दिल्ली में दलित रैली: माया की तस्वीर नहीं, बसपा से बैर नहीं

  • 13 जनवरी 2019
दलित समाज की रैली

वह व्यक्ति मंच से सम्मानित होकर लौटा तो साथ वाले ने कहा, "अच्छा ये किताब मिली है."

जवाब मिला, "किताब नहीं, संविधान है यार!"

और फिर पूछने वाले ने भारतीय संविधान की उस प्रति को हाथों में लेकर माथे से लगा लिया.

मौक़ा था रविवार को नई दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई दलित समाज की एक रैली का. इस रैली का मुख्य मक़सद बीते साल दो अप्रैल को हुए 'भारत बंद' में मारे गए 13 लोगों के परिजनों और उस दौरान जेल गए लोगों को सम्मानित करना था.

मृतकों को यहां 'बहुजन समाज के शहीद' कहा गया और उनकी मूर्तियां मंच पर लगाई गईं.

एक दिन पहले ही यहां भाजपा का राष्ट्रीय अधिवेशन ख़त्म हुआ था. इस रैली के तंबू के पीछे अब भी भाजपा का टेंट और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बड़ी तस्वीरें देखी जा सकती थीं.

Image caption 2 अप्रैल के प्रदर्शन में मारे गए युवकों की मूर्तियां मंच पर लगाई गईं

बीते साल यह प्रदर्शन एससी एसटी एक्ट में बदलाव के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद दलित संगठनों की ओर से बुलाया गया था. इस प्रदर्शन में हिंसा भड़क उठी थी जिसमें अलग-अलग जगहों पर 13 लोगों की मौत हो गई थी. इसी प्रदर्शन के बाद दलितों की नाराज़गी भांपते हुए केंद्र सरकार ने एससी-एसटी एक्ट को अपने मूल स्वरूप में बहाल कर दिया था.

'बहन जी फॉर पीएम'

उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन के ऐलान के अगले दिन हुए इस कार्यक्रम में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान से लोग पहुंचे थे. इसलिए राजधानी में दलितों का यह जुटान हाल-फिलहाल की राजनीतिक घटनाओं पर उनका रुझान समझने का एक मौक़ा भी था.

रैली में कई लोग माया-अखिलेश के साथ आने से ख़ासे उत्साहित दिखे.

दिल्ली के अशोक विहार से यहां पहुंचे रोहित कनौजिया ने कहा, "ये गठबंधन यूपी में हुआ है लेकिन इसका संदेश पूरे भारत में जाएगा. पूरे भारत से एक अच्छा परिणाम आएगा और बहन जी देश की प्रधानमंत्री बनेंगी."

मायावती को पार्टी के भीतर 'बहन जी' कहा जाता है. इलाहाबाद से आए राहुल कनौजिया बीए प्रथम वर्ष के छात्र हैं. वो कहते हैं कि यहां जितने भी लोग आए हैं, वे बहन जी को प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं और सपा से गठबंधन उनकी राह आसान करेगा.

यह कार्यक्रम सत्य शोधक संघ और बहुजन यूथ फॉर मिशन 2019 ने मिलकर आयोजित किया था. आयोजकों में पहला नाम पूर्व बसपा उपाध्यक्ष जयप्रकाश का था, जिन्होंने पिछले साल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर विवादित टिप्पणी कर दी थी और मायावती ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया था.

इस आयोजन को जयप्रकाश की बसपा में वापसी की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है. हालांकि सह-आयोजक सत्यशोधक संघ से जुड़े संजीव माथुर कहते हैं, "ये जयप्रकाश जी का एजेंडा हो सकता है और हम उस एजेंडे के ख़िलाफ़ भी नहीं है. हमें उससे कोई समस्या भी नहीं है. पर ये हमारा मंतव्य नहीं है. इसके बावजूद हम मिलकर काम कर रहे हैं."

इस रैली में कहीं भी मायावती की तस्वीरें नहीं थीं, लेकिन मंच से कई वक्ताओं ने मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की इच्छा जताई. मंच से ऐसा गीत भी चला, "क्या तुम्हें पता है ऐ बहुजन, बीएसपी आने वाली है."

किसके पक्ष में, किसके विरोध में?

बदन को नीली स्याही में रंगकर लोगों का उत्साह बढ़ा रहे नौजवान के शरीर पर भी बीएसपी लिखा हुआ था. लेकिन फिर भी सत्यशोधक संघ कहना है कि वो इससे सहमत नहीं हैं.

