नेताओं के दिल मिले, क्या मतदाताओं के भी मिल सकेंगे?

  • 12 जनवरी 2019
अखिलेश यादव और मायावती इमेज कॉपीरइट AFP/Getty Images

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के ताज होटल में शनिवार को समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की जब 'ऐतिहासिक' प्रेस वार्ता हो रही थी, तब लाल टोपी लगाए और झंडा थामे सपा कार्यकर्ता होटल के बाहर जोश में नारेबाज़ी कर रहे थे.

कुछ कार्यकर्ताओं ने सपा के झंडे पकड़ रखे थे और कुछ ने सपा के साथ बसपा के भी झंडे थाम रखे थे. सिर्फ़ बसपा का झंडा थामे बहुत कम लोग दिख रहे थे.

प्रेस वार्ता ख़त्म होने के बाद जब दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं से बात करने की कोशिश की तो वहां भी सपा के ही कार्यकर्ता बहुतायत में थे.

उन्हीं में से लाल टोपी पहने और दोनों पार्टियों का झंडा थामे बाराबंकी से आए एक युवा सुरेंद्र यादव ने कहा, "अब हमें दोनों पार्टियों का समझिए. सपा-बसपा अब मिल गई हैं और यूपी से भाजपा का पत्ता साफ़ होने वाला है."

सुरेंद्र यादव के इतना कहते ही वहां मौजूद कई युवकों ने एक स्वर से अखिलेश-मायावती और सपा-बसपा के समर्थन में नारे लगाने शुरू कर दिए. इन युवकों का ये भी कहना था कि पिछले दो दशक से वो भले ही एक-दूसरे के ख़िलाफ़ रहे हैं, एक-दूसरे से लड़े-झगड़े हैं, लेकिन अब दोनों एक-दूसरे का साथ देंगे.

वहां मौजूद और ख़ुद को बसपा का कार्यकर्ता बताने वाले दिनेश कुमार कनौजिया ने भी इन युवकों के स्वर में स्वर मिलाया.

शनिवार को दोनों पार्टियों ने आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए गठबंधन की औपचारिक घोषणा की और 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ने के समझौते का एलान किया.

अमेठी और रायबरेली में दोनों पार्टियां उम्मीदवार नहीं उतारेंगी और दो सीटें इसलिए रिज़र्व रखी गई हैं ताकि यदि गठबंधन में कुछ अन्य साथी आएं तो उन्हें दी जा सकीं.

पहले भी मिलाया था हाथ

सपा और बसपा ने इसके पहले 1993 में विधानसभा चुनाव के दौरान भी गठबंधन किया था और यूपी में सरकार बनाई थी. हालांकि ये गठबंधन दो साल के भीतर ही बेहद कड़वाहट के साथ टूट गया था. ये कड़वाहट न सिर्फ़ दोनों दलों के नेताओं के बीच थी बल्कि कार्यकर्ताओं तक में निजी दुश्मनी की हद तक दिखती थी.

ऐसे में सवाल उठता है कि नेताओं के बीच गठबंधन भले ही हो गया हो लेकिन क्या कार्यकर्ताओं के दिल भी इसी तरह से मिल सकेंगे और इनके 'समर्पित' मतदाताओं के बीच नेताओं की अपील क्या इतनी कारगर होगी कि वो जहां कह देंगे, मतदाता वहीं वोट दे देगा?

लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं कि दोनों पार्टियों के मूल मतदाता कहे जाने वाले वर्गों के लोग मौजूदा सरकार में ख़ुद को उपेक्षित ही नहीं बल्कि पीड़ित के रूप में देख रहे हैं.

उनके मुताबिक़, "न सिर्फ़ आम मतदाता बल्कि इन वर्गों के अधिकारी, कर्मचारी और दूसरे लोग भी ऐसा महसूस कर रहे हैं. ये ठीक है कि अब तक दोनों एक-दूसरे के ख़िलाफ़ रहे हैं लेकिन इन्हें लगता है कि शायद साथ मिलकर इस स्थिति से छुटकारा मिल सकता है."

"दूसरे, जिस तरह से दोनों पार्टियों के सामने अस्तित्व का संकट है, वैसे ही इनके समर्थक भी राजनीतिक अस्तित्व की तलाश में हैं. इसलिए इन वर्गों का एक बड़ा हिस्सा गठबंधन के पक्ष में वोट देगा."

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क्या ज़मीनी स्थिति अलग होगी?

