मोदी सरकार और संस्थाओं के टकराव की गवाही देता साल

  • 1 जनवरी 2019
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सरकार और उसकी संस्थाओं के बीच टकराव, चमत्कार से कम नहीं होते. चूंकि चमत्कार कम ही होते हैं लिहाज़ा सरकार और संस्थाएं एक दूसरे के सामने तलवार लेकर अड़ जाएं, ऐसा कम ही देखने को मिलता है.

लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने 2018 में संस्थाओं के साथ टकराव का ऐसा इतिहास बनाया है जिसे लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा. और तो और इन टकराव के चलते होने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नुक़सानों की बातें भी सुनाई देती रहेंगी.

ये इतिहास कैसे बना और किन वजहों से बना, उसमें जाने से पहले ये देखना ज़रूरी है कि भारतीय जनता पार्टी सालों से कांग्रेस पर सरकारी संस्थाओं के महत्व को कमतर करने का आरोप लगाती रही है, इसी सिलसिले में बीजेपी, सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की जमकर आलोचना करती रही कि इस परिषद के बहाने सरकार चलाई जा रही है.

लेकिन अगर आप बीजेपी के आरोपों को साल 2018 में ख़ुद उसके लिए गए फ़ैसले की तुलना में देखें तो बीजेपी पर भी यही आरोप लग सकता है. पहली नज़र में देखें तो सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों का पहली बार सार्वजनिक होकर कहना कि ख़तरा बढ़ रहा है या फिर सीबीआई के नंबर एक और नंबर दो अधिकारी के बीच छिड़ी जंग रही हो, बीते साल सुर्ख़ियां बनाते रहे.

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की प्रेस कांफ्रेंस

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सबसे पहले बात उस तूफ़ान की जिसकी धमक के साये में देश ने 2018 में क़दम रखा था. 12 जनवरी, 2018 को सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष पांच में से चार न्यायाधीशों ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा कि देश में लोकतंत्र पर ख़तरा मंडरा रहा है. ये चारों न्यायाधीश देश के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के कामकाजी तरीक़ों पर सवाल उठा रहे थे और उनके फ़ैसलों को दबाव से प्रेरित बता रहे थे.

इससे पहले देश ने कभी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को सार्वजनिक तौर पर अपनी बात कहते नहीं देखा था और ना ही सुना था. लेकिन ये हुआ. हालांकि सरकार और न्यायपालिका में ये कोई इकलौती टकराव वाली स्थिति नहीं रही. सरकार ने उत्तराखंड के नैनीताल हाइकोर्ट के न्यायाधीश रहे केएम जोसेफ़ के सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति वाली फ़ाइल को अटका दिया.

इसकी एक वजह ये बताई जा रही थी कि केएम जोसेफ़ ने 2016 में राज्य में राष्ट्रपति शासन को हटाने वाला फ़ैसला दे दिया था. महीनों उनका नाम अटका रहा, तब जाकर वे सुप्रीम कोर्ट पहुंच पाए. इस दौरान सुप्रीम कोर्ट में न्यायधीशों की नियुक्ति की कोलोजियम प्रक्रिया पर भी सवाल उठे.

इस पर सरकार ने कुछ ठोस तो नहीं किया लेकिन साल बीतने के समय में केंद्रीय क़ानून मंत्री का एक बयान ज़रूर आया है कि सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए आयोग बनाने पर विचार कर रही है और न्यायाधीशों की नियुक्तियों में आरक्षण के प्रावधानों का इस्तेमाल भी होगा. हालांकि अभी ये केवल बयानबाज़ी तक ही पहुंचा है.

साल बीतने से ठीक पहले सुप्रीम कोर्ट फिर सवालों के घेरे में आ गई जब रफ़ाल सौदे पर जिन सबूतों के आधार पर उसने मोदी सरकार को क्लीन चिट दिया, वो सबूत थे ही नहीं. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में तथ्यात्मक संशोधन की अर्ज़ी दी है, लेकिन विपक्ष के मुताबिक़ ये सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में ग़लतबयानी की मिसाल है.

