राज ठाकरे को मिलेगा शरद पवार का साथ या राहुल गांधी का हाथ?

  • 23 जनवरी 2019
राज ठाकरे

साल 2011 में गुजरात दौरे के समय महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे नरेंद्र मोदी के मेहमान थे. राज ठाकरे ने उस वक़्त कहा था कि मोदी को देश का नेतृत्व करने पर विचार करना चाहिए.

बाल ठाकरे की छत्रछाया में राजनीति का ककहरा सीखने वाले राज ठाकरे यूं तो खुद को हिंदुत्व की राजनीति के झंडाबरदार के तौर पर पेश करते रहे हैं लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में चीज़ें तेज़ी से बदल रही हैं.

माना जा रहा है कि राज ठाकरे लोकसभा चुनाव 2019 में शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी या राहुल गांधी की कांग्रेस में से किसी एक से तालमेल कर सकते हैं.

कांग्रेस इन चुनावों के लिए राज्यों में साझीदार खोज रही है और महाराष्ट्र के सियासी हलकों में ये चर्चा है कि पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी राज ठाकरे से हाथ मिला सकते हैं.

सभी पार्टियों ने लोकसभा चुनावों की तैयारियां शुरू कर दी हैं और 19 जनवरी को कोलकाता में ममता बनर्जी की रैली में विपक्षी पार्टियों के बीच एकजुटता की एक झलक देखने को मिली.

कुछ ऐसा ही महाराष्ट्र में भी हो सकता है जहां कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गठबंधन से राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना भी जुड़ सकती है.

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गठबंधन पर चुप्पी

मनसे की भूमिका जानने के लिए हमने पार्टी प्रवक्ता संदीप देशपांडे से यही सवाल पूछा.

उन्होंने कहा, "अभी तक हमें कांग्रेस या एनसीपी की तरफ़ से कोई प्रस्ताव नहीं मिला है. अगर ऐसा कोई प्रस्ताव मिलता है तो राज ठाकरे उस पर ज़रूर विचार करेंगे."

चर्चा है कि अगर इस तरह की बातचीत सफल हुई तो मनसे पूर्वोत्तर मुंबई और नाशिक की लोकसभा सीटों की शर्त रखेगी.

इस पर देशपांडे कहते हैं, "पूर्वोत्तर मुंबई और नाशिक लोकसभा सीटों को लेकर चल रही बातें हमने मीडिया के जरिए सुनी हैं. इस पर हम फिलहाल कुछ नहीं कह सकते."

यहां इस बात पर गौर करना दिलचस्प है कि मनसे प्रवक्ता संदीप देशपांडे ने किसी भी संभावना से इनकार नहीं किया.

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कांग्रेस का रुख क्या है?

राज ठाकरे ने कांग्रेस के भारत बंद के आह्वान को समर्थन दिया था. दूसरी तरफ़ राज ठाकरे अपने कार्टूनों के ज़रिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी की राजनीति पर तंज कसते आए हैं.

इसमें उनका कांग्रेस के लिए सॉफ़्ट कॉर्नर दिखाई देता है. कुछ दिनों पहले एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में राज ठाकरे ने कहा था कि राहुल गांधी अब 'पप्पू नहीं रहे.'

पिछले दिनों राज ठाकरे के अपने बेटे अमित ठाकरे की शादी के रिसेप्शन पर राहुल गांधी को निमंत्रण भेजने की ख़बर के बाद से ही मनसे और कांग्रेस के संभावित तालमेल की ख़बरों ने जोर पकड़ा.

इस गठबंधन के बारे में हमने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चह्वाण से पूछा.

उन्होंने कहा, "कांग्रेस और एनसीपी के बीच सीटों के तालमेल को लेकर समझदारी है. अगर ज़रूरत पड़ेगी तो दोनों पार्टियां तीसरे पक्ष के लिए गुंजाइश बना सकती हैं. हमने प्रकाश आंबेडकर को भी अपने साथ आने का प्रस्ताव दिया है. रहा सवाल एनसीपी का तो वो किसान नेता राजू शेट्टी के लिए जगह बना सकते हैं. लेकिन मनसे को लेकर अभी तक प्रस्ताव हमारे पास आया नहीं है. पर अगर ऐसा हुआ तो हम इस पर ज़रूर चर्चा करेंगे."

Image caption पृथ्वीराज चह्वाण

राज ठाकरे के बेटे की शादी के निमंत्रण के बारे में पूछने पर पृथ्वीराज चह्वाण ने कहा, "पारिवारिक समारोह, चाहे सुख की घड़ी में हो या दुख की... लोग एक दूसरे से मिलते-जुलते रहते हैं. इसे राजनीतिक चश्मे से नहीं देखना चाहिए."

कांग्रेस में अब तक मनसे को साथ लेने में हिचकिचाहट थी. इसकी वजह मुंबई में रहने वाले यूपी और बिहार के लोगों के प्रति मनसे का रवैया था. उनके साथ मनसे के लोगों के विवाद और मारपीट की ख़बरें आम रही हैं.

इस मुद्दे पर बदली रणनीति के तहत राज ठाकरे उत्तर भारतीय लोगों के मंच पर गए. वहां उन्होंने ये समझाया कि दूसरे प्रांत से आने वालों के साथ झगड़ा क्यों होता है. उन्होंने कहा कि यूपी और बिहार के नेता विकास नहीं करते हैं, इस वजह से वहां के लोगों को मुंबई आना पड़ता है.

