भारत प्रशासित कश्मीर में कितना बड़ा है इस्लामिक स्टेट का ख़तरा

  • 14 जनवरी 2019
जामा मस्जिद में झंडे लहराने वाले नक़ाबपोश इमेज कॉपीरइट Bilal Bahadur/BBC

नए साल की शुरुआत के साथ कश्मीर में एक नई बहस भी शुरु हो गई है.

बहस का मुद्दा ये है कि क्या कश्मीर में इस्लामिक स्टेट का सांगठनिक ढांचा मौजूद है या फिर इसे लेकर सिर्फ काल्पनिक तस्वीरें गढ़ी जा रही हैं.

कश्मीर में आईएसआईएस की मौजूदगी को लेकर चर्चा नई नहीं है. नया ये है कि इस बार कश्मीर की एक मशहूर मस्जिद में आईएसआईएस का झंडा लहराया गया है.

श्रीनगर की जामा मस्जिद में आईएसआईएस के झंडे लहराए जाने को अनदेखा नहीं किया गया. इसे लेकर पूरे कश्मीर में नाराज़गी दिखी.

28 दिसंबर 2018 को श्रीनगर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में शुक्रवार की नमाज़ के बाद कुछ नक़ाबपोश लोग दाखिल हुए और इस्लामिक स्टेट का झंडा लहराया. उन्होंने इस्लामिक स्टेट ज़िंदाबाद के नारे भी लगाए.

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घटना की निंदा

उन्होंने मस्जिद में जो काले झंडे लहराए उन पर अरबी भाषा में लिखा था "ला इलाहा इल्लल्लाह" यानी अल्लाह के सिवा कोई और ईश्वर नहीं है.

उस वक़्त मस्जिद में नमाज पढ़ने आए लोगों ने नक़ाबपोश लोगों को पकड़ने की कोशिश की ताकि वो मंच तक नहीं पहुंच सकें.

हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (एस) समूह के प्रमुख मीरवाइज़ मौलवी उमर फारूक उसी जगह से जुमे की तकरीर करते हैं.

अगले दिन इस घटना की 15 सेकेंड की वीडियो क्लिप सोशल मीडिया में वायरल हो गई. इसे लेकर जामा मस्जिद में भी हंगामा हुआ.

इस घटना को पूरे कश्मीर में हैरानी से देखा गया. मस्जिद की प्रबंध समिति अंजुमन औकाफ जामा मस्जिद ने बाद में एक बयान जारी किया और कहा कि इस तरह की हरकतों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. कमेटी ने चेतावनी दी कि कोई मस्जिद की पाकीज़गी को इस तरह से ख़राब करे, इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

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इस्लाम विरोधी बताया

अलगाववादियों और मुख्यधारा के राजनीतिक दलों ने एक सुर में इस घटना की निंदा की. उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण और इस्लाम विरोधी बताया.

अलगाववादियों ने एक साझा बयान में कहा, "कुछ नक़ाबपोश लोगों ने इस्लाम के मूल्यों और शिक्षाओं को अनदेखा किया. उन्होंने मस्जिद की पवित्रता को नष्ट किया. उन्होंने मस्जिद के मंच को भी नापाक करने की कोशिश की."

अलगाववादियों की ज्वाइंट रेजिस्टेंस लीडरशिप (जेएलआर) में सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज़ मौलवी उमर फारुक़ और यासीन मलिक शामिल हैं. उन्होंने इस घटना को आज़ादी के अभियान को बदनाम करने की कोशिश बताया.

इस घटना के बाद मीरवाइज़ मौलवी उमर फारुक़ जामा मस्जिद पहुंचे और उस मंच को साफ़ किया जहां नक़ाबपोश लोगों ने आईएसआईएस के झंडे लहराए थे.

चरमपंथी संगठनों ने भी इस घटना की निंदा की.

हिज्बुल मुजाहिदीन के मुख्य ऑपरेशनल कमांडर रियाज़ नाइको ने बीते रविवार को एक ऑडियो संदेश में कहा, "जिन लोगों ने आईएसआईएस के झंडे लहराए वो भारत के एजेंट हैं. इस ऑडियो क्लिप में युवाओं से अपील की गई कि वो इन तिकड़मों के झांसे में न आएं. हमारा अभियान स्थानीय है."

