पंजाब में क्यों बिखरती जा रही है आम आदमी पार्टी

  • 7 जनवरी 2019
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पंजाब में बिखरती आप की दास्तां बचपन की उस कहानी की याद दिलाती है जब बच्चे बरसात में गीली मिट्टी के घरोंदे बनाकर खेल ख़त्म करते हुए यह कहते हुए तोड़ देते थे कि मैंने बनाया मैंने ही तोड़ा.

पंजाब से आप विधायक एचएस फूलका व सुखपाल खैरा द्वारा पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़े की ख़बरों और खैरा के इस्तीफ़े के मज़मून में पार्टी नेतृत्व पर उठाए गए सवाल उक्त कहानी की याद दिलाती हैं.

कांग्रेस की केंद्रीय सत्ता के भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ उठे अन्ना आंदोलन से आम आदमी पार्टी बनी और पंजाब में मज़बूत दख़ल कर पाई.

हाल ही में उसी कांग्रेस के साथ आप लोकसभा चुनाव के लिए गठजोड़ करने कि कोशिश में ही थी कि 1984 के सिख क़त्लेआम केस में कांग्रेस के बड़े नेता सज्जन कुमार को हाईकोर्ट ने दोषी ठहराया व आजीवन कारावास की सज़ा सुना दी.

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इसके बाद दिल्ली विधानसभा में आप ने 1984 के सिख विरोधी घटनाओं को जनसंहार क़रार देते हुए राजीव गांधी को दिए गए भारत रत्न अवार्ड को वापिस लेने की मांग करने वाला प्रस्ताव पारित किया.

जिसे बाद में आप और कांग्रेस का गठबंधन होने से रोकने की साज़िश क़रार दे दिया गया.

इसी पृष्ठभूमि में विधायक फूलका का इस्तीफ़ाआया. ग़ौरतलब है कि फूलका 1984 से ही दिल्ली सिख क़त्लेआम के दोषियों को सज़ा दिलाने के लिए संघर्षरत हैं.

सज्जन कुमार को दोषी ठहराते हुए कोर्ट ने कहा कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद दिल्ली में मानवता के ख़िलाफ़ हुए अपराध के समय दिल्ली पुलिस न सिर्फ़ निष्क्रिय थी बल्कि गवाहियों से स्पष्ट होता है कि इस क़त्लेआम की घटनाओं को राजनीतिक सरंक्षण था.

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इस्तीफे़ के मायने

इसके दो दिन बाद सुखपाल खैरा ने पार्टी की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया. खैरा पहले ही पार्टी से निलंबित किए जा चुके हैं. अब अलग पार्टी बनाने की घोषणा कर चुके हैं.

फूलका और खैरा के इस्तीफे़ के अलग मायने भी हैं. दोनों ने इस्तीफ़ा देने के कारण भी अलग-अलग बताए हैं. फूलका ने कहा है कि पंजाब में एसजीपीसी को एक परिवार की सत्ता से मुक्त करवाने और पंजाब को नशे से मुक्त करवाने के लिए अन्ना सरीखा आंदोलन चलाएंगे.

अन्ना आंदोलन के बाद पार्टी बनने के बाद शामिल होकर दो चुनाव लड़ने वाले फूलका अब कह रहे हैं कि पार्टी नहीं बननी चाहिए क्योंकि पार्टी बनने से आंदोलन ख़त्म हो गया.

मगर आप नेतृत्व के बारे में कुछ नहीं कहते. वहीं खैरा आप नेतृत्व के कथित अहंकार व सुप्रीमो-कल्चर पर सवाल उठाते हुए आप द्वारा कांग्रेस से गठबंधन की अटकलों को इस्तीफे़ का कारण बताते हैं.

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पंजाब में नशे को बढ़ावा देने के आरोप झेल रहे अकाली नेता मजीठिया (जिनके ख़िलाफ़ आप नेता केजरीवाल व पार्टी ने खुलकर आरोप ही नहीं लगाए थे बल्कि दोषी तक बताया था) से केजरीवाल ने लिखित माफ़ी मांग कर क्लीन चिट दी तो पंजाब आप में भूचाल आया था.

मगर विधायक या सासंद बने रहने की चाहत या फिर पार्टी से अभी भी बेहतर राजनीति की उम्मीद ने आप नेताओं के सांगठनिक पदों से इस्तीफ़े तो करवाए मगर पार्टी टूटने से बच गई.