दरअसल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि रफ़ाल डील से जुड़े दस्तावेज़ों से संबंधित कैग की रिपोर्ट को संसद की पार्लियामेंट एकाउंट कमेटी ने देख ली है जबकि पार्लियामेंट एकाउंट कमेटी के चेयरपर्सन मल्लिकार्जुन खड़गे ने बताया कि ऐसी कोई रिपोर्ट कमेटी के पास नहीं पहुंची है.

सीबीआई में जब भिड़े नंबर एक-नंबर दो

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सीबीआई के प्रमुख आलोक वर्मा और नंबर दो स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच आपसी विवाद अक्तूबर, 2018 में सार्वजनिक हो गया. दोनों अधिकारियों ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने का आरोप लगाया और एक दूसरे के ख़िलाफ़ केस दर्ज करवाया था.

सीबीआई के शीर्ष दो अधिकारियों के बीच आपसी खींचतान में दख़ल देते हुए जिस तरह से आधी रात को सरकार ने आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजा उसने भी सीबीआई की स्वायत्तता को ठेस पहुंचाई. सरकार पर आरोप है कि सीबीआई निदेशक के चुने जाने या फिर हटाए जाने के मौजूदा प्रावधानों का उसने उल्लंघन किया है और आलोक वर्मा ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.

इस विवाद में केंद्र सरकार की किरकिरी कुछ ज़्यादा ही हुई क्योंकि गुजरात कैडर के आईपीएस राकेश अस्थाना को प्रधानमंत्री मोदी का क़रीबी अधिकारी माना जाता रहा है और उनके कई राजनीतिक मामलों की जांच से जुड़े होने के चलते भी सरकार पर सवाल उठे.

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इस पूरे वाक़ये ने एक बार फिर से सीबीआई की छवि को तार तार कर दिया. सीबीआई की छवि को समझने के लिए दो ट्वीट देखे जा सकते हैं. 24 जून, 2013 को नरेंद्र मोदी (तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे) ने ट्वीट किया था, "सीबीआई कांग्रेस ब्यूरो ऑफ़ इंन्वेस्टिगेशन बन गई है. देश को इसमें कोई भरोसा नहीं है."

इसके ठीक पांच साल, चार महीने और एक दिन बाद यानी 25 अक्तूबर, 2018 को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया, "रफ़ाल घोटाले की जांच न हो पाए इसलिए प्रधानमंत्री ने सीबीआई प्रमुख को असंवैधानिक तरीक़े से हटा दिया. सीबीआई को पूरी तरह नष्ट किया जा रहा है."

दरअसल बीते साल ने एक बार फिर से साबित किया कि सीबीआई केंद्र सरकार के लिए किसी 'तोते' की मानिंद काम करता है, चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो.

केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी)

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सीबीआई के दो शीर्ष अधिकारियों की आपसी भिड़ंत में सरकार ने जिस तरह से सीवीसी का इस्तेमाल किया, उससे सीवीसी की भूमिका पर भी सवाल खड़े हुए. सरकारी भ्रष्टाचार को रोकने के लिए काम करने वाली संस्था के दायरे में सीबीआई प्रमुख भी होते हैं.

केंद्र सरकार ने इसी प्रावधान का इस्तेमाल करते हुए सीवीसी के मुखिया की मदद से सीबीआई प्रमुख आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेज दिया, बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी आलोक वर्मा के ख़िलाफ़ जांच करने के लिए सीवीसी को कहा.

इस पूरे मसले में कांग्रेस की ओर से लगातार सीवीसी को सरकार का पिछलग्गू बताया जाता रहा है. इसी साल सीवीसी केवी चौधरी की नियुक्ति पर भी सवाल उठे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस अपील को ख़ारिज कर दिया था.

ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय में भी गहमागहमी देखने को मिली. ईडी के नंबर दो अधिकारी राजेश्वर सिंह की तैनाती को लेकर सुर्खियां बनती रहीं.