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पुलिस ने क्या कहा?

कश्मीर में युवाओं का आईएसआईएस के झंडे लहराना कोई नई बात नहीं है. ऐसा कश्मीर में पहली बार नहीं हुआ है.

बीते कुछ बरसों के दौरान श्रीनगर के निचले इलाकों में जुमे के रोज़ जामा मस्जिद के आगे जुटने वाले युवा आईएसआईएस के झंडे लहराते रहे हैं. ऐसा कश्मीर के दूसरे हिस्सों में भी होता रहा है. ये सिलसिला जारी है.

हालांकि, पुलिस कश्मीर में आईएसआईएस की बड़े पैमाने पर मौजूदगी से इनकार करती रही है.

जम्मू कश्मीर पुलिस के महानिदेशक दिलबाग सिंह ने हाल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस बात से इनकार किया था कि कश्मीर में आईएसआईएस बड़े पैमाने पर मौजूद है.

डीजीपी सिंह ने कहा, "कुछ लोगों ने पहले भी ऐसी कोशिशें की हैं. ऐसे झंडे लहराकर सार्वजनिक तौर पर ये ज़ाहिर करने की कोशिश की गई है कि ऐसे तत्व बड़े पैमाने पर मौजूद हैं. मैं दोबारा कहता हूं कि यहां आईएसआई की बड़ी मौजूदगी नहीं है. लेकिन तथ्य ये है कि लोगों को इस आधार पर बरगलाया जा रहा है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता है."

पूर्व महानिदेशक एसपी वैद ने एक साक्षात्कार में कहा था, "सोशल मीडिया की वजह से युवा आईएसआईएस की विचारधारा की तरफ आकर्षित हो रहे हैं."

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इतिहास क्या है?

कश्मीर में झंडों का रंग बदलना पहली या अनोखी घटना नहीं है. 1990 के दशक में जब कश्मीर में भारतीय शासन व्यवस्था के ख़िलाफ सशस्त्र विद्रोह की शुरुआत हुई तब कश्मीर में सिर्फ हरे रंग के झंडे दिखाई देते थे.

बीते दो साल के दौरान सुरक्षाबलों के साथ अलग-अलग मुठभेड़ों में मारे गए श्रीनगर के दो चरमपंथियों के शव आईएसआईएस और अलक़ायदा के झंडों में लिपटे थे. कुछ मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि मुगीस अहमद मीर के अंतिम संस्कार के बाद उनके रिश्तेदारों ने ये बात मानी कि वो आईएसआईएस की विचारधारा से प्रेरित था.

1990 के दशक के बाद ये किसी चरमपंथी का ऐसा जनाज़ा था जिसमें पांच हज़ार लोगों ने शिरकत की.

मुगीस की मुठभेड़ में मौत के महीनों पहले हिज़्बुल मुजाहिदीन के चरमपंथी सज़्जाद अहमद गिल्कर का शव आईएस और अल क़ायदा के काले झंडे में लिपटा था. गिल्कर श्रीनगर के रहने वाले थे लेकिन उनकी शव यात्रा में उतने लोग नहीं आए थे.

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क्या कहते हैं प्रदर्शनकारी

हाल में शुक्रवार को मैं नौहट्टा इलाके में कुछ नक़ाबपोश लोगों से मिला. ये लोग उन पांच सौ से ज़्यादा युवाओं में से थे जो सुरक्षाबलों पर पथराव और उनके साथ संघर्ष में शामिल थे.

एक प्रदर्शनकारी के हाथ में आईएसआईएस का झंडा था. उससे बातचीत के दौरान मैंने पूछा कि उसने ये काला झंडा क्यों थामा हुआ है?

उन्होंने जवाब दिया, "ये हमारे ज़ाकिर मूसा का झंडा है. ये इस्लाम का झंडा है. हम यहां पाकिस्तान का झंडा नहीं लहरा रहे हैं. इंशाअल्लाह हम यहां इस्लाम का शासन स्थापित करेंगे."

नक़ाब पहने एक और लड़के ने कहा, "आईएसआईएस एक मुजाहिद संगठन है. वो मुजाहिदीन हैं और हम भी मुजाहिदीन हैं. इसलिए हम उनका समर्थन करते हैं."

