क्या आर्थिक आरक्षण का पहला 'दुष्परिणाम' होगा जाट आंदोलन?

  • 22 जनवरी 2019
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Image caption 26 मार्च 2015 को जाट नेताओं ने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से मुलाक़ात की थी

मोदी-शाह की जोड़ी के जिस क़दम को मास्टर स्ट्रोक बताया जा रहा था, वही मास्टर स्ट्रोक उनके लिए कुछ तबक़ों में मुश्किलें खड़ी करता हुआ दिख रहा है.

सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण से संकेत लेते हुए जाटों ने केंद्र की सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की मांग का झंडा फिर से बुलंद कर दिया है.

जाट कह रहे हैं, ''चूंकि प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष ने साल 2015 और फिर उत्तर प्रदेश चुनावों से पहले किया गया वायदा पूरा नहीं किया इसलिए वो 2019 आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हार सुनिश्चित करेंगे.''

पिछले हफ़्ते राजधानी दिल्ली में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और मध्य प्रदेश के जाट नेताओं का जमावड़ा हुआ जिसके बाद बिरादिरी के नेता कह रहे हैं कि बीजेपी नेताओं को जाट गांवों में घुसने नहीं दिया जाएगा.

इन जाट नेताओं के मुताबिक़ बीजेपी ने न सिर्फ़ आरक्षण पर किया गया अपना वायदा पूरा नहीं किया बल्कि इसका इस्तेमाल दूसरे समुदायों और उनमें दूरी पैदा करने के लिए किया गया है, जैसा कि हरियाणा में साल 2016 में सामने आया.

'याचना नहीं रण होगा'

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जाट आरक्षण आंदोलन से जुड़े नेता दावा कर रहे हैं कि हिंदी पट्टी, उत्तर और पश्चिम को मिलाकर 14 सूबों में उनकी ख़ासी आबादी है और कम से कम 130 सीटों पर किसी भी उम्मीदवार की हार-जीत में समुदाय के वोटों की अहम भूमिका होती है, इस बार समुदाय इसका इस्तेमाल बीजेपी के ख़िलाफ़ करेगा.

हालांकि इसके उलट बागपत में जाटों के बड़े नेता और चौधरी चरण सिंह के वारिस अजित सिंह को लोकसभा चुनावों में हराने वाले बीजेपी नेता सतपाल सिंह इन धमकियों को कुछ लोगों की सोच बताते हैं और दावा करते हैं कि अभी भी समुदाय का अधिकांश वर्ग नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में यक़ीन रखता है और 2019 आम चुनावों में भी बीजेपी के साथ खड़ा रहेगा.

पूर्व आईपीएस सतपाल सिंह कहते हैं कि जितने जाने-माने जाट नेता हैं वो बीजेपी के साथ हैं.

''याचना नहीं रण होगा, संग्राम महाभीषण होगा,'' ऑल इंडिया जाट आरक्षण बचाओ महाआंदोलन के प्रमुख संयोजक धर्मवीर चौधरी भावुक होकर बातों के बीच ये नारे लगाने लगते हैं और कहते हैं, ''जाट ख़ुद को ठगा सा महसूस कर रहा है, उसके वोट से बीजेपी ने केंद्र और फिर उत्तर प्रदेश में कुर्सी तो हासिल कर ली लेकिन उसे उसका हक़ नहीं दिया गया.''

जाट नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जिस बैठक का ज़िक्र कर रहे हैं वो 26 मार्च, 2015 को सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले के बाद हुई थी. इस फ़ैसले में अदालत ने कांग्रेस नेतृत्व वाली मनमोहन सरकार के ज़रिये जाटों को पिछड़ी जातियों की श्रेणी में केंद्र में दिए गए आरक्षण को रद्द कर दिया था.

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Image caption धर्मवीर चौधरी (सबसे दाएं के साथ अन्य जाट नेता)

उस बैठक के बाद बीजेपी नेता ओपी धनकड़ ने मीडिया से कहा था कि समुदाय ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया है कि वो अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिका दर्ज करवायें और अगर उसमें किसी तरह की दिक्क़त आती है तो विधायिका जाट आरक्षण मामले का निपटारा करे.