कई हाईप्रोफ़ाइल मामलों की जांच कर रहे राजेश्वर सिंह को लेकर सरकार के अंदर जो खींचतान चली उसकी एक झलक पार्टी के वरिष्ठ सांसद सुब्रमण्यम स्वामी के इस ट्वीट से लगाया जा सकता है.

स्वामी ने ट्वीट किया, "सीबीआई में क़त्लेआम के खिलाड़ी अब ईडी के अधिकारी राजेश्वर सिंह का निलंबन करने जा रहे हैं ताकि पीसी (पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम) के ख़िलाफ़ आरोपपत्र दाख़िल न हो. अगर ऐसा हुआ तो भ्रष्टाचार से लड़ने की कोई वजह नहीं है, क्योंकि मेरी ही सरकार लोगों को बचा रही है. ऐसे में मैंने भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जितने मुक़दमे दायर किए हैं सब वापस ले लूंगा.''

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई)

भारतीय बैंकिंग सिस्टम के लिए ज़िम्मेदार भारतीय रिज़र्व बैंक और केंद्र सरकार के बीच लगभग पूरे साल तक आंख मिचौली चलती रही.

ये तकरार किस तरह की रही है, इसका अंदाज़ा 26 अक्तूबर को आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य के एक लेक्चर के हिस्से से लगाया जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा- जो सरकारें केंद्रीय बैंक की स्वायत्ता का सम्मान नहीं करती हैं, वह देर सबेर वित्तीय बाज़ारों के प्रकोप, आर्थिक चुनौतियों को आमंत्रित करने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण स्वायत्त संस्था को कमतर बनाती हैं.

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दरअसल पिछले कुछ सालों में देश के वित्त मंत्रालय की कोशिश रिज़र्व बैंक को अपने हिसाब से चलाने की रही है और यही वजह है कि कई आर्थिक फ़ैसले रिज़र्व बैंक की जानकारी के बिना लिए जाते रहे हैं. ऐसे में आरबीआई के गर्वनर उर्जित पटेल कई मौक़ों पर अड़ते दिखे.

केन्या में जन्मे और रिलायंस समूह के पूर्व कर्मचारी रहे उर्जित पटेल को मोदी सरकार ही रिज़र्व बैंक का मुखिया बनाकर लाई थी लेकिन कामकाजी स्थिति सहज नहीं रही. चाहे वह क़र्ज़ डूबाने वाली इंडस्ट्री को फिर से लोन देने का मसला रा हो, या फिर ब्याज दरों को कम करना रहा हो या फिर रिज़र्व कैश की निकासी का मसला रहा हो, इन सबसे उर्जित पटेल इतने आहत हुए कि 10 दिसंबर, 2018 को उन्होंने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया. इस्तीफ़े का कारण तो उन्होंने निजी बताया लेकिन इस मामले पर नज़र रखने वाले तमाम लोग यही बात लगातार कहते रहे कि सरकार के साथ तकरार के चलते ही उनको जाना पड़ा.

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी)

केंद्रीय सूचना आयोग और सरकार के बीच कोई मुखर विवाद भले सामने नहीं आया हो लेकिन सरकार इसको लेकर लचर रुख़ अपनाए हुए है, ये बात लगातार ज़ाहिर होती रही है. 2018 के मानसून सत्र में सरकार को सूचना के अधिकार क़ानून में संशोधन के प्रस्ताव को वापस लेना पड़ा.

अगर ये प्रस्ताव पारित हो जाता तो सरकार सूचना आयुक्तों की सैलेरी, सुविधाएं और कामकाजी शर्तों को बदलने की स्थिति में आ जाती. आरटीआई एक्टिविस्टों के मुताबिक़ सरकार का उद्देश्य सूचना आयोग के कामकाज को निष्प्रभावी बनाना है, ये बात इससे भी ज़ाहिर होती है कि सरकार पद से कम सूचना आयुक्तों से काम चला रही है.

