सपा-बसपा उत्तर प्रदेश में बराबर सीटों पर लड़ेंगी चुनाव

  • 12 जनवरी 2019
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  • उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे
  • अमेठी और रायबरेली को कांग्रेस के लिए छोड़ी गई
  • दो सीटें अन्य सहयोगी पार्टियों को दी जाएंगी
  • राष्ट्रीय लोकदल को सीटों का सवाल टाल गए मायावती और अखिलेश
  • 4 जनवरी को ही दिल्ली में हो गया था सीटों का बंटवारा
  • अमित शाह और नरेंद्र मोदी (गुरु-चेले) की नींद हमने उड़ा दी है- मायावती

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने शनिवार को लखनऊ के ताज होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके दोनों पार्टियों के बीच औपचारिक गठबंधन का ऐलान कर दिया है.

गठबंधन के तहत दोनों पार्टियां आगामी लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 76 सीटों पर मिलकर चुनाव लड़ेंगी. बसपा और सपा 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी.

रायबरेली और अमेठी की सीट कांग्रेस के लिए छोड़ दी गई है. इसके अलावा बाकी की दो सीटें सहयोगी पार्टियों को दी जाएगी.

मायावती और अखिलेश दोनों ने स्पष्ट किया कि ये गठबंधन सिर्फ़ लोकसभा चुनावों तक सीमित नहीं है और प्रदेश के विधानसभा चुनाव भी दोनों दल मिलकर लड़ेंगे.

अखिलेश यादव से यह सवाल पूछे जाने पर कि मायावती बहुत अनुभवी हैं और चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, क्या वो मायावती को प्रधानमंत्री बनवाएंगे, अखिलेश ने कहा, "आपको पता है कि मैं किसको सपोर्ट करूंगा. और मैंने पहले भी कहा है और आज फिर कहता हूं कि उत्तर प्रदेश ने हमेशा प्रधानमंत्री दिया है. हमें खुशी होगी कि उत्तर प्रदेश से फिर एक प्रधानमंत्री बने."

मायावती जी का असम्मान मेरा असम्मान: अखिलेश यादव

समाजवादी सुप्रीमो अखिलेश यादव ने कहा, "उन्होंने मायावती के साथ गठबंधन करने का फ़ैसला उस वक़्त ले लिया था जब बीजेपी के कुछ नेताओं ने मायावती के प्रति अशोभनीय टिप्पणियां कीं और बीजेपी ने इन नेताओं को दंडित करने की जगह मंत्रालय देकर उनके हौसले बुलंद किए."

इसके साथ ही मायावती के ख़िलाफ़ उठने वाली आवाज़ों पर अखिलेश यादव ने कहा है कि अगर आगे से मायावती के ख़िलाफ़ कोई आवाज़ उठती है तो ये पहले उनका असम्मान होगा.

लंबा चलेगा सपा-बसपा गठबंधन: मायावती

मायावती ने गेस्ट हाउस कांड का ज़िक्र करते हुए कहा, "1993 में श्री कांशीराम जी और श्री मुलायम सिंह यादव ने एक साथ मिलकर साल चुनाव लड़ा था. इसके बाद परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में हवा का रुख बदलते हुए और बीजेपी जैसी घोर जातिवादी एवं सांप्रदायिक पार्टी को पछाड़ते हुए सरकार बनाई गई थी. हालांकि, ये गठबंधन कुछ गंभीर कारणों की वजह से ज़्यादा समय तक नहीं चल सका. इनमें से एक घटना 2 जून, 1995 में घटित हुआ लखनऊ गेस्ट हाउस कांड थी. लेकिन जनहित को उस घटना से भी ऊपर रखते हुए एक बार फिर उसी प्रकार की दूषित राजनीति के ख़िलाफ़ आपस में चुनावी समझौता करने का फ़ैसला किया है."

मायावती ने कहा, "मैं ये बताना चाहती हूं कि कांग्रेस पार्टी को शामिल नहीं करने की वजह ये है कि आज़ादी के बाद कांग्रेस ने राज्य से लेकर केंद्र में राज किया है. इस दौरान देश में वंचित शोषितों के ख़िलाफ़ अन्याय किया गया है."

उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने ही देश में अधिकतर समय शामिल किया और इनके शासनकाल में गरीबी, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार बढ़ा है. इसके परिणास्वरूप ही बसपा और सपा जैसी पार्टियों का गठन हुआ और कांग्रेस की सत्ता से मुक्ति मिल सके.

सपा और बसपा के गठबंधन पर मायावती ने कहा है कि दोनों पार्टियों के बीच ये गठबंधन सिर्फ इस चुनाव के लिए नहीं है, बल्कि आने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी चलेगा.

कितना असरदार होगा ये गठबंधन?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती 1984 से हैं और आम लोगों के बीच उनकी छवि एक मजबूत प्रशासक की रही है.

वहीं, अगर अखिलेश यादव की बात करें तो 2017 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी अखिलेश यादव अब तक एक बेदाग नेता हैं.

लेकिन अगर दोनों नेताओं की चुनावी ताकत की बात करें तो पिछले लोकसभा चुनाव में मायावती के हाथ एक भी सीट नहीं लगी थी. और विधानसभा चुनाव में उनके हाथ सिर्फ 19 विधानसभा सीटें लगी थीं.

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लेकिन अगर मायावती को मिलने वाले मतदाता समर्थन की बात करें तो मायावती को मिलने वाला परंपरागत वोट अब तक उनके ही पास है.

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सत्ता पक्ष के लिए चुनौती

अखिलेश यादव और मायावती के बीच गठबंधन की ख़बर सामने आने के बाद से कयास लगाए जा रहे थे कि इससे उत्तर प्रदेश में बीजेपी को नुकसान हो सकता है.

और ये गठबंधन प्रधानमंत्री मोदी के एक बार फिर लोक कल्याण मार्ग पहुंचने की राह में रोड़ा बनकर खड़ा होगा.

लेकिन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने हाल ही में कहा है कि उनकी पार्टी अगले चुनाव में उत्तर प्रदेश में 73 से 74 सीटें लेकर आएगी.

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इससे पहले 2014 के चुनाव में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश की 71 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी.

इसके बाद 2017 के चुनाव में भी बीजेपी ने भारी बहुमत से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जीत लिया है.

इस चुनाव के लिए मतदात के बाद ही अखिलेश यादव ने पहली बार बीबीसी के साथ बातचीत में मायावती के साथ गठबंधन करने के संकेत दिए थे.

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