव के समय जो जनघोषणा पत्र जारी किया था, उसके एक-एक वादे को उनकी सरकार पूरा करेगी.

बघेल कहते हैं, "हमने 10 दिनों में किसानों की कर्ज़ माफ़ करने का वादा किया था, धान का समर्थन मूल्य 2,500 करने का वादा किया था. जिस दिन मैंने शपथ ली, उसी दिन इन दोनों वादों पर हमने अमल कर दिया."

लेकिन इस कर्ज़ माफी की प्रक्रिया के पूरे होने में कई महीने लगने की आशंका है. इसके आलावा धान के समर्थन मूल्य के समायोजन में भी और वक़्त लग सकता है.

कर्ज़ माफ़ी और धान का समर्थन मूल्य

कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में किसानों के अल्पकालीन कृषि ऋण पूरी तरह से माफ़ करने का वादा किया था. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 17 दिसंबर को शपथग्रहण करने के साथ ही मंत्रिमंडल की बैठक में इस फ़ैसले पर मुहर लगा दी और 19 दिसंबर को कृषि ऋण माफ़ करने का आदेश भी जारी कर दिया गया.

सरकार का दावा है कि इस फ़ैसले से छत्तीसगढ़ की सहकारी समितियों के 16 लाख से ज्यादा किसानों को 6100 करोड़ रुपये के ऋण से मुक्ति मिलेगी.

इसके अलावा धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में धान का समर्थन मूल्य 1750 रुपये से बढ़ा कर 2500 करने का आदेश भी सरकार ने जारी कर दिया.

2013 में भारतीय जनता पार्टी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में धान का समर्थन मूल्य बढ़ाने का वादा किया था. लेकिन रमन सिंह ने तीसरी बार सत्ता की कमान संभालने के बाद केंद्र सरकार को समर्थन मूल्य बढ़ाने की एक चिट्ठी भेज कर चुप्पी साध ली.

अब इतने सालों बाद कांग्रेस पार्टी ने जब किसानों का ऋण माफ़ करने और धान का समर्थन मूल्य बढ़ाने का आदेश जारी किया है तो बीजेपी को लगता नहीं है कि इस फ़ैसले को कांग्रेस पार्टी की सरकार लागू कर पाएगी.

बीजेपी के प्रवक्ता श्रीचंद सुंदरानी कहते हैं, "ईश्वर करे कि किसानों को लाभ मिल जाये. लेकिन हम जानते हैं कि यह सारी घोषणा केवल घोषणा बन कर रह जायेगी."

किसे मिलेगा लाभ

धान का समर्थन मूल्य बढ़ाये जाने और कृषि ऋण माफ़ करने का लाभ कितने किसानों को मिलेगा, यह भी बड़ा सवाल है.

आंकड़ों में देखें तो लगभग पौने तीन करोड़ की आबादी वाले छत्तीसगढ़ में 43 लाख किसान परिवार हैं.

राज्य में कर्ज़ लेने वाले किसानों की संख्या महज़ 16 लाख है. इसी तरह राज्य में समर्थन मूल्य पर धान बेचने के लिये पंजीयन कराने वाले किसानों की संख्या 16 लाख 90 हज़ार है.

अर्थशास्त्री जे एल भारद्वाज कहते हैं, "राज्य में 62 प्रतिशत ग़रीब और सीमांत किसान हैं, जिन्हें इसका कोई लाभ नहीं मिलेगा. चाहे ऋण माफ़ी हो या समर्थन मूल्य, इसका लाभ केवल मध्यम और बड़े किसानों को ही होगा."

इसके अलावा अधिकांश सीमांत किसान साहूकारों के कर्ज़ तले दबे हुये हैं. उन्हें भी सरकार के इस फ़ैसले से कोई लाभ नहीं होगा.

समर्थन मूल्य और कृषि ऋण के लिये पैसों के इंतज़ाम को लेकर भी कई सवाल हैं.

