तीन तलाक़ बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने पर अड़ा विपक्ष

  • 31 दिसंबर 2018
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तीन तलाक़ बिल सोमवार को राज्य सभा में पेश नहीं हो सका. विपक्ष ने बिल को सेलेक्ट कमिटी के पास भेजने की मांग संसद के उच्च सदन में भी जारी रखी.

गुरुवार को मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक-2018 लोक सभा में पारित हो गया था. जिसके बाद बीजेपी सरकार अब इसे राज्य सभा से पास कराकर क़ानून की शक्ल देना चाहती है.

लोक सभा में जब इस बिल पर वोटिंग हुई थी तो कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने सदन से वॉकआउट कर दिया था.

बिल के राज्य सभा में पहुंचने के बाद भी विपक्ष ने अपनी मांग जारी रखी.

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राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष गुलाम नबी आज़ाद ने कहा कि हम इस बिल का विरोध नहीं कर रहे, लेकिन बिल से करोड़ों लोगों की ज़िंदगी पर असर पड़ेगा, इसलिए इसे पहले सेलेक्ट कमिटी के पास भेजा जाना चाहिए.

गुलाम नबी आज़ाद ने बीजेपी सरकार पर संसद की परंपरा तोड़ने का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, "सालों से हर बिल को पहले स्टैंडिंग कमेटी और फिर सेलेक्ट कमेटी के पास भेजा जाता है. उसके बाद बहुमत के आधार पर बिल संसद से पारित होता है. लेकिन बीजेपी सरकार अहम बिलों को सीधे-सीधे पास करा रही है. ये ग़लत है."

पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओब्राईन ने 15 विपक्षी दलों की ओर से बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने का प्रस्ताव रखा और कहा कि एक तिहाई विपक्ष तीन तलाक़ बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजना चाहता है.

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कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने बीजेपी पर बिल को लेकर राजनीति करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि विधायी जांच के बिना कोई क़ानून नहीं बन सकता.

वहीं केंद्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सरकार बिल पर चर्चा के लिए तैयार है.

उन्होंने कहा, "ये इंसानियत और मानवता का मामला है. सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बावजूद कल तक तीन तलाक़ हो रहे हैं. विपक्ष का कोई सुक्षाव हो तो हम सुनने को तैयार हैं, लेकिन ये बिल को लटकाएं नहीं."

हंगामा बढ़ता देख उपसभापति ने राज्य सभा की कार्यवाही दो जनवरी 2019 सुबह 11 बजे तक के लिए स्थगित कर दी.

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लेकिन कांग्रेस ती तलाक़ बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने पर क्यों अड़ी है?

इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी ने कहा, "मुख्य वजह ये है कि मुस्लिम समुदाय इस बिल से ख़ुश नहीं है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक़ को अवैध क़रार दे दिया था. लेकिन फिर सरकार ने बिल लाकर तीन तलाक़ को अपराधिक बना दिया और तीन साल की सज़ा का प्रावधान कर दिया."

नीरजा आगे कहती हैं, "हालांकि बाद में बीजेपी सरकार ने इसमें कुछ संशोधन किए. लेकिन संशोधनों के बाद भी मुस्लिम समुदाय इस बिल से ख़ुश नहीं है, क्योंकि एक तो इसे आपराधिक कर दिया है. दूसरा बीजेपी का इस बिल को लाना, वो भी चुनाव से कुछ वक़्त पहले, ये विपक्ष को सही नहीं लग रहा है. दरअसल बीजेपी का रवैया अल्पसंख्यक विरोधी माना जा रहा है. इसलिए अल्पसंख्यक वोटर जिन पार्टियों का आधार हैं, उनको लगा रहा है कि इस वक़्त ये चीज़ नहीं होनी चाहिए, इसलिए वो विरोध कर रहे हैं."

अगर सरकार बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास नहीं भेजती है तो बिल का भविष्य क्या होगा?

इस सवाल के जवाब में नीरजा चौधरी कहती हैं, "किसी भी पार्टी को इस बिल के भविष्य की चिंता नहीं है. और बीजेपी दिखाना चाहती है कि हमने कोशिश की. बीजेपी ये भी चाहती है कि विपक्षी पार्टियां अल्पसंख्यकों के साथ खड़ी दिखें, ताकि उनको एंटी हिंदू क़रार दे दिया जाए. दरअसल बीजेपी इस तीन तलाक़ बिल के ज़रिए अपनी आज़माई हुई ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है."

नीरजा कहती हैं कि इस बिल को आपराधिक नहीं बनाया जाना चाहिए, ये एक सिविल अपराध है.

"और जब सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ को अवैध क़रार दे दिया था तो इस बिल की क्या ज़रूरत है. मुझे लगता है कि ज़रूरत पड़ने पर दोनों पार्टियां अपने स्टैंड को चुनाव में भी भुनाएंगी."

क्या होती है सेलेक्ट कमेटी?

संसद के अंदर अलग-अलग मंत्रालयों की स्थायी समिति होती है, जिसे स्टैंडिंग कमेटी कहते हैं. इससे अलग जब कुछ मुद्दों पर अलग से कमेटी बनाने की ज़रूरत होती है तो उसे सेलेक्ट कमेटी कहते हैं.

इसका गठन स्पीकर या सदन के चेयरपर्सन करते हैं. इस कमेटी में हर पार्टी के लोग शामिल होते हैं और कोई मंत्री इसका सदस्य नहीं होता है. काम पूरा होने के बाद इस कमेटी को भंग कर दिया जाता है.

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सुप्रीम कोर्ट का बैन

अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ को अवैध क़रार दे दिया था. इसके बाद सरकार मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक लेकर आई थी.

ये विधेयक लोकसभा में तो पारित हो गया लेकिन राज्यसभा में अटक गया. विपक्ष ने तीन तलाक़ पर कुछ संशोधनों की मांग की थी.

संशोधन करने के बाद सरकार इसपर अध्यादेश ले आई थी, जिसे क़ानून की शक्ल देने के लिए इस शीतकालीन सत्र में पेश किया गया है. सरकार की कोशिश इस सत्र में बिल को संसद से पास कराने की है.

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