ओपी धनकड़ ने कहा कि प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि 'इसका जो भी रास्ता निकलेगा सरकार उसमें आगे बढ़ेगी.'

इस बैठक के बाद तत्कालीन केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय समिति भी बनाई थी लेकन जाट नेताओं के मुताबिक़ इसकी एक भी बैठक नहीं हुई.

अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के यशपाल मलिक दावा करते हैं कि बीजेपी को जाटों की याद फिर साल 2017 में उत्तर प्रदेश चुनावों के पहले आई जब अमित शाह ने समुदाय के लोगों को बैठक के लिए बुलाया और समर्थन का आग्रह किया.

जाटों के आरक्षण का मामला

2009 से कई बड़े जाट आंदोलनों का सामना कर चुकी मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने ठीक आम चुनावों से पहले 4 मार्च, 2014 को जाटों को केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में ओबीसी वर्ग के भीतर आरक्षण दे दिया था.

लेकिन इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और अदालत ने इसे 17 मार्च, 2015 को निरस्त कर दिया.

यूपीए सरकार का ये आरक्षण उन नौ सूबों के लिए लागू था जहां जाट ओबीसी सूची में शामिल हैं.

साल 1998 में राजस्थान में जाटों को दिए गए आरक्षण के बाद इस समुदाय को दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, बिहार, उत्तराखंड और हरियाणा में भी ये हक़ हासिल हो चुका था.

हरियाणा का मामला हालांकि फ़िलहाल अदालत में है.

सत्तर के दशक में बने मंडल कमीशन से बाहर रह गए जाट समुदाय के लोग कहते हैं कि निजीकरण और वैश्वीकरण की वजह से सरकारी नौकरियों में कमी आई है और शैक्षणिक रूप से पिछड़े जाटों को प्राइवेट सेक्टर में नौकरी मिलना मुश्किल है इसलिए उन्हें ओबीसी कैटेगरी में रिज़र्वेशन मिलना चाहिए.

यशपाल मलिक कहते हैं, "जिस ओबीसी लिस्ट में लागू होते वक़्त 1200 जातियां शामिल थीं उसकी संख्या अब 2453 जातियों तक पहुंच गई हैं तो फिर जाटों को उस सूची से अलग क्यों रखा जा रहा है?"

बीजेपी के जाट नेता सतपाल सिंह कहते हैं कि वो ख़ुद समुदाय को आरक्षण दिए जाने का समर्थन करते हैं लेकिन समुदाय को ये समझना होगा कि आरक्षण से ही सब मसला हल नहीं होगा और फिर सामान्य वर्ग को मिले आरक्षण से जाटों को भी तो लाभ होगा.

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वहीं यशपाल मलिक कहते हैं ये महज़ भ्रांति है और लोगों को ये समझना होगा कि जब कई राज्यों में जाट ओबीसी सूची में शामिल हैं तो वो सामान्य वर्ग में आरक्षण के लिए क़ाग़जात कैसे हासिल करेंगे.

प्रधानमंत्री के साथ दिल्ली में 2015 में हुई बैठक में शामिल हुए जाट समुदाय के एक गणमान्य व्यक्ति ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि आरक्षण पर दिए गए आश्वासन की पूर्ति न होने और हरियाणा जाट आरक्षण आंदोलन के समय सूबे की सरकार के उठाए क़दम का समुदाय में बहुत ही नकारात्मक संदेश गया है और इस वजह से बीजेपी के ख़िलाफ़ एक तरह का मन बन गया है.

जाटों और बीजेपी में दूरी

हालांकि समुदाय ने मोदी-शाह के ख़िलाफ़ खुलकर हुंकार अब भरी है लेकिन जाटों और बीजेपी के बीच दूरियां मुज़फ़्फ़रनगर-शामली दंगों में जाटों पर हुई कार्रवाइयों से ही धीरे-धीरे शुरू हो गई थीं. जिसे 2016 हरियाणा जाट आरक्षण आंदोलन ने और बढ़ा दिया, सामान्य वर्ग को दिए गए आरक्षण ने इन दूरियों को लंबे फ़ासलों में बदलने का काम कर दिया है.