लखनऊ में ताज होटल के बाहर कार्यकर्ताओं का जोश भले ही गठबंधन का अंध समर्थन करता दिख रहा हो, ज़मीनी स्तर पर भी स्थिति यही होगी, ऐसा लगता नहीं है.

पिछले साल हुए तीन फूलपुर और गोरखपुर के उपचुनावों में बसपा के समर्थन से सपा उम्मीदवारों को मिली जीत के बाद कई बसपा नेता और कार्यकर्ता अनौपचारिक बातचीत में ये आशंका ज़ाहिर करते हुए मिले कि बसपा ने तो अपने वोट ट्रांसफ़र करा दिए, लेकिन सपा भी करा पाएगी, उसमें संदेह है.

इनके इस संदेह को पिछले साल ही हुए राज्यसभा चुनाव के दौरान और बल मिला जब बसपा के उम्मीदवार को समाजवादी पार्टी का अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका और उसे हार का सामना करना पड़ा.

अखिलेश यादव ने शनिवार को संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में इस बात पर खेद भी जताया. उनका कहना था, "जिस दिन बसपा उम्मीदवार भीमराव आंबेडकर को राज्यसभा में हार का सामना करना पड़ा, उसी दिन मैंने तय कर लिया था कि चाहे मुझे दो क़दम पीछे भी हटना पड़े, मैं बीएसपी से समझौता करूंगा."

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हालांकि जानकारों का ये भी कहना है कि दोनों पार्टियों के समर्पित मतदाताओं के वोट ट्रांसफ़र होने की बात से पहले ये सवाल भी अहम है कि अब इनके समर्पित मतदाता हैं कौन?

दरअसल, ऐसा माना जाता है कि सपा के पास कुछ पिछड़े वर्गों का और बसपा के पास कुछ दलित वर्गों का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो न सिर्फ़ इनका कट्टर समर्थक है बल्कि इनके कहने पर वो अन्य जगह भी वोट दे सकता है. बसपा के बारे में ये बात ख़ासतौर पर कही जा सकती है.

इलाहाबाद में समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहते हैं, "देखिए, पब्लिक अब समझदार हो गई है. वो किसी के कहने पर किसी को वोट दे देगी, ऐसा तभी संभव है जब उसने किसी ख़ास पार्टी या उम्मीदवार को वोट देने का मन न बनाया हो."

"बसपा के कार्यकाल में सपा कार्यकर्ताओं का जिस तरह से उत्पीड़न हुआ है, एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई हुई है, उसे वो भूला नहीं है. उसे ये भी पता है कि गठबंधन के पीछे नेताओं का अपना स्वार्थ कहीं ज़्यादा है, बजाय इसके कि कार्यकर्ताओं का कुछ भला होगा."

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कितना बड़ा साबित होगा शिवपाल फैक्टर?

जानकारों का ये भी कहना है कि शिवपाल यादव के अलग पार्टी बनाने के बाद समाजवादी पार्टी अपने उस वोट बैंक पर भी उतनी मज़बूती से दावा नहीं कर सकती, जिस मज़बूती से वो पहले करती थी.

शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया ने समाजवादी पार्टी के नेताओं को ही नहीं तोड़ा है, बल्कि ज़मीनी कार्यकर्ताओं तक में सेंध लगाई है और उसका असर चुनाव में भी दिखना तय है.

लेकिन बहुजन समाज पार्टी का मतदाता अभी भी उसके प्रति समर्पित दिखता है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा को भले ही कोई सीट न मिली हो लेकिन उसे 19.77 प्रतिशत मत मिले थे जबकि 2009 के लोकसभा चुनाव में उसे 27.20 प्रतिशत वोट के साथ 20 सीटों पर जीत भी हासिल हुई थी.

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बहुजन समाज पार्टी से संबंध रखने वाले गोरखपुर के अजय दुबे कहते हैं कि ज़मीनी स्तर पर तो कार्यकर्ता इस गठबंधन का इंतज़ार बेसब्री से कर रहा था.

उनके मुताबिक, "सपा और बसपा के कार्यकर्ताओं के सामने आपसी रंज़िश का मुद्दा उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि बीजेपी को हराने का उनका उद्देश्य."

"वो किसी भी क़ीमत पर बीजेपी को 2014 की स्थिति में देखना नहीं चाहते और उसके लिए उन्हें इस गठबंधन में काफी संभावनाएं दिख रही हैं."

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