झंडे लहराने वालों की गतिविधियों पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों की राय है कि कश्मीर के युवा आईएसआईएस और अल क़ायदा की विचारधारा के प्रति आकर्षित हो रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक अहमद अली फयाज़ कहते हैं, "साल 2014 से पहले कश्मीर में कहीं भी आईएसआईएस का कोई झंडा दिखाई नहीं देता था. इसके लिए कोई जिम्मेदार है? मैं निजी तौर पर मानता हूं कि कश्मीर में आईएसआईएस या फिर अलक़ायदा कोई सांगठनिक ढांचा नहीं है. ऐसा लगता नहीं है. हमें न तो दिखाई देता है और न ही महसूस होता है कि आईएसआईएस या फिर अलक़ायदा कश्मीर में मौजूद हैं."

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कौन हैं ज़ाकिर मूसा

वो आगे कहते हैं, "कई बार वो कश्मीर में सुरक्षाबलों पर चरमपंथियों की ओर से होने वाले हमलों की जिम्मेदारी लेते हैं. अतीत में भी अल हूर या फिर अहमाक़ जैसी वेबसाइटों पर उन्होंने जिम्मेदारी ली है. लेकिन इस सवाल का जवाब नहीं मिलता है कि सीरिया में होने वाले हमलों और कश्मीर के हमलों के तरीकों में अतंर है. अगर हम ये नहीं देख सकते हैं तो इसके मायने ये नहीं हैं कि हम साफ तौर पर इस तथ्य को खारिज कर दें कि आईएसआईएस या फिर अलक़ायदा जैसी कोई चीज नहीं है."

अहमद कहते हैं कि जब से ज़ाकिर मूसा हिज़्बुल मुजाहिदीन से अलग हुए हैं तब से युवाओं में उनकी लोकप्रियता बढ़ी है. युवा विरोध प्रदर्शनों के दौरान नारे लगाते हैं, "मूसा, मूसा ज़ाकिर मूसा."

लेकिन साथ ही वो ये भी कहते हैं, "ये लोग आईएसआईएस या अलक़ायदा से सीधे तौर पर जुड़े नहीं हैं."

वो कहते हैं, "ज़ाकिर मूसा एक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं. कश्मीर में बड़ी संख्या में लोग हैं जो उनकी विचारधारा से प्रभावित हैं. ये लोग आईएसआईएस या फिर अलक़ायदा के कार्यकर्ता नहीं हैं."

ज़ाकिर मूसा चरमपंथी संगठन अंसार अज़वात उल हिंद के मुख्य कार्यकारी कमांडर हैं. पहले वो हिज़्बुल मुजाहिदीन से जुड़े थे.

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साल 2017 की 27 जुलाई को लंदन के गार्डियन अख़बार ने ख़बर प्रकाशित की कि अलक़ायदा ने अपनी कश्मीर शाखा अंसार गज़वात उल हिंद के नाम से शुरू की है और मूसा को इसका प्रमुख बनाया है.

बीते कुछ दिनों में मूसा ग्रुप के आठ से ज़्यादा चरमपंथियों को मुठभेड़ में मार गिराया गया है.

साल 2017 में मूसा ने अलगाववादी नेताओं को चेतावनी दी थी कि "इस्लाम के लिए संघर्ष में हस्तक्षेप करने पर उनके सिर श्रीनगर के लाल चौक पर कलम कर दिए जाएंगे."

इसके पहले सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज़ मौलवी उमर फारुक़ और यासीन मलिक समेत अलगाववादी नेताओं ने बयान दिया था कि कश्मीर के संघर्ष का आईएसआईएस या फिर अलक़ायदा जैसे संगठनों से कोई लेना देना नहीं है. मूसा का बयान इसके बाद ही आया था.

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विश्लेषकों के तर्क

अहमद इस तर्क को मानने से इनकार करते हैं कि आईएसआईएस के झंडे सिर्फ़ भारत को उकसाने के लिए लहराए जाते हैं.

वो कहते हैं, "मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूं जो कहते हैं कि आईएसआईएस के झंडे सिर्फ उकसावे या फिर धमकी देने के लिए लहराए जाते हैं. ऐसे लोग कश्मीर के ज़मीनी हालात से वाकिफ नहीं हैं."