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साल 2014 विधानसभा चुनावों के बाद हरियाणा में बीजेपी की जो सरकार बनी उसमें सूबे के मुख्यमंत्री पद पर लगातार बने रहनेवाले जाटों ने पाया कि सबसे ऊंचे पद पर अब वो नहीं बल्कि एक पंजाबी खत्री बैठा है.

फिर आया साल 2016 का हरियाणा जाट आरक्षण आंदोलन जिसमें 20 से अधिक जाट युवक पुलिस की गोली के शिकार हो गए. इस आंदोलन में शामिल सैकड़ों युवक अभी भी जेल की हवा खा रहे हैं. इन घटनाओं के बाद जाटों का बीजेपी से मोह भंग हो चुका था.

यशपाल मलिक तो सूबे में भड़की हिंसा को हुकूमत की मिलीभगत का नतीजा बताते हैं. उनके मुताबिक़ यह इसलिए ज़रूरी था क्योंकि हरियाणा में मुसलमान तो रहते नहीं हैं इसलिए दूसरे समुदाय के लोगों को बांटने का काम बीजेपी ने इस तरह से किया.

जाटों की तरफ़ से हरियाणा में जारी 'भाईचारा संदेश यात्रा' के संदर्भ में जो पर्चे बांटे जा रहे हैं उनमें साफ़ तौर पर कहा जा रहा है कि 'सरकार जाटों के ख़िलाफ़ दूसरे समुदायों को लामबंद कर नफ़रत पैदा करा कर जाट-ग़ैर जाट की खाई खड़ी कर राजनीतिक फ़ायदा' लेना चाहती है.

सवाल-जवाब की शक्ल में छापे गए पर्चे में कैप्टन अभिमन्यु का भी ज़िक्र है, जो ख़ुद जाट नेता हैं और खट्टर सरकार में मंत्री भी हैं. कैप्टन अभिमन्यु के घर में 2016 आरक्षण आंदोलन के दौरान लगी आग का ज़िक्र करते हुए कहा गया है कि इसमें कई जाट युवा जेलों में बंद हैं और उन्हें राजनीतिक फ़ायदे के लिए नहीं छोड़ा जा रहा है.

इस सिलसिले में बीबीसी ने कैप्टन अभिमन्यु से संपर्क करने की कई कोशिशें कीं लेकिन उनके स्टाफ़ के तमाम आश्वासन के बाद भी उनसे बात संभव नहीं हो पाई.

धर्मवीर चौधरी कहते हैं कि ये एक राजनीतिक आंदोलन था और इसके भीतर जो भी केस हुए थे उसे सरकार को वापिस लेना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ नहीं और आज भी जाटों के 200 से अधिक युवकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई जारी है.

उधर, उत्तर प्रदेश के मुज़फ्फ़रनगर-शामली जाट-मुस्लिम दंगों में जिन जाटों के ख़िलाफ़ पुलिस केस दर्ज हुए थे वो तमाम वायदों के बाद भी अबतक ख़त्म नहीं हुए हैं.

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लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र जाट उत्तर प्रदेश में 'जाट संदेश यात्रा' निकाल रहे हैं. जाट नेताओं के शब्दों में इस यात्रा का मक़सद जाट, मुस्लिम और दलितों को साथ लाना है.

राजस्थान के जाट नेता हनुमान बेनीवाल कहते हैं कि बीजेपी ने जो भी वायदा किया था उसमें से वो कोई भी पूरा नहीं कर पाई है इसलिए जाटों का मन उनके ख़िलाफ़ बन चुका है.

हनुमाल बेनीवाल कहते हैं कि जाट समुदाय कृषि से बहुत बड़े पैमाने पर जुड़ा है और वहां बीजेपी सरकार पूरी तरह नाकाम रही है.

बेनीवाल के राजनीतिक दल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने हाल के राजस्थान विधानसभा में तीन सीटें जीती हैं.

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