2014 लोकसभा चुनाव में चार सीटें जीतने वाली आप पांच साल पूरे होने से पहले ही छह बार संकट से गुज़र चुकी है जब या तो किसी बड़े नेता ने पार्टी छोड़ दी या फिर किसी को निकाल दिया गया. 2015 में राष्ट्रीय टीम से प्रशांत भूषण व योगेन्द्र यादव के साथ ही एक सांसद डॉक्टर धर्मवीर गांधी ने भी आप के शीर्ष नेतृत्व की कथित सुप्रीमो-कल्चर के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई.

पार्टी नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने के कारण पार्टी ने दो सांसदों डॉक्टर गांधी और खालसा को पार्टी से निलंबित कर दिया.

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किसी को निकाला तो किसी का इस्तीफ़ा

डॉक्टर गांधी अपना मंच बनाकर पंजाब की राजनीति में हस्तक्षेप कर रहे हैं. आप की स्टेट कैम्पेन कमेटी के सदस्य मनजीत सिंह ने भी पार्टी की नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई तो पार्टी से अलग कर दिए गए.

उन्होंने अपनी पार्टी बना ली. 2017 के पंजाब विधान सभा चुनाव से पहले राज्य पार्टी अध्यक्ष सुच्चा सिंह छोटेपुर को पार्टी से निकाल दिया गया तब उन्होंने अपने पार्टी बना ली.

इसके बाद केजरीवाल द्वारा मजीठिया से माफ़ी मांगने के बाद पार्टी के राज्य अध्यक्ष भगवंत मान ने इस्तीफ़ा दे दिया, वह अभी तक वापस तो नहीं आए मगर वे अभी पार्टी के साथ बने हुए हैं.

इसी घटना के बाद पार्टी के वरिष्ठ विधायक सुखपाल खैरा और कंवर संधु ने पार्टी के अध्यक्ष के ख़िलाफ़ ज़ोरदार आवाज़ उठाई जिसके चलते तुरंत तो नहीं मगर कुछ दिनों बाद अचानक सुखपाल खैरा को विधानसभा में विरोधी दल के नेता पद से हटा दिया गया जिसके चलते पार्टी के आठ विधायक लेकर लगातार सक्रिय हैं.

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केंद्रीय नेतृत्व की बेरुख़ी

2017 में हुए पंजाब विधानसभा चुनाव में आप सत्ता में नहीं आ पाई. उसके बाद से केंद्रीय नेतृत्व ने पंजाब में पार्टी की तरफ़ ध्यान देना बंद कर दिया था.

पार्टी अध्यक्ष अरविंद केजरीवाल सतलुज यमुना लिंक नहर के बारे में पंजाब में कहते थे कि पंजाब के पास पानी नहीं है तब किसी को कैसे दे सकते हैं?

वहीं अरविंद केजरीवाल हरियाणा की राजनीति में भूमिका को देखते हुए हरियाणा की हक़ की दुहाई देने लगे जिससे स्पष्ट हुआ कि आम आदमी पार्टी को पंजाब की राजनीति से ना तो ज़्यादा सरोकार है और ना ही कोई ज़्यादा उम्मीद.

इन परिस्थितियों में सवाल उठता है कि पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी व पार्टी से अलग हुए विभिन्न धड़ों व व्यक्तियों की राजनीतिक भूमिका क्या रहने वाली है?

क्या पंजाब की राजनीति में बदलाव की सम्भावनाओं का वाहक इनमें से कोई बन पाएगा?

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मुद्दों पर कोई बात नहीं

किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति की भूमिका या बदलाव की राजनीति की संभावनाओं का वाहक होने का विश्लेषण करने का आधार उसकी अब तक की कार्यप्रणाली और कार्यक्रम ही हो सकती हैं.

इस कसौटी पर कसकर देखें तो आम आदमी पार्टी ने 2017 विधानसभा चुनाव के बाद पंजाब के किसी भी मुद्दे को लेकर कोई अहम और लगातार आंदोलन नहीं चलाया है.

इतना ही नहीं बल्कि किसी भी विचार को लेकर कोई ठोस राय भी नहीं दी है और ना ही कोई आवाज़ उठाई है.

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क़रीब पिछले दो साल में आम आदमी पार्टी पंजाब आपसी विवाद, छींटाकशी और टूट की पीड़ा से झूलती हुई नज़र आई है, वहीं केंद्रीय नेतृत्व के लिए पंजाब की घटनाएं या पंजाब का भविष्य कोई मायने रखता नज़र नहीं आता.