छत्तीसगढ़ का इस साल का बजट 94 हजार 775 करोड़ रुपये का था. 6100 करोड़ रुपये की कर्ज़ माफ़ी और 75 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी पर आने वाला अतिरिक्त खर्च 6300 करोड़ रुपये मिला कर राज्य पर लगभग 12,400 करोड़ रुपये का भार आयेगा.

बजट की कमी

13वें वित्त आयोग द्वारा तय सकल घरेलू उत्पाद के 20 प्रतिशत ऋण सीमा पिछले साल 18.47 प्रतिशत और इस साल पहले से ही 20 प्रतिशत अनुमानित है.

बीजेपी प्रवक्ता श्रीचंद सुंदरानी कहते हैं, "छोटा राज्य है, छोटा बजट है. यहां तो विकास कार्य के लिये बजट की कमी रहती है. ऐसे में सरकार पैसा कहां से लायेगी?"

अर्थशास्त्री जे एल भारद्वाज का दावा है कि सरकार के पास शिक्षा और स्वास्थ्य समेत दूसरे विकास कार्यक्रम का जो पैसा है, उस रक़म को सरकार कृषि ऋण माफ़ी और समर्थन मूल्य के लिये उपयोग करेगी.

भारद्वाज कहते हैं, "सरकार का खज़ाना खाली है. सरकार के इस क़दम से विकास के काम प्रभावित होंगे, यह तो तय है."

मुख्यमंत्री बघेल क्या कहते हैं?

लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इस बात से सहमत नहीं हैं कि अपने वादे को पूरा करने में पैसों की कमी कहीं आड़े आएगी.

बघेल कहते हैं, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मित्र उद्योगपतियों के साढ़े तीन लाख करोड़ माफ़ किए हैं. दूसरी ओर दर-दर भटकने और आत्महत्या करने को मज़बूर किसान का कर्ज़ माफ़ करने पर बीजेपी सवाल खड़े कर रही है. यह दोहरा चरित्र चकित करने वाला है."

टाटा की ज़मीन आदिवासियों को वापस

देश में पहली बार उद्योग के लिये ली गई ज़मीन की वापसी का आदेश भूपेश बघेल की सरकार ने दिया है.

बस्तर के लोहांडीगुड़ा इलाके में स्टील प्लांट लगाने के लिये बीजेपी सरकार के साथ 2005 में टाटा ने एमओयू किया था. आदिवासी शुरू से ही इस स्टील प्लांट का विरोध करते रहे लेकिन सरकार ने नियमों को दरकिनार कर दस गांवों के 1707 आदिवासियों और किसानों से लगभग 1784 हेक्टेयर ज़मीन का अधिग्रहण कर लिया.

इनमें से 1,165 किसानों को 42.7 करोड़ का मुआवज़ा भी बांट दिया गया लेकिन 542 किसानों ने मुआवजा लेने से भी इंकार कर दिया. 2016 में टाटा ने इस परियोजना से हाथ खींच लिये और स्टील प्लांट की योजना रद्द हो गई.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला कहते हैं, "भूमि अधिग्रहण क़ानून के तहत अगर 5 साल तक किसानों की ज़मीन पर कोई काम शुरू नहीं होता तो उसे किसानों को वापस लौटाने का नियम है. लोहांडीगुड़ा के मामले में तो हाईकोर्ट ने भी निर्देश दिये थे. लेकिन बीजेपी सरकार सारे नियम-क़ानून को ताक पर रख कर किसानों की ज़मीन पर कब्ज़ा जमाये बैठी रही."

राजस्व विभाग ने किसानों को उनकी ज़मीन वापस लौटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है और माना जा रहा है कि जल्दी ही किसानों को उनकी ज़मीन वापस मिल जायेगी.

