'ऑपरेशन लोटस': कर्नाटक में बीजेपी के लिए इस बार मुश्किल क्यों?

  • 15 जनवरी 2019
एचडी कुमारास्वामी इमेज कॉपीरइट Facebook/H D Kumaraswamy

सात महीने पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री बने जनता दल सेक्यूलर के एचडी कुमारस्वामी की सरकार क्या चल पाएगी? कर्नाटक की राजनीतिक फ़िज़ा में एक बार फिर से सवाल तैरने लगा है और राजनीतिक गलियारों में क़यासबाज़ी शुरू हो गई है.

दरअसल, कांग्रेस के कुछ असंतुष्ट विधायकों के मुंबई में बीजेपी नेताओं के संपर्क में होने की ख़बर के बाद मीडिया में बीजेपी के ऑपरेशन कमल के शुरू होने की ख़बरें आने लगी हैं.

अगर असंतुष्ट कांग्रेसी विधायकों ने बीजेपी का दामन थाम लिया तो सरकार का क्या होगा? राजनीतिक गलियारों में उठ रहे इसी सवाल ने कांग्रेस-जेडीएस और बीजेपी के नेताओं के बीच ज़बानी जंग भी शुरू कर दी है.

कांग्रेस के नेताओं और मुख्यमंत्री कुमारस्वामी को औपचारिक तौर पर ये कहना पड़ा है कि उनकी सरकार को कोई ख़तरा नहीं है.

लेकिन इन अटकलों में बीजेपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने एक और पहलू जोड़ दिया है. उन्होंने बताया है कि बीजेपी के सभी 102 विधायक अगले दो दिनों तक दिल्ली में रहेंगे. स्पष्ट है कि वो अपने परिवार के साथ मकर संक्रांति का पर्व नहीं मनाएंगे.

दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए येदियुरप्पा ने कुमारस्वामी पर अपनी पार्टी के विधायकों को ख़रीदने की कोशिश करने के आरोप लगाए. उन्होंने कहा, "हम सब यहां आए हैं क्योंकि कुमारस्वामी ने ख़रीदने की कोशिशें शुरू कर दी हैं."

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Image caption कुमारस्वामी कांग्रेस के समर्थन से कर्नाटक में सरकार चला रहे हैं

कहा ये भी जा रहा है कि आगामी लोकसभा चुनावों की तैयारी के लिए कर्नाटक के सभी विधायकों को पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने दिल्ली तलब किया था क्योंकि वो स्वयं बैंगलुरू नहीं जा सके थे. ये सभी विधायक पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से रूबरू होने का इंतज़ार कर रहे हैं क्योंकि बताया ये जा रहा है कि अमित शाह बहुत व्यस्त हैं और इस वजह से वो पार्टी विधायकों को संबोधित नहीं कर सके हैं. पार्टी के एक सूत्र ने नाम न लेने की शर्त पर ये जानकारी दी है.

इसी बीच, कुमारस्वामी ने मैसूरू में पत्रकारों से बात करते हुए कहा, "मुंबई में मौजूद विधायक और दिल्ली में मौजूद बीजेपी के विधायक सभी हमारे हैं. हमारी सरकार को किसी तरह का कोई ख़तरा नहीं है, मैंने मुंबई में मौजूद विधायकों से बात की है और हमने कई मुद्दों पर चर्चा की है. वो अपनी पार्टी छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे."

ये चर्चाएं शुरू क्यों हुईं?

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Image caption दिल्ली में मौजूद कर्नाटक भाजपा के नेताओं की ये तस्वीर बीएस येदियुरप्पा ने ट्वीट की है

बीते कुछ दिनों से कांग्रेस के चार-पांच विधायक मुंबई में हैं. कहा जा रहा है कि वो बीजेपी नेताओं के संपर्क में हैं. सभी चर्चाएं यहीं से शुरू हुई हैं.

गठबंधन सरकार में बीते महीने हुए मंत्रिमंडल विस्तार में कांग्रेस के कोटे की सभी सीटें भर गईं, लेकिन कुछ कांग्रेसी विधायक मंत्री न बन पाने से नाराज़ बताए जाते हैं. दो विधायक इसलिए नाराज़ हैं क्योंकि उन्हें कथित ख़राब प्रदर्शन की वजह से मंत्री पद से हटा दिया गया था.

इनमें से एक हैं रमेश जार्कीहोली. ये एक प्रभावशाली अनुसूचित जनजाति से आते हैं और बेलगावी ज़िले में उनका परिवार राजनीतिक रूप से काफ़ी प्रभावशाली है. उनके सभी भाई या तो बीजेपी में हैं या कांग्रेस पार्टी में.

