मृणाल सेनः बम्बइया सिनेमा को चुनौती देने वाला फ़िल्मकार

  • 30 दिसंबर 2018
मृणाल सेन इमेज कॉपीरइट Getty Images

मनुष्यता और मासूमियत का एक स्पर्श कठोर चट्टान को भी कोमल बना देता है.

एक सख़्त दिल और रूखे व्यक्तित्व का बड़ा रेलवे अफ़सर भुवन शोम बत्तखों का शिकार करने के मक़सद से गुजरात के देहाती-रेगिस्तानी इलाक़े में जाता है जहां एक निश्छल, कोमल, प्रकृति के बीच रहने वाली युवती का व्यवहार और उसकी संवेदना उसे फिर से संवेदनशील मनुष्य बना देती है.

आदिवासी युवती गौरी के भीतर शोम साहब एक 'मरती हुई दुनिया में धड़कती हुई नस को महसूस करते हैं और अचानक हर चीज़ आलोकित हो उठती है, और वे एक नयी प्रसन्नता को पा जाते हैं.'

मनुष्य के रूपान्तरण की यह फ़िल्म थी 'भुवन शोम' और फ़िल्मकार थे मृणाल सेन, जो तब तक बांग्ला में 'नील आकाशेर नीचे' और 'बाइशे श्रावण' जैसी फ़िल्में बना चुके थे.

'भुवन शोम' उनकी पहली हिंदी फ़िल्म थी और उसे वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशन और सवश्रेष्ठ अभिनय (उत्पल दत्त) का पुरस्कार प्राप्त हुआ.

समानांतर सिनेमा का आगाज़

1970 के दशक में हिंदी में एक ऐसे कलात्मक सिनेमा का आगाज़ हुआ था, जिसे बम्बइया व्यावसायिक सिनेमा के बरक्स 'समानांतर सिनेमा' कहा गया और जिसने अगले करीब डेढ़ दशक तक मुख्यधारा की फूहड़ फ़िल्मों को सार्थक चुनौती दी.

इस नए सिनेमा की आरंभिक फ़िल्में थीं: 'भुवन शोम' और उसी के आसपास निर्मित मणि कौल की 'उसकी रोटी', जो एक ट्रक ड्राईवर और उसके लिए रोज़ खाना लेकर सड़क के किनारे इंतज़ार करती पत्नी के मार्फ़त स्त्री जीवन की विडम्बना को अनोखी शैली में चित्रित करती थी.

यह एक ऐतिहासिक शुरुआत थी जिसने हिंदी ही नहीं, कन्नड़, उड़िया, मलयालम, गुजराती आदि में भी सिनेमा के नए शिल्पों को जन्म दिया.

हिंदी में 'आषाढ़ का एक दिन' (मणि कौल) 'सारा आकाश' (बासु चटर्जी), 'गरम हवा' (एम एस सत्यू), '27 डाउन' (अवतार कॉल), 'अंकुर', 'मंथन', भूमिका' (श्याम बेनेगल),' स्पर्श'(सई परांजपे), 'अरविन्द देसाई की अजीब दास्तान ', 'अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है' (सईद मिर्ज़ा), 'आक्रोश','पार्टी' ( गोविन्द निहालानी) आदि इस मुहावरे की उल्लेखनीय कृतियां हैं.

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बांग्ला सिनेमा और मृणाल सेन

बांग्ला के नए सिनेमा की तीन धाराएं सत्यजित रॉय, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन से निर्मित हुईं जिसने उसे अंतरराष्ट्रीय पहचान देने का काम किया.

रॉय की 'पाथेर पांचाली' (1955) के बाद ऋत्विक घटक की 'अजांत्रिक' और मृणाल सेन की 'नील आकाशेर नीचे' उसकी आरंभिक कृतियाँ है.

ख़ास बात यह है कि तीनों फ़िल्मकार अपने समय, यथार्थ और मानव नियति से जुड़े होने के बावजूद अपनी सिनेमाई भाषा में एक-दूसरे से काफ़ी अलग थे.

रॉय की शैली नपी-तुली, संयत और नियंत्रित थी लेकिन घटक आवेग, उदात्तता और नाटकीय शिल्प के फ़िल्मकार थे. इनमें मृणाल सेन सबसे अधिक प्रयोगशील थे और हर फ़िल्म के कथ्य के साथ उनकी फ़िल्म-भाषा बदलती थी.

'भुवन शोम' अगर बेहद शांत, लोक-कथा जैसा मासूम वृत्तान्त है तो 'कलकत्ता-71' एक तरफ़ ग़रीबी और भूख से पीड़ित लोगों और अस्तित्व बचाने के लिए तस्करी, वेश्यावृत्ति आदि की शरण में जाने और दूसरी तरफ़ खाए-पिए-अघाए तबके के पाखण्ड की कहानी है जिसे तीखे विरोधाभासों के साथ अराजक ढंग से कहा गया है.