लेकिन लोहांडीगुड़ा के अलावा जांजगीर-चांपा, कोरबा और रायगढ़ ज़िले में भी ऐसे कई मामले हैं, जहां सरकार और औद्योगिक घरानों ने इसी तर्ज़ पर किसानों की ज़मीन पर कब्ज़ा कर रखा है. इन ज़मीनों का क्या होगा, सरकार इस पर चुप है.

पिछली सरकार में वन मंत्री रहे बस्तर के आदिवासी नेता महेश गागड़ा कहते हैं, "ज़मीन वापसी का आदेश ज़ारी करके कांग्रेस सरकार वाहवाही ज़रूर लूट रही है लेकिन बस्तर में ऐसे हालात रहे तो औद्योगिक घराने कहां से आयेंगे? हमारी सरकार ने एक अनुकूल वातावरण बनाने की कोशिश की थी. लेकिन कांग्रेस सरकार का यह फ़ैसला बस्तर को पीछे ले जाने वाला साबित होगा."

झीरम कांड की एसआईटी

भूपेश बघेल ने सरकार की कमान संभालते ही बस्तर के झीरम में हुये माओवादी हमले की एसआईटी जांच का आदेश भी जारी किया है.

25 मई 2013 को भारत में किसी राजनीतिक दल पर हुये इस सबसे बड़े माओवादी हमले में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेताओं समेत 29 लोग मारे गए थे.

मारे जाने वालों में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ला, प्रदेश के पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद महेंद्र कर्मा, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, पूर्व विधायक उदय मुदलियार और कांग्रेस नेता योगेंद्र शर्मा शामिल थे.

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पिछले साढ़े पांच सालों में कई बार आरोप लगा चुके हैं कि कांग्रेस पार्टी के नेताओं की हत्या एक राजनीतिक साजिश है. उन्होंने पूरे मामले की सीबीआई से जांच कराने की भी मांग की.

लेकिन विधानसभा में सरकारी घोषणा के बाद भी मामले की जांच नहीं हुई.

राज्य की बीजेपी सरकार ने घटना के अगले ही दिन मामले की एनआईए से जांच कराने की घोषणा की लेकिन एनआईए की जांच में पूरे मामले के पीछे के कारण की कोई जांच ही नहीं हुई.

राज्य सरकार ने मामले की न्यायिक जांच भी शुरू की थी. लेकिन साढ़े पांच साल बाद भी यह जांच अब तक पूरी नहीं हुई है.

भूपेश बघेल कहते हैं, "हमारे शहीद नेताओं और सुरक्षाबल के जवानों को आज तक न्याय नहीं मिला. इस एसआईटी जांच से सारे राज खुलने की उम्मीद है कि आखिर इस हमले के पीछे कौन-सी ताकतें थीं."

इस हमले में घायल हुये भूपेश बघेल सरकार के मंत्री और आदिवासी नेता कवासी लखमा का कहना है कि मामले की जांच होगी तो कथित रूप से बीजेपी के कई लोगों की संदेहास्पद भूमिका सामने आयेगी.

लेकिन इस एसआईटी जांच की हक़ीक़त ये है कि बस्तर के थाने में इस हमले का कोई भी महत्वपूर्ण दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है. राज्य सरकार ने सारे दस्तावेज़ एनआईए को सौंप दिये थे और अदालत में चालान पेश करने के बाद एनआईए भी इन दस्तावेज़ों से पल्ला झाड़ सकती है.

इसके अलावा घटना के साढ़े पांच साल बाद इस हमले के सबूत एकत्र करना भी बहुत आसान नहीं होगा.

गृह विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, "एनआईए से दस्तावेज़ हासिल करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती होगी. इसके बाद ही जांच की शुरुआत हो सकेगी और तब भी यह सवाल बना रहेगा कि इतने सालों बाद आख़िर कितने प्रमाण, कॉल रिकॉर्ड, गवाहों के बयान एसआईटी एकत्र कर पायेगी."

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