एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा... कैसा?: ब्लॉग

  • 12 जनवरी 2019
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Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

एक पार्टी में क्रिकेटर हार्दिक पंड्या ने कई लड़कियों को देखा तो ऐसा लगा...

'मेरी फ़ैमिली हर चीज़ के लिए खुली है. मैं फैमिली से बोला- आज करके आया हूं. एक पार्टी में मेरी फ़ैमिली थी. उन्होंने पूछा- तेरी वाली कौन सी है. मैंने बोला- ये. ये. ये. ये. मेरा सबके साथ कुछ न कुछ रहा है. फैमिली बोली- वाह, फ़ख़्र है.'

'कॉफी विद करन' शो में अपनी इस कही बात के लिए आलोचना झेलने वाले हार्दिक पंड्या को जाँच पूरी होने तक टीम से निलंबित कर दिया गया है.

हार्दिक पंड्या ने कहा, ''इसके ज़रिए न तो किसी को दुख देना और न ही किसी का अपमान करना चाहता था. अगर किसी की भावनाओं को ठेस पहुंची है, तो माफ़ी मांगता हूं.''

हार्दिक पंड्या का ये बयान सालों से चले आ रहे उस दौर में आया है, जहां एक लड़की को देखने या लड़की पर बात किए जाने का अलग-अलग नज़रिया और अच्छा या बुरा इतिहास रहा है.

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Image caption कॉफी विद करण शो के दौरान हार्दिक पंड्या

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा...

'भाई ये लड़की है. तू देखते जा.'

'इसकी ग्रोथ देखियो भाई तू'

'सारे मौके अब इसे ही मिलेंगे.'

किसी को ऐसा लगना ग़लत है या नहीं, फिलहाल इसे नहीं सोचते हैं.

पर आपने हमने कभी किसी लड़की के लिए ऐसा सुना या कहा? जवाब है हां. कई बार सुना. दफ़्तर का कोई साथी ये कबूलनामा नहीं पढ़ रहा हो तो हां कहा भी.

आपके मन की ईमानदारी हां में जवाब दे रही है तो बधाई. हमारी अतीत की सोच कितनी ही मैली क्यों न हो, आज की ईमानदारी हमारे आने वाले कल की सोच को प्यारी बना देती है.

मगर कुछ सवालों के जवाब एक-दूजे को दे दिए जाएं तो आसानी रहेगी. किसी लड़की को देखकर जब ये सोचा कि लड़की होने की वजह से दफ्तर में इसके सफल होने के चांसेस बढ़ जाएंगे तो वो कौन था- जो उस लड़की को 'सफल बना सकता' था.

एक पुरुष बॉस. यानी वो दूसरा पक्ष, जिसकी नज़र और चुनाव पर आपको शक है. या यूं कहें कि इस पुरुष बॉस के लिए काबिलियत से ज़्यादा ख़ूबसूरती मायने रखती है? किसी कर्मचारी का औरत होना मायने रखता है?

ऐसे में किसी भी आगे बढ़ने वाले उपलब्ध मौक़े के लिए कठघरे में किसको खड़ा किया जाए? औरत या मर्द.

क्यों न अपने मन की उस बेसिक लाइन को ही पलट दिया जाए- एक मर्द को देखा तो ऐसा लगा...

जैसे- 'कमी इस पुरुष बॉस में है.''काबिलियत से ज़्यादा खूबसूरती देख रहा है.' खूबसूरती जिसकी सही परिभाषा देखने वाली पुतलियों के हिसाब से बदलती है. कुछ भी अखंड सत्य नहीं.

या फिर संभव है कि बॉस महिला हो. महिला बॉस किसी लड़की को बिना काबिलियत के बढ़ा रही है तो ये भी ग़लत है.

मगर उदार मन से देखें तो संभव है कि महिला बॉस एक लड़की के लिए उन अड़ंगों को हटा रही हो, जो उसके लिए मुश्किल भरी रही हों.