संजीव माथुर कहते हैं, "बहुजन यूथ फॉर मिशन 2019 वाले घोषित तौर पर बसपा का समर्थन कर रहे हैं. हमारी इससे सहमति नहीं है. इसके बावजूद हम मिलकर काम कर रहे हैं. हम किसी राजनीतिक दल को फायदा नुकसान की दृष्टि से काम नहीं कर रहे. लेकिन सामाजिक प्रक्रिया होगी तो उसका कुछ न कुछ राजनीतिक प्रतिफल तो निकलेगा. उससे कौन लाभ लेता है ये हमारे नियंत्रण में नहीं है. उत्तर प्रदेश में बहुजन दल होने के नाते अगर बसपा को इसका फायदा मिलता है तो हमें इससे ऐतराज नहीं है."

उत्तर प्रदेश को भारत की सियासत में अहम माना जाता है क्योंकि वहां लोकसभा की सबसे ज़्यादा 80 सीटें हैं. कानपुर से आए अनिल कुमार से बात शुरू हुई तो उनका पहला वाक्य था, "देश में बहुजन का मूड बदल रहा है और वो अपनी ताक़त को मज़बूत कर रहा है."

जानकार मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में दलित वोटरों की संख्या क़रीब 20 फीसदी है, जिनमें से अधिकतर बसपा के पक्ष में माने जाते हैं.

लेकिन चुनावी गणितज्ञ ये बताते हैं कि 2014 के चुनाव में दलितों का एक हिस्सा टूटकर नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भाजपा के पक्ष में चला गया था.

अनिल कुमार कहते हैं, "2014 में बिल्कुल ऐसा हुआ था. लोगों ने सोचा था कि मोदी आए हैं तो बहुजन समाज के लिए कुछ करेंगे. लेकिन उन्होंने समाज का भरोसा तोड़ दिया. अब वो समाज समझ चुका है कि वो सिर्फ जुमलेबाज़ी करते हैं. उन्होंने सिर्फ बीजेपी के मनुवादियों के लिए काम किया है, अपने दफ़्तर बनाए हैं, सत्ता से लेकर नौकरियों तक यही लोग विराजमान हैं."

वह कहते हैं, "हमारे सामने ऐसा हुआ है. हमने शोषण देखा है. हम बहुत भरे-भुगते हैं और बहुत दर्द है अंदर से. इतना दर्द है कि इन मनुवादियों को आने वाले समय में बहुत ज़्यादा झेलना पड़ेगा."

सवर्ण आरक्षण का असर

हाल ही में केंद्र सरकार ने आर्थिक आधार पर सवर्णों के लिए दस फीसदी आरक्षण का ऐलान किया है. सरकार का कहना है कि संविधान संशोधन करके आरक्षण की सीमा बढ़ाई गई है ताकि किसी का कोटा कम न हो. इसलिए एक बड़ी उत्सुकता इस बात को लेकर भी है कि क्या सवर्ण आरक्षण की कोई राजनीतिक प्रतिक्रिया दलितों की ओर से भी होगी?

इलाहाबाद से आए राहुल कनौजिया कहते हैं, "सवर्ण कैसे ग़रीब हो गए. जो पांच लाख कमाता है वो अमीर है और उसे टैक्स देना पड़ रहा है और जो आठ लाख कमाता है वो ग़रीब होकर आरक्षण लेगा."

पर हापुड़ से आए राकेश जाटव इस बात से संतुष्ट हैं कि अब लोग आरक्षण का मज़ाक उड़ाना बंद कर देंगे. उन्होंने कहा, "वो लोग जो हमें आरक्षण वाला डॉक्टर और आरक्षण वाला इंजीनियर कहकर मज़ाक उड़ाते थे, अब आरक्षण की लाइन में लगे हैं. हम तो कहते हैं कि ये अच्छा है. ये मांग सबसे पहले हमारी नेता मायावती ने उठाई थी. बहुजनों के दबाव से ही सवर्णों को ये आरक्षण मिला है."

सिकंदराबाद से आए अभिषेक बौद्ध मानते हैं कि सवर्ण आरक्षण का भाजपा को नुकसान होगा. उन्होंने कहा, "यह बिल्कुल भाजपा के ख़िलाफ़ ही जाएगा. सवर्ण तो वैसे भी उन्हें ही वोट देता है. लेकिन नरेंद्र मोदी को एक समय लोगों ने पिछड़ों का नेता मान लिया था. अब उन्होंने खुलकर बता दिया है कि वो ब्राह्मणवादियों के नेता हैं."

उत्तर प्रदेश में अतीत में भाजपा के अच्छे प्रदर्शन का श्रेय सवर्ण, ग़ैर-यादव ओबीसी और कुछ दलित वोटों के समीकरण को दिया जाता रहा है. सबकी नज़रें अब इस बात पर हैं कि क्या दलित वोटर पूरी तरह भाजपा से नाता तोड़कर अपने पारंपरिक ठिकाने की ओर लौट रहा है?

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