मृणाल सेन की दो और फ़िल्में उनकी कलकत्ता-त्रयी को पूरा करती हैं: 'इंटरव्यू' और 'पदातिक'. दोनों फ़िल्में उस दौर में छात्रों की भीतरी बेचैनी-विवशता और फिर नक्सलबाड़ी विद्रोह और भूमिगत कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीति और नेतृत्व के जलते हुए सवालों से दो चार होती हैं.

इस फ़िल्म की कुछ आलोचना भी हुई, लेकिन मृणाल सेन का कहना था कि देश में कोई भी क्रान्ति अपने को परंपरा यानी आज़ादी की लड़ाई की विरासत से जोड़े बिना सफल नहीं हो सकती.

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Image caption फ़िल्म भुवन शोम की शूटिंग के दौरान

शबाना और स्मिता के साथ फ़िल्म

'खंडहर' मृणाल सेन की फ़िल्म-यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव थी जिसमें एक नए मृणाल सेन दिखाई दिए. सामजिक असंतोष और वामपंथी कथानकों के मुखर फ़िल्मकार इस फ़िल्म में मानवीय विडम्बना और त्रासदी के चितेरे के रूप में दिखते हैं.

'खंडहर' एक लकवाग्रस्त माँ, उसकी अविवाहित बेटी (जिसे उसके मंगेतर ने धोखा दिया है) और तीन शहरी युवकों का कथानक है जिनमें से एक को मां का सपना टूटने न देने के लिए बेटी से विवाह करने का नाटक करना पड़ता है, लेकिन बेटी अंततः अकेली छूट जाती है.

खंडहर अपनी ख़ामोशी, अनकही चीज़ों, घर की ढहती हुई दीवारों-मेहराबों और उदासी के संगीत के लिए बहुत चर्चित हुई.

हिंदी दुनिया की जानी-मानी अभिनेत्रियों शबाना आज़मी (खंडहर) और स्मिता पाटिल (अकालेर संधाने) ने भी मृणाल सेन की फ़िल्मों में काम किया.

वह अपने संस्मरणों में एक दिलचस्प वाक़ये का ज़िक्र करते हुए कहते हैं, "शबाना और स्मिता दोनों मेरी नयी फ़िल्म में काम करने की इच्छुक थीं. उन दिनों श्याम बेनेगल फ़िल्म 'मंडी' की शूटिंग कर रहे थे. मुझे दोनों का फ़ोन आया. तो मैंने कहा की तुम लोग मेरे परिवार की तरह हो, थोड़ा इंतज़ार करो. फिर मैंने एक पत्र शबाना और एक स्मिता को लिखा और जान-बूझकर शबाना का पत्र स्मिता को और स्मिता का पत्र शबाना को भेज दिया."

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Image caption मृणाल सेन(बाएं), श्रीराम लागू और शबाना आज़मी

बेनेगल ने बाद में मुझे बताया कि खाने की मेज़ पर शबाना और स्मिता दोनों ने वह पत्र एक-दूसरे को सौंप दिए और ठहाके लगाए.

मृणाल सेन 95 वर्ष की लम्बी उम्र जिए और सन् 2002 में आख़िरी फ़िल्म 'आमार भुवन' बनायी. फ़िल्मों के लिहाज़ से उनकी उम्र 27 कथा-फ़िल्मों और 18 लघु और वृत्तफ़िल्मों जितनी बड़ी है.

कलात्मक या दूसरी धारा के सिनेमा को मिलने वाले बहुत कम संसाधनों के बावजूद यह संख्या कम नहीं कही जायेगी जिसकी तुलना में सत्यजित रॉय की फ़िल्मों की संख्या कुछ कम है और ऋत्विक घटक को तो 7-8 फ़िल्में ही बनाने का मौका मिल पाया.

यह उल्लेख करना भी ज़रूरी लगता है कि तीनों फ़िल्मकारों के काम का साहित्य से गहरा सम्बन्ध रहा और उनकी ज़्यादातर फ़िल्में बांग्ला उपन्यासों या कहानियों पर आधारित हैं.

ऋत्विक घटक की तरह मृणाल सेन छात्र जीवन से ही कम्युनिस्ट आन्दोलन और उसके इंडियन पीपुल्स थिएट्रिकल एसोसिएसन (इप्टा) के रंगकर्म से जुड़े थे इसलिए उनकी फ़िल्मों में अभिनय का पक्ष काफ़ी सशक्त है.

फ़िल्मों में परिवेश या 'लोकेल' को उभारने, उसे व्यक्तिव देने में रॉय, घटक और सेन माहिर रहे हैं, लेकिन मृणाल सेन की अनेक फिल्मों में जगहें भी अभिनय का हिस्सा बन जाती हैं.

'भुवन शोम' में कच्छ का रेगिस्तान और कलकत्ता-त्रयी में कोलकाता महानगर कथा-विस्तार में पात्रों की तरह अपनी भूमिका अदा करते हैं.

बंगाल की जिस त्रयी के कथानकों ने बांग्ला सिनेमा को विश्व-स्तर पर पंहुचाया, उनमें 14 मई, 1923 को जन्मे और 30 दिसंबर, 2018 को दिवंगत हुए मृणाल सेन आख़िरी बड़े कथानक के तौर पर याद किये जाते रहेंगे.

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