लिहाज़ा क्यों न किसी आगे बढ़ती या दफ्तरों में काम करती लड़की को अकेले न देखा जाए. देखा जाए उसकी मेहनत, अनुभव को भी. साथ ही उस पुरुष बॉस को भी, जिसके कथित ग़लत फ़ैसले हमारी सोच को मैला कर रहे हैं. और हमें कहे जा रहे हैं,

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Image caption सोनम कपूर, एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा.. फ़िल्म के ट्रेलर के एक सीन में

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा....

'श्श्श...***** मस्त है'

'चेहरा छोड़कर सब सही है.'

'आसानी से पट जाएगी.'

'चाहे कुछ भी कर ले, भाव नहीं देगी'

किसी लड़की की शारीरिक ख़ूबसूरती की तारीफ़ करना बुरा नहीं है. दिल अगर कहता है कि मन इज इकवल टू तन, तो जियो बाबू!

आप ऐसे समाज में इस सच को स्वीकार कर रहे हैं जिसमें हमारी कथनी करनी में फ़र्क़ है.

बिस्तर पर कपड़े उतारने में जितना कम वक़्त लगाया जाता है, उसी बिस्तर के बारे में बात करने में सालों साल लग जाते हैं.

भारत में वैसे भी तीन चीज़ों को गुप्त रखने का 'रिवाज़' है- रोग. मतदान और सेक्स पर बातचीत.

लेकिन किसी लड़की के शरीर को देखकर ज़ाहिर की गई इच्छाएं कब तक टिकी रहेंगी?

क्या ये उस प्रेमिका के सामने टिकेंगी, जिसके साथ आपने ठहरना चाहा हो. या वो छोटी बहन, जो आपको जब भैया बोलती है तो अचानक आप अपनी बाजुओं को पहरेदार महसूस करने लगते हैं.

ऊपर लिखे ये दोनों सवाल 'तेरे घर में मां-बहन नहीं है' वाली घिस चुकी लाइन का विस्तृत रूप है.

गड़बड़ इसी लाइन में है, जिसमें खुद के साथ होने वाली छेड़खानी के वक़्त लड़की को एक औरत ही याद आती है. ये याद दो तरह से होती है.

पहली- औरतों से बात करने का सलीका नहीं है, तेरे घर में मां-बहन नहीं है.

दूसरी- हमें छेड़ रहा है, तेरे घर में मां-बहन नहीं है.

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छेड़खानी की किसी भी घटना या उसके बाद का कोई वाकया ले लीजिए. ये घर की मां-बहनें कभी किसी घटना को रोकने के काम नहीं आई हैं. न ये छेड़खानी रोक पाई हैं और न ही बेटों- भाइयों से ये कह पाई हैं कि ये बात बर्दाश्त से बाहर है कि तुम प्राथमिकता से किसी लड़की के शरीर को देखो न कि मन को.

सोचने से भी एक ऐसी लाइन याद नहीं आती, जिसमें किसी सड़क चलती अंजान लड़की को उसके शरीर नहीं, मन के लिए कुछ कहकर 'छेड़ा' गया हो.

अख़बारों की ख़बरें, किसी भी रेप से जुड़ी डॉक्यूमेंट्री के निष्कर्ष में कभी जाकर सोचिएगा.

लड़कियों के गले के नीचे नज़रें टिकाने वाले लोग उस बारीक लाइन के बिलकुल क़रीब नज़र आएंगे, जिसे होश खोकर पार करने वालों के नाम के साथ बलात्कारी जुड़ गया है.

अपने आस पास भाई, दोस्त, पति किसी भी रिश्ते में एक लड़के को देखें तो ऐसा लगे... जो उसे कहिए कि ज़रूरत इस बारीक लाइन से दूर भागने की है.

ताकि जब वो एक सही उम्र और मौक़ा आए और आप कह सकें,

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Image caption एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा.. फ़िल्म में अनिल कपूर और सोनम पिता बेटी की भूमिका में हैं

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा...