विधानसभा चुनाव के बाद से अलग पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने वाले सुच्चा सिंह छोटेपुर भी सार्वजनिक तौर पर राजनीतिक विमर्श से बाहर नज़र आ रहे हैं.

पार्टी के निलंबित सांसद हरेंद्र खालसा की आवाज़ कभी सुनाई नहीं देती, मगर पार्टी के दूसरी निलंबित सांसद धर्मवीर गांधी लगातार अपने समझ व संकल्प के साथ अपनी बात को रखते नज़र आते हैं.

लेकिन वह भी ना तो कोई समूह बना पाए हैं न ही किसी भी विषय को लेकर कोई ठोस आवाज़ उठा पाए हैं. लगातार अलग-अलग समूहों के साथ पंजाब केंद्रित राजनीति का आह्वान करने वाले गांधी विभिन्न समूह से तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं.

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फूलका ख़ुद कितने कामयाब रहे?

बात करें फूलका की, तो यह समझ से परे है कि जो फूलका दाखा से विधायक चुने जाने के बाद वहां की जनता का नेतृत्व नहीं कर पाए (चाहे उसके लिए उचित कारण उन्होंने बताया कि 1984 के पीड़ितों के हक़ में गुनहगारों को सज़ा दिलाने के लिए अदालती कार्यवाही में उनका समय अधिक लगना है) इसलिए उन्होंने विधायक पद से इस्तीफ़ा भी दे दिया.

जहां तक उनके नशा विरोधी आंदोलन को खड़ा करने का दावा है उसकी कामयाबी पर यक़ीन कर पाना मुश्किल नज़र आता है, क्योंकि जब विधायक होते हुए विधानसभा में विपक्षी दल के नेता होने के बावजूद इस मुद्दे को नहीं उठा पाए तब वे एक नया संगठन कैसे बना पाएंगे.

फूलका को यह भी जवाब देना होगा कि नशे के व्यापार को बढ़ाने का आरोप झेल रहे विक्रम सिंह मजीठिया से अरविंद केजरीवाल ने माफ़ी मांगने पर चुप क्यों रहे?

सुखपाल सिंह खैरा लंबे समय से पंजाब की राजनीति में मुखर आवाज़ रहे हैं. सत्तारूढ़ कांग्रेस में रहे. अकाली दल के ख़िलाफ़ लगातार आवाज़ उठाते रहे मगर कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी की गठबंधन की संभावना को इस्तीफ़े का कारण बताने वाले खैरा 1984 के बाद भी कांग्रेस में क्यों रहे, वे इस सवाल का जवाब कैसे देंगे?

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यह सही है कि खैरा आम आदमी पार्टी की स्थानीय इकाई की स्वायत्तता का सवाल ज़ोरदार तरीक़े से उठाते रहे हैं मगर उनका अपने कामकाज की प्रणाली में आंतरिक लोकतंत्र की तलाश करना मुश्किल काम है.

सुखपाल खैरा अपने साथ सात विधायकों को ले आए और एक नई पार्टी बनाने का ऐलान कर चुके हैं परंतु देखना अभी बाक़ी है कि विधायक पद जाने का ख़तरा उन समेत अन्य कौन-कौन विधायक उठा पाएंगे.

इतना ही नहीं सुखपाल खैरा धड़ा पिछले दिनों में पंजाब में पंथक राजनीति व पंजाब केन्द्रित राजनीति के अंतर को सुलझाने में हांफता हुआ नज़र आया है.

पार्टी को अपने साथ लाने की जद्दोजहद में खैरा अभी भी उलझे हुए हैं. जिसके चलते वे पंजाब में ना तो किसान की आवाज़ बन पा रहे हैं और ना ही बेरोज़गारी का दंश झेलते पंजाब और नशे की मार से हारते युवा के मुद्दों पर कोई समझ सामने रख पा रहे हैं.

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पंजाब में अकाली दल की पंथक दायरों में गिरती साख, गर्म ख्याली पंथक धड़ों की आपसी आरोपबाज़ी और आप के ध्वस्त होने के इस दौर में पंजाब को नई राजनीति की आवश्यकता अब भी है.

राजनीतिक समझ व आंदोलनों की धरती पंजाब में जनहित के लिए न्याय, समता व भाईचारे वाली सर्वपक्षीय राजनीति की अपार संभावनाएं आज भी मौजूद हैं.

संघर्ष की धरती पंजाब नए, विश्वसनीय, विचारवान नेतृत्व को कभी भी कंधों पर उठा कर बदलाव का सूत्रपात कर सकती है.

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