शीला दीक्षित दिल्ली में कांग्रेस की मजबूती या मजबूरी?: नज़रिया

  • 12 जनवरी 2019
सोनिया गांधी के साथ शीला दीक्षित इमेज कॉपीरइट Getty Images

दिल्ली की राजनीति में शीला दीक्षित की वापसी से दो बातें उजागर हुईं हैं. एक, यह कि कांग्रेस के पास क्षेत्रीय स्तर पर प्रभावशाली नेताओं की कमी है. दूसरे, पिछले कई दशक में कांग्रेस के सबसे सफल नेताओं के नाम पूछे जाएं, तो शीला दीक्षित का नाम सबसे पहले याद आएगा.

कांग्रेस के ही नहीं, देश के सबसे अच्छे राजनेताओं में उनकी गिनती होती है.

दिल्ली में विधानसभा चुनाव अभी कुछ दूर हैं, पर उसके पहले लोकसभा चुनाव हैं, जिनमें उनका प्रभाव देखने को मिलेगा.

लोकसभा चुनाव से पार्टी विधानसभा के लिए मजबूत बुनियाद तैयार कर सकती है. कांग्रेस के पास परखे हुए नेतृत्व और नई रणनीति को मिलाकर सफलता हासिल करने का मौका है.

सफलता चाहिए

कांग्रेस को फिलहाल सफलताओं की जरूरत है. दिल्ली उसके लिए बेहतरीन जगह है और शीला दीक्षित सही नेता. व्यक्तिगत जीवन में वे आत्म-निर्भर और आत्मविश्वासी महिला हैं. वर्षों के अनुभव ने उन्हें राजनीति के दाँव-पेंच भी सिखा दिए हैं.

लगातार तीन बार मुख्यमंत्री पद पर जीत दर्ज करना और दिल्ली को आधुनिक सुविधाओं से लैस करना उनकी उपलब्धि है. संतुलित और संयत बयान उनके व्यक्तित्व की संजीदगी को व्यक्त करते हैं.

सन् 2013 के चुनाव के दौरान और उसके पहले भी अरविन्द केजरीवाल की कड़वी बातों का जवाब उन्होंने हमेशा मुस्कराकर दिया.

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स्वास्थ्य की चुनौती

अजय माकन के नेतृत्व में हाल के वर्षों में पार्टी की गतिशीलता बढ़ी है. उनके इस्तीफ़े से पार्टी को धक्का लगा है, जिसकी भरपाई शीला दीक्षित कर सकती हैं.

उनके बारे में नकारात्मक बात उनका स्वास्थ्य और उम्र है. पिछले साल उनकी हार्ट सर्जरी भी हुई है.

शायद यह सब देखते हुए उनके साथ तीन कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाए गए हैं. ऐसा दिल्ली में पहली बार हुआ है.

गुरुवार को दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की सूचना के बाद उन्होंने कहा, मैं स्वस्थ हूँ. जहाँ तक पार्टी संगठन की बात है, काफी हद तक एकता है, जो पाँच साल पहले बिखरने लगी थी और विधानसभा चुनाव में हार के बाद और बिखरी थी.

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Image caption 2014 जुलाई में केरल की राज्यपाल के तौर पर शीला दीक्षित की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात

क्या होगी रणनीति?

उनके पुनरागमन के बाद पार्टी की रणनीति पर भी नजर डालनी होगी. एक बड़ा सवाल है कि क्या आम आदमी पार्टी के साथ उसका गठबंधन होगा? बताया जाता है कि अजय माकन के इस्तीफे के पीछे एक बड़ा कारण 'आप' के साथ सम्भावित गठबंधन की बातें भी थीं.

शीला दीक्षित को पार्टी हाईकमान की धारणा का अनुमान जरूर होगा. वे पार्टी के उन गिने-चुने नेताओं में से हैं, जिनके व्यक्तिगत रूप से सोनिया गांधी के साथ अच्छे रिश्ते हैं.

हाल में तीन राज्यों के मुख्यमंत्रियों के नाम तय करते वक्त यह बात भी जाहिर हुई कि सोनिया गांधी अब भी महत्वपूर्ण मौकों पर फैसले करने में सहायता कर रहीं हैं. सवाल है कि क्या वे 'आप' के साथ गठबंधन के पक्ष में हैं?

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'आप' की पहल

गठबंधन करने की पहल 'आप' की तरफ से ज्यादा है. कांग्रेस पार्टी बीजेपी और 'आप' दोनों को अपना प्रतिस्पर्धी मानती रही है. विरोधी दलों के गठबंधन में 'आप' भी सक्रिय है. इस वजह से कांग्रेस की दिलचस्पी उसमें हो सकती है.

सवाल है कि क्या बीजेपी को निर्णायक रूप से परास्त करने में कांग्रेस उसके साथ जाएगी? या वह अकेले ही उसे परास्त करने में खुद को समर्थ पाती है?

पिछले रविवार को अरविन्द केजरीवाल ने ककरोला की एक सभा में लोगों से अपील की कि बीजेपी को तो हराएं, पर कांग्रेस को भी वोट नहीं दें. पर यह राजनीतिक बयान है और केवल इतने से निष्कर्ष नहीं निकलता.

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शीला दीक्षित को भारत के सबसे सफल मुख्यमंत्रियों में से एक माना जाता है.

शीला दीक्षित की भूमिका

कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं हुआ, तो शीला दीक्षित की वापसी 'आप' के लिए खराब खबर है. वह अपने को बनाए रखना चाहती है. दिल्ली में कांग्रेस अपने बलबूते बीजेपी को हराने में सफल हुई, तो इससे 'आप' का अस्तित्व खतरे में पड़ेगा.

दिसम्बर 2013 में अपनी हार के बावजूद शीला दीक्षित ने आम आदमी पार्टी को समर्थन देकर सरकार बनाने का मौका दिया था. उनका उद्देश्य उसके अंतर्विरोधों को उजागर करना भी था. उसके बाद 2015 के चुनाव में 'आप' को आशातीत सफलता मिली. पर तबतक शीला दीक्षित दिल्ली की राजनीति से दूर हो गईं थीं. हालांकि निष्क्रिय वे फिर भी नहीं हुईं.

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हिसाब चुकाने का मौका

'आप' के प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने उनकी वापसी को कांग्रेस में नेतृत्व के संकट का सबूत बताया है. शीला दीक्षित की मनोकामना भी अब सत्ता में रहने की नहीं है, पर कुछ हिसाब चुकाने की इच्छा उनकी भी होगी.

उनका नाम 2016 में कांग्रेस ने कुछ समय के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के प्रत्याशी के रूप में भी पेश किया था. इसकी वजह भी उनकी वह कुशल-छवि थी, जो दिल्ली के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने बनाई थी.

बाद में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कायम कर लिया और शीला दीक्षित को भुला दिया. अब उनकी वापसी से लगता है कि पार्टी उनके व्यक्तित्व और अनुभव का लाभ उठाना चाहती है. इस बीच उसे युवा नेतृत्व को विकसित भी करना होगा.

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