'प्यार है तुमसे, मेरे साथ ज़िंदगी बिताओगी?'

'यार तू मेरी सबसे पक्की वाली दोस्त है.'

'शादी नहीं करना चाहती, इट्स ओके बिटिया.'

'मेरी लाडली लेस्बियन है.'

किसी महंगे रेस्त्रां के कैंडल लाइट डिनर, पहाड़ की ख़ूबसूरत चोटी पर नहीं. किसी के साथ ज़िंदगी बिताने के ख्याल मजबूत उन सुबहों में होंगे, जिनमें कीचड़ भरी आँखें भी खूबसूरत लगें. बगलों के बाल छुपाने की कोशिश में किसी लड़की का बांहें न फैलाना चुभने लगे. वो ज़रूरत समझ में आने लगे कि जब पांच दिन सामने से बेवजह की चिढ़न देखकर भी चुप रहकर समझना होता है,

चॉकलेट्स या ऐसी मीठी सी मुस्कान लिए. प्यार सिर्फ़ गुलाब के फूल देने से भर से थोड़ी पूरा होता है. बहुत कुछ और चाहिए होता है, जो फ़िल्में अब तक नहीं दिखा पाई हैं.

तभी जाकर कोई लड़की आपको देखेगी तो ये कह पाएगी- एक लड़के को देखा तो ऐसा लगा. दो लोग एक-दूजे में पक्की वाली दोस्ती खोज पाएंगे.

या फिर ये भी गुंजाइश रहती ही है कि ऐसी किसी लड़की के मिलने पर आपको लगे कि ये मेरी पक्की वाली दोस्त होगी. जिसके साथ मैं मोहनीश बहल के उस डॉयलॉग को झूठा साबित किया जाएगा- एक लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं होते.

मगर इन दोनों की चरणों के बाद 'एक लड़की को देखा तो कैसा लगा..' उन मां-बापों के माथे की सिलवटों पर बैठ जाएगा, जिनके मन में बेटी के लिए प्यार से ज़्यादा ख़तरा है.

ख़तरा कि कोई अपना ही निगाह गंदी करके बेटी के साथ... कहीं कोई लड़का धोखा न दे दे... सारी चिंताएं बिलकुल सही हैं.

बस इसके पैमाने भी सही रहें. मसलन- जाति, ग़रीब-अमीर, बैकग्राउंड, धर्म पैमाना न बन पाए.

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Image caption एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा फ़िल्म के ट्रेलर का एक सीन

ऐसे मां-बापों ने बेटियों को जिस भरोसे से स्कूल, कॉलेज भेजा होता है... वही बेटी किसी लड़के पर भरोसा जताए तो ऊपर लिखे कोई पैमाने आड़े न पाएं.

भरोसे पर भरोसा करना सीखिए, सच साबित होता है तो ग़ज़ब सुख मिलता है.

ताकि आपको ये न लगे कि अपनी लड़की को देखा तो ऐसा लगा... ये ऐसा कैसे कर सकती है.

फिर चाहे अब आपकी लड़की को किसी लड़की से और किसी लड़के को लड़के से प्यार ही क्यों न हो गया हो. हम सबकी परवरिश ऐसी है कि इसे स्वीकार करना मुश्किल है.

पर अब से जब कभी 'एक लड़की/लड़का को देखें तो ऐसा लगा...' लाइन सोचकर उनकी जगह खुद को रखकर सोचिएगा. या जो भी लगे तो उस सोच के मजबूत होने से पहले लड़के और लड़की से ही पूछ लीजिएगा.

जो जवाब मिले, उसे पूरा सुन समझ लीजिएगा, रोकिएगा मत. याद करिएगा नए गाने की एक लाइन...

'रंग जानी रे मरजानी रा. कहनी जो थी कह दे वो बात हो..'

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा कि शायद अब तक हमें बहुत कुछ ग़लत लगा. क्यों हार्दिक पंड्या?

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