मुग़लकाल के गज़ट में मिलता है कुंभ मेले का पहला विवरणः नज़रिया

  • 13 जनवरी 2019
कुंभ मेला, प्रयागराज, इलाहाबाद कुंभ मेला, प्रयागराज कुंभ मेला इमेज कॉपीरइट Getty Images

संगम की रेत पर एक बार फिर कुंभ मेला सज गया है. यूं तो यह अर्ध कुंभ है, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे कुंभ कहने की घोषणा कर दी है.

यही नहीं अब पूर्ण कुंभ को महाकुंभ कहा जाएगा. दरअसल यूनेस्को ने कुंभ मेले को वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर घोषित किया तो सरकार को लगा कि इससे बेहतर ब्रैंडिंग का कोई और जरिया हो ही नहीं सकता.

आखिर बिना किसी निमंत्रण के लाखों लोग यहां पहुंचते जो हैं.

चुनावी साल में पड़े इस कुंभ मेले को केन्द्र और प्रदेश की सरकार किसी मेगा इवेंट से कम नहीं समझ रही है. यही वजह है कि पहले के कुंभ मेलों से कहीं अधिक बजट वाला मेला है यह.

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मत्स्य पुराण से नाता

मत्स्य पुराण वर्णित समुद्र मंथन की कथा के अनुसार अमृत कलश को पाने के लिए राक्षसों और देवताओं के बीच बारह बरस तक संघर्ष चला.

इस संघर्ष में भारत के चार स्थानों पर अमृत की बूंदें छलक गईं.

इन्हीं चार स्थानों यानी प्रयागराज (इलाहाबाद), हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में नदियों के तट पर हर बारह बरस पर कुंभ मेले का आयोजन होता है.

ज्योतिष मानते हैं कि कुंभ के आयोजन में वृहस्पति ग्रह की स्थिति बहुत मायने रखती है.

जब यह ग्रह मेष राशि में होता है तो प्रयाग में पूर्ण कुंभ और जब वृश्चिक राशि में होता है तो अर्ध कुंभ. इस आधार पर यह अर्ध कुंभ है.

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कुंभ का लिखित प्रमाण

महत्वपूर्ण यह भी है कि अर्ध कुंभ और कल्पवास की परम्परा केवल प्रयाग और हरिद्वार में ही है. इतिहासकारों की माने तो कुंभ मेले का पहला विवरण मुग़लकाल के 1665 में लिखे गए गज़ट खुलासातु-त-तारीख में मिलता है.

कुछ इतिहासकार इस तथ्य को विवादित करार देते हैं, वे पुराणों और वेदों का हवाला देकर कुंभ मेले को सदियों पुराना बताने से नहीं चूकते.

पुराण विशेषज्ञों की मानें तो पुराणों में कुंभ शब्द तो है, कुंभ मेले का कोई ज़िक्र ही नहीं है.

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बहरहाल इतिहासकार यह भी मानते हैं कि उन्नीसवीं शताब्दी में बारह बरस में मिलने वाले धर्माचार्यों को जब लगा कि उन्हें बीच में भी एक बार एकत्र होना चाहिए तो छह बरस पर अर्ध कुंभ की परम्परा डाल दी.

इन सारी मान्यताओं को किनारे रख उत्तर प्रदेश सरकार ने यह आदेश दिया है कि अर्ध कुंभ को कुंभ और पूर्ण कुंभ को महाकुंभ कहा जाएगा.

यह बात और है कि पिछले दिनों संगम तट पर अपने सम्बोधन में प्रधानमंत्री ने इस मेले को अर्ध कुंभ ही कहा.

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कुंभ में अखाड़े का महत्व

बहरहाल प्रयागराज के संगम तट पर कुंभ मेला शुरू होने जा रहा है. मेले के प्रमुख आकर्षण नागा माने जाने वाले सभी अखाड़े अपनी-अपनी पेशवाई करके कुंभ मेले में अपने-अपने शिविरों में पहुंच चुके हैं.

साधु, संतों और धर्माचार्यों के इन अखाड़ों के केन्द्र में नागा साधु होते हैं. माना जाता है कि सनातन धर्म की रक्षा के उद्देश्य से इन साधुओं की परम्परा शुरू हुई.

वर्षों पहले शुरू हुई अखाड़ों की इस परम्परा में पहले दस अखाड़े ही थे, लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ती गई और इस समय पन्द्रह अखाड़े अस्तित्व में हैं.

सनातन धर्म के शैव, वैष्णव व उदासीन सम्प्रदायों के अखाड़ों के अतिरिक्त सिखों का भी अपना अखाड़ा है, जो सन 1855 से ही कुंभ मेले में भाग ले रहा है.

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Image caption किन्नर अखाड़ा

परी अखाड़ा और किन्नर अखाड़ा

सबसे नए अखाड़ों में महिला साधुओं का परी अखाड़ा और ट्रांसजेंडर का किन्नर अखाड़ा शामिल हैं.

ख़बरों में रहने वाले इन दोनों अखाड़ों को बड़ी लड़ाई लड़ने के बाद कुंभ मेलों में जगह मिलनी शुरू हुई है.

परी अखाड़े को प्रयाग में 2013 में लगे कुंभ मेले में मान्यता मिल गई थी, जबकि किन्नर अखाड़े के लिए यह पहला कुंभ मेला है.

यह अखाड़ा कुंभ मेले में लोगों को अपनी ओर आकर्षित करेगा यह इसकी पेशवाई के दिन ही तय हो गया था.

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कल्पवास

इलाहाबाद यानी प्रयागराज के कुंभ मेले की सबसे बड़ी विशेषता यहां होने वाला कल्पवास है.

लाइफ़ मैनेजमेंट और टाइम मैनेजमेंट के फण्डे सिखाने वाले इस कल्पवास से जुड़ने को लाखों लोग देश भर से यहां पहुंचते हैं.

अब तो इसके आकर्षण के घेरे में बहुतेरे विदेशी भी शामिल हैं.

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सरकार और बहुत से बाबाओं के संग-संग कई अन्य संस्थाओं और संस्थानों ने कल्पवास की तरह-तरह की व्यवस्थाएं की हैं.

फूस की कुटिया से लेकर पांच सितारा होटल तक की सुविधाओं वाले कमरे तक उपलब्ध कराए जा रहे हैं.

वैसे यह तय है कि कुंभ मेले को भीड़ का पर्याय बनाने वाले धर्म और आस्था के बंधन में बंधे असल कल्पवासी हर बार हाशिए पर पड़े रह जाते हैं.

बहरहाल लाखों लोगों को अपने भीतर समा लेने की ताकत रखने वाले इस कुंभ मेले को सरकारी व्यवस्थाओं ने हड़प सा लिया है.

ऐसा लग रहा है कि हम किसी धार्मिक मेले में नहीं, बल्कि किसी प्रायोजित मेगा शो में हों. अब यह 'शो' कितना उनका हो पाएगा, जो तमाम दुश्वारियों को झेलकर भी इसे पल-पल जीने के लिए यहां आते हैं, यह तो समय ही बताएगा.

(धनंजय चोपड़ा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेन्टर ऑफ मीडिया स्टडीज के प्रभारी हैं)

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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