कांग्रेस ने रमेश को हटाकर उनके भाई सतीश जार्कीहोली को मंत्री पद दिया है. ग़ुस्साए रमेश कुछ दिनों के लिए भूमिगत हो गए और फिर ज़ोर-शोर के साथ अनुशासित व्यक्ति के तौर पर सामने आए.

एक कांग्रेसी सूत्र ने कहा, "उसी समय स्पष्ट हो गया था कि वो सरकार गिराने के लिए चार-पांच से ज़्यादा विधायकों का समर्थन नहीं जुटा सकेंगे. लेकिन वो फिर से कोशिश कर रहे हैं."

हालांकि ये पहली बार नहीं है जब कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं ने बीजेपी से संपर्क किया हो. कांग्रेस के एक पदाधिकारी ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर कहा, "ये छठी या सातवीं बार है जब हमारे विधायकों को रिझाने की कोशिश की गई है. अब तो हमने गिनना ही छोड़ दिया है."

इसकी जड़ में क्या है?

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Image caption कुमारस्वामी कांग्रेस के समर्थन से कर्नाटक में गठबंधन सरकार चला रहे हैं. आगामी लोकसभा चुनावों को देखते हुए इस गठबंधन को बेहद अहम माना जा रहा है.

मई में कर्नाटक विधानसभा की 224 सीटों के लिए हुए चुनावों में भाजपा ने सबसे ज़्यादा 104 सीटें हासिल की थीं लेकिन वो बहुमत का आंकड़ा नहीं छू सकी थी. कांग्रेस को 80 सीटें मिलीं थी जबकि जेडीएस के खाते में 37 सीटें आईं थीं.

राजनीतिक रूप से एक चालाक क़दम उठाते हुए कांग्रेस ने जेडीएस के कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनने का न्यौता दे दिया था. ये अलग बात थी कि दक्षिण कर्नाटक में जेडीएस और कांग्रेस ने अपने चुनावी अभियान के दौरान एक-दूसरे पर जमकर निशाना साधा था.

बीजेपी को सरकार बनाने के लिए ज़रूरी है कि कांग्रेस के कम से कम 16 या 17 विधायक पार्टी से इस्तीफ़ा देकर बीजेपी में शामिल हों. लेकिन ये होना मुश्किल था और कांग्रेस और जेडीएस की साझा सरकार बन गई.

2008 से 2013 के बीच कर्नाटक में हुआ ऑपरेशन कमल अब मुश्किल है. ऑपरेशन कमल को दल-बदल विधेयक से निबटने के लिए ही लाया गया था. इसका मतलब ये है कि कांग्रेस या जेडीएस का कोई विधानसभा सदस्य व्यक्तिगत कारणों से अपनी पार्टी से इस्तीफ़ा देता है और बाद में बीजेपी में शामिल हो जाता है.

लेकिन इस बार एक रुकावट और है. क़ानून के मुताबिक विधानसभा के अध्यक्ष का कारणों की पुष्टि करना ज़रूरी है. कांग्रेस ने बेहद अनुभवी रमेश कुमार को विधानसभा अध्यक्ष बनाया है. बीजेपी के एक सदस्य ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर कहा, "उनसे पार पाना बेहद मुश्किल काम होगा."

बीजेपी इंतज़ार करने के मूड में क्यों नहीं है?

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Image caption येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय के बड़े नेता हैं और बीजेपी को उम्मीद है कि आगामी लोकसभा चुनावों में वो इस समुदाय का वोट पार्टी के लिए बटोरने में कामयाब रहेंगे

बीजेपी के कई नेता व्यक्तिगत बातचीत में स्वीकार करते हैं कि येदियुरप्पा के समर्थक चाहते हैं कि वो जल्द से जल्द फिर से राज्य के मुख्यमंत्री पद पर बैठ जाएं.

एक बीजेपी नेता ने कहा, "उन्हें लगता है कि एक बार लोकसभा चुनाव हुए तो पार्टी येदियुरप्पा को किनारे कर देगी, नतीजे भले ही जो भी रहें."

बीजेपी के गलियारों में ये बात आम है कि एक बार लोकसभा चुनाव हुए तो येदियुरप्पा को पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में भेज दिया जाएगा क्योंकि उनकी अपने लिंगायत समुदाय के वोटरों को रिझाने की ज़रूरत ख़त्म हो जाएगी.

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बीबीसी हिंदी से कहा, "हम जानते हैं कि ये क़दम बीजेपी के लिए आत्मघाती होगा . हम स्थिति पर बेहद क़रीब से नज़र रख रहे हैं."

वहीं कांग्रेस से जुड़े सूत्रों के मुताबिक पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी अपनी पार्टी के सभी मंत्रियों की बैठक ली है और उनसे सतर्क रहने के लिए कहा है.

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