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राज ठाकरे के सामने विकल्प क्या?

महाराष्ट्र की राजनीति पर लंबे समय से नज़र रखते आ रहे वरिष्ठ पत्रकार अभय देशपांडे कहते हैं, "मनसे का कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं हो सकता है लेकिन वे एनसीपी के साथ जा सकते हैं. नाशिक और पूर्वोत्तर मुबंई में मनसे के समर्थकों की संख्या ठीक ठाक है. लेकिन कांग्रेस इस पर कैसी प्रतिक्रिया देगी, इसे लेकर अभी तस्वीर साफ़ नहीं है."

वो कहते हैं, "राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ जाकर अगर मनसे दो ही सीटों पर चुनाव लड़ेगी तो कांग्रेस कुछ नहीं कर सकती है. लेकिन उन्हीं दो जगहों पर मनसे ने अग़र कांग्रेस के ख़िलाफ़ उम्मीदवार खड़े किए तो कांग्रेस चुप नहीं रहेगी. इसके कारण एनसीपी और मनसे में औपचारिक गठबंधन तो नहीं बल्कि रणनीतिक तालमेल हो सकता है."

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दूसरी ओर नाशिक की सीट के लिए एनसीपी नेता छगन भुजबल का नाम चल रहा है. अगर उन्हें उम्मीदवारी मिली तो एनसीपी को समर्थन देने का संकेत प्रकाश आंबेडकर दे चुके हैं.

इस राजनीतिक घटनाक्रम पर अभय देशपांडे कहते हैं, "ओबीसी लीडर के तौर पर एनसीपी छगन भुजबल को प्रोजेक्ट करेगी और इसके लिए उन्हें भुजबल को उम्मीदवार बनाना होगा. एनसीपी के लिए ये लोकसभा चुनाव महत्वपूर्ण है. उन्होंने ये निर्णय काफी गंभीरता से लिया है. इसी वजह से एनसीपी कुछ पूर्व मंत्रियों को लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाने की तैयारी कर रही है. फिर भी मनसे और एनसीपी के बीच समझौता हुआ तो भुजबल को दूसरी बड़ी ज़िम्मेदारी दी जा सकती है."

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बाल ठाकरे की राह चलेंगे राज?

नाशिक की तुलना में मुंबई की सीट मनसे के लिए छोड़ना एनसीपी के लिए ज़्यादा आसान है क्योंकि एनसीपी मुंबई में अपनी जड़ें स्थापित करने में पूरी तरह से कभी कामयाब नहीं हो पाई.

इसी कारण मुंबई सीट मनसे को देकर एनसीपी उसका फ़ायदा नाशिक में ले सकती है.

इसके साथ ही अभय देशपांडे एक तीसरी संभावना की तरफ़ इशारा करते हैं, "आपातकाल के बाद साल 1978 के चुनाव में बाला साहेब ठाकरे ने खुद चुनाव न लड़कर कांग्रेस को सपोर्ट किया था. उन्होंने उस वक्त आपातकाल का भी समर्थन किया था. मौजूदा सरकार में जिस आपातकाल के आरोप सत्ता पक्ष के ख़िलाफ़ लगते रहे हैं, अब राज ठाकरे उसी इमर्जेंसी के ख़िलाफ़ कांग्रेस को सपोर्ट कर सकते हैं."

एक सूरत ये भी है कि मनसे के सभी समीकरण बीजेपी-शिवसेना के गठबंधन के अनुसार तय होंगे. आने वाले चुनाव में बीजेपी-शिवसेना के संबंध कैसे होंगे, जब तक ये तस्वीर साफ़ नहीं हो जाती, मनसे कोई फ़ैसला लेने के लिए तब तक इंतज़ार करेगी.

लेकिन एनसीपी के प्रवक्ता नवाब मलिक इस संभावना से इनक़ार करते हैं.

वे कहते हैं, "इस तरह की चर्चा में कोई तथ्य नहीं है. कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन में ये निर्णय हो चुका है कि मनसे को हम साथ नहीं लेंगे. इसके कारण मनसे को साथ लेने का कोई सवाल नहीं पैदा होता."

दूसरी तरफ़ एनसीपी के महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल ने बीबीसी से कहा, "हमें साल 2019 के चुनाव में दोस्तों की ज़रूरत है पर ये दोस्ती समान विचारों वाली पार्टियों के बीच होनी चाहिए. मनसे और एनसीपी के बीच वैचारिक मतभेद हैं. इसी के कारण हमें नहीं लगता कि मनसे से हमें गठजोड़ करना चाहिए और ऐसे किसी गठबंधन के बारे में कोई चर्चा तक नहीं है."

राज ठाकरे अगर कांग्रेस और एनसीपी के साथ जाते हैं तो शिवसेना के मुंबई में मराठा जनाधार को धक्का पहुंच सकता है.

इसके बारे में शिवसेना के प्रवक्ता नीलम गोरे कहती हैं, "पहले कांग्रेस-एनसीपी-मनसे के गठबंधन की औपचारिक घोषणा होने दीजिए. हम इसके बाद ही कोई प्रतिक्रिया दे पाएंगे. इसके पहले मनसे हर किसी के साथ गठबंधन करने की कोशिश कर चुकी है. अब वो एनसीपी के साथ जाने की कोशिश कर रही है. देखते हैं कि आगे क्या होता है."

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