केंद्रीय चुनाव आयोग (ईसी)

केंद्रीय चुनाव आयोग भी एक संवैधानिक संस्थान है, लेकिन बीते साल इसके कई फ़ैसले विवादों में रहे और इस पर सरकार के दबाव में फ़ैसले करने के आरोप लगे.

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केंद्र सरकार ने राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग को कहीं ज़्यादा पारदर्शी बनाने के लिए जिस इलेक्ट्रॉल बांड्स का प्रस्ताव रखा था, उससे 2017 में चुनाव आयोग सहमत नहीं हुआ था लेकिन 2018 में मुख्य चुनाव आयुक्त एके जोती ने इस प्रस्ताव को सही दिशा का क़दम बताया.

एके जोती गुजरात कैडर के अधिकारी रहे हैं और प्रधानमंत्री मोदी के भरोसेमंद अधिकारी माने जाते थे.

बहरहाल बीते साल एक दिलचस्प वाक़या तब सामने आया जब 08 अक्तूबर, 2018 को चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा वाली प्रेस कांफ्रेंस को तीन घंटे के लिए टाल दिया था. पहले पत्रकारों को साढ़े बारह बजे प्रेस कांफ्रेंस के लिए बुलाया गया था बाद में ये समय साढ़े तीन बजे किया गया.

इस बीच दोपहर के एक बजे राजस्थान के अजमेर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक रैली को संबोधित करना था. कांग्रेस ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने समय इसलिए बदला ताकि प्रधानमंत्री की रैली पर अचार संहिता लागू नहीं हो.

हालांकि बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने कहा कि ज़्यादा से ज़्यादा पत्रकार प्रेस कांफ्रेंस में शरीक हो सकें, इसलिए समय में बदलाव किया गया.

यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी)

यूजीसी की स्वायत्ता भी बीते साल सवालों के घेरे में रही. सबसे पहले तो जुलाई, 2018 में जियो इंस्टीच्यूट के इंस्टीच्यूट ऑफ़ इमिनेंस में चुने जाने पर विवाद हुआ है.

अंबानी का जियो इंस्टीच्यूट अभी बना भी नहीं है लेकिन सरकार ने उसे यूजीसी की क्लॉज़ 6.1 के तहत इमिनेंस इंस्टीच्यूट का दर्जा दे दिया गया.

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इसके अलावा यूजीसी की मदद से विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्तियों के नए प्रावधान, जिससे आरक्षण के प्रावधान को बेमानी बनाया जा सकता है, का मुद्दा भी सवालों में रहा.

बीते कुछ सालों से मन बना रही केंद्र सरकार ने 27 जून, 2018 को यूजीसी की जगह लेने वाले नई बॉडी के गठन का प्रस्ताव रखा, जिस पर शिक्षकों, पॉलिसी एक्सपर्ट और स्टेक होल्डरों को अपनी बात रखने का महज़ 10 दिन का समय दिया. बाद में आलोचना होने पर इस समय सीमा को बढ़ाया गया.

बताया जा रहा है कि सरकार यूजीसी की गुणवत्ता को सुधारने के लिए नई बॉडी का गठन करने पर विचार कर रही है.

राज्य सभा

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राज्य सभा में मोदी सरकार को बहुमत नहीं है, ऐसे में जब मोदी सरकार ने जब 2018 में आधार बिल को मनी बिल का सहारा लेकर पास कराया तो ये कहा गया कि सरकार राज्य सभा की गरिमा का ख्याल नहीं रख रही है.

दरअसल मनी बिल वैसे बिल होते हैं जिन्हें केवल लोकसभा से पारित कराकर क़ानून का रूप दिया जा सकता है. राज्य सभा में लीडर ऑफ़ द हाउस अरुण जेटली ने बजट सेशन के अंत में ये भी कहा कि क्या अनिर्वाचित सदन राज्य सभा को निर्वाचित सदन लोकसभा पर सवाल पूछना चाहिए? हालांकि जेटली ख़ुद 2014 में लोकसभा का चुनाव हार गए थे और वो राज्य सभा के सदस्य हैं.

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