कश्मीर के समाजशास्त्रियों का कहना है कि यहां आईएसआईएस के झंडे लहराया जाना हम सभी के लिए चिंता की बात है.

कश्मीर यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र विभाग के प्रमुख पीरज़ादा अमीन कहते हैं, "जहां तक कश्मीर में आईएसआईएस के झंडे लहराने का सवाल है कि ये वाकई चिंता का मामला है. हमने मध्य पूर्व में इसके सामाजिक असर को देखा है. मध्य पूर्व में क्या हुआ? लेकिन मैं फिलहाल कश्मीर में ऐसी स्थिति नहीं देखता हूं. एक बात तो है जो भी कुछ इसके पीछे हो लेकिन ज़ाहिरा तौर पर इसमें युवाओं के लिए एक संदेश है. हमें इसे बहुत गंभीरता से लेना चाहिए."

लेकिन, कुछ अन्य लोगों के लिए कश्मीर में आईएसआईएस की मौजूदगी और युवाओं को कट्टरपंथी बनाए जाने की बातें सिर्फ एक मिथक हैं.

पुलिस के रिटायर्ड डीआईजी अली मोहम्मद वटाली ने बीबीसी से कहा, "कश्मीर के युवा ये हकीकत नहीं जानते हैं कि आईएसआईएस क्या है? झंडे लहराने के मुद्दे को दो तरह से देखा जा सकता है. पहली बात तो ये हो सकती है कि जब युवा सुरक्षा बलों पर पथराव करते हैं और फिर आईएसआईएस के झंडे लहराते हैं तो वो उन्हें उकसाने और ये संदेश देने की कोशिश कर रहे होते हैं कि हम आपसे इस स्तर पर संघर्ष कर सकते हैं. दूसरी संभावना ये भी है कि हो सकता है कि इसमें कोई एजेंसी शामिल हो. कश्मीर में चरमपंथ है. आज़ादी का संघर्ष भी चल रहा है तो हो सकता है कि कुछ लोग इस अभियान को बदनाम करना चाहते हों."

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वटाली ये मानने को तैयार नहीं हैं कि कश्मीर के युवाओं को धार्मिक तौर पर कट्टर बनाने की कोशिश की जा रही है.

वो कहते हैं, "अगर कश्मीर के युवाओं को धार्मिक तौर पर कट्टर बनाया जा रहा होता तो यहां मस्जिदों में बड़ी संख्या में लोग नमाज़ के लिए जुटते. हमारी मस्जिदें खाली हैं. कट्टरवाद के नाम पर भी कश्मीर को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है."

वो ये भी कहते हैं, "कश्मीर की अपनी समस्याएं हैं. आईएसआईएस की मौजूदगी से कश्मीर का कोई लेना देना नहीं है."

पत्रकार हारुन रेशी कहते हैं कि कोई भी भरोसे के साथ ये नहीं बता सकता है कि इसके पीछे कौन है और कौन इन गतिविधियों को अंजाम देता है?

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वो कहते हैं, " बीते तीन साल में हमने कश्मीर में आईएसआईएस की सिर्फ कुछ घटनाएं देखी हैं. नवंबर 2017 में आईएसआईएस ने श्रीनगर के बाहरी हिस्से में पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या की जिम्मेदारी ली थी. एक अन्य घटना को आईएसआईएस से जोड़ा जाता है जिसमें अलगाववादी नेता फज़ल उल हक़ कुरैशी के बॉडीगार्ड की हत्या हुई थी."

हारुन कहते हैं, "कश्मीर में लोग आईएसआईएस की मौजूदगी का समर्थन नहीं करते. हमने हाल में जामा मस्जिद की घटना से देखा कि किस तरह आम लोगों से लेकर चरमपंथी संगठनों ने इसकी निंदा की."

वो ये भी कहते हैं, "लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि कुछ मुट्ठीभर लोग ऐसी विचारधारा से प्रभावित हो जाते हैं."

हारुन ये भी कहते हैं कि इन घटनाओं से ये नहीं कहा जा सकता कि कश्मीर में आईएसआईएस ने गहरे तक जड़ें जमा ली हैं.

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