मोदी राज में क्या बड़े चरमपंथी हमले नहीं हुए?

  • 23 जनवरी 2019

दावाः 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद से भारत ने एक भी बड़े 'आतंकवादी' हमले नहीं देखे हैं.

हकीकतः आधिकारिक और स्वतंत्र आंकड़ें बताते हैं कि 2014 के बाद से देश के भीतर कई चरमपंथी समूहों ने घातक हमलों को अंजाम दिया है. सरकारी दस्तावेज खुद इनमें से कम से कम दो को "बड़ा हमला" मानती है.

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हाल ही में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह दावा किया था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से देश ने कोई भी बड़े 'आतंकवादी' हमले नहीं देखे हैं.

उन्होंने कहा था, "2014 के बाद से भारत में कोई भी बड़ा आतंकवादी हमला नहीं हुआ. सीमा पर निश्चित रूप से कुछ गड़बड़ियां ज़रूर हुई हैं, लेकिन भारतीय सेना ने उनके अंदर आने की कोशिशों को सीमा पर ही ख़त्म कर दिया."

मंत्री के इस बयान पर काफ़ी विवाद हुआ और बहस इस बात पर छिड़ गई कि आख़िर "बड़े" आतंकवादी हमले की परिभाषा क्या होती है.

उनके इस बयान की काट में चरमपंथी हमलों की संख्या भी गिनाई जाने लगी.

कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने ट्विटर पर मंत्री के इस बयान के ख़िलाफ़ हल्ला बोला.

उन्होंने ट्वीट किया, "क्या रक्षा मंत्री भारत का नक्शा लेकर बता सकती हैं कि पठानकोट और उड़ी कहां हैं."

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चिदंबरम उन दो हमलों की ओर इशारा कर रहे थे, जिन्हें साल 2016 में अंजाम दिया गया था और जिनमें सेना के ठिकानों को निशाना बनाया गया था.

  • जनवरी, 2016 में पठानकोट स्थित सेना के ठिकानों पर चरमपंथी हमले हुए थे, जिसमें सेना के सात जवान और छह चरमपंथी मारे गए थे. भारत ने इसके लिए पाकिस्तान से जुड़े समूहों को जिम्मेदार ठहराया था. पठानकोट एयरबेस उत्तर भारत की सबसे बड़े एयरबेस में से एक है और भारतीय सेना दुनिया में तीसरी बड़ी सेना मानी जाती है.
  • सितंबर, 2016 में ही चार बंदूकधारियों ने भारत प्रशासित कश्मीर के उड़ी में सेना के ठिकानों पर हमला बोला था, जिसमें 17 सैनिक मारे गए थे.

सरकारी आंकड़ें

भारत का रक्षा मंत्रालय आंतरिक सुरक्षा के मुद्दों को चार श्रेणियों में बांटता है.

  1. भारत प्रशासित कश्मीर में घटी घटनाएं
  2. उत्तर-पूर्वी राज्यों में बगावत की घटनाएं
  3. नक्सल प्रभावित इलाकों की घटनाएं
  4. देश के अंदर के इलाक़ों में चरमपंथी घटनाएं
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गृह मंत्रालय की ओर से संसद में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2015 और 2016 में एक-एक बड़े चरमपंथी हमले हुए थे. ये दोनों हमले देश के अंदर के इलाक़ों में हुए थे.

पेश किए गए आंकड़ों में सभी चार श्रेणी की घटनाओं की संख्या के बारे में बताया गया है, लेकिन अंदर के इलाक़ों के हुए हमले को "बड़ा हमला" बताया गया है.

बड़े हमले क्या होते हैं?

रक्षा विशेषज्ञ अजय शुक्ला बताते हैं, "ऐसी कोई नीति या फिर दस्तावेज़ नहीं है, जो यह परिभाषित कर सके कि कौन सा हमला बड़ा था या मामूली."

"यह पूरी तरह धारणा की बात है."

"यह कई चीजों पर निर्भर करता है, जैसे कि हमले का उद्देश्य क्या था, कहां से इसे अंजाम दिया गया था, हमले से क्या हानि हुई और क्या संदेश देने की कोशिश हुई है."

बीबीसी ने भारत सरकार से उसके दस्तावेजों में जिक्र किए गए "बड़े हमले" के बारे में विस्तार से पूछा है, लेकिन ख़बर लिखे जाने तक सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली थी.

एक गैर सरकारी समूह 'साउथ एशिया टेरेरिज्म पोर्टल' चरमपंथी हमलों को अपनी तरह से परिभाषित करता है.

उसके मुताबिक अगर किसी हमले में तीन या उससे अधिक सैनिक या चरमपंथी मारे जाते हैं तो उसे बड़ा हमला माना जाएगा.

इस परिभाषा के हिसाब से साल 2014 से 2018 तक भारत में 388 "बड़े" हमलों को अंजाम दिया जा चुका है.

पोर्टल ने सरकार के आंकड़ों और मीडिया रिपोर्ट्स की मदद से ये विश्लेषण तैयार किया है.

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घटनाएं बढ़ीं या घटीं?

अब सवाल यह उठता है कि वर्तमान सरकार के दौरान बड़े चरमपंथी हमलों की संख्या बढ़ी या घटी है?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ 2009 से 2013 के बीच जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, देश के "अंदरूनी इलाक़ों में कुल 15 बड़े चरमपंथी हमलों" को अंजाम दिया गया था.

यह संख्या वर्तमान सरकार में हुई घटनाओं के मुकाबले काफी अधिक है.

अगर भारत प्रशासित कश्मीर की बात करें तो 2009 से 2014 के बीच यहां घटी घटनाओं का ग्राफ गिरा था, वहीं वर्तमान सरकार के दौरान यह ग्राफ चढ़ता नजर आ रहा है.

साउथ एशिया टेरेरिज्म पोर्टल के अजय साहनी के मुताबिक बीते एक दशक में साल 2018 में भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथ से जुड़ी हिंसा में सबसे ज़्यादा 451 मौतें हुई थीं.

आख़िरी बार यह संख्या 2008 में पार हुई थी जब कांग्रेस सत्ता में थी.

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक देश के उत्तर-पूर्वी भाग में साल 2012 के अलावा अन्य सालों में कम से कम हिंसक घटनाएं रिपोर्ट की गईं.

साल 2015 के बाद आम लोगों की मौत के ग्राफ में गिरावट देखने को मिली है.

पूर्वोत्तर भारत में दशकों से अलगाववादी संगठन सक्रिय हैं, जो स्थानीय स्वायत्तता और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करते रहे हैं.

जब देश में वामपंथी विद्रोही समूहों की बात आती है, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की तुलना कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार से करते हैं.

जुलाई, 2018 में मोदी ने स्वराज मैगजीन से कहा था, "2013 के मुकाबले 2017 में नक्सल प्रभावित राज्यों होने वाली हिंसा में 20 फ़ीसदी की कमी आई है और मौतों की संख्या 34 फ़ीसदी तक घटी है."

मोदी का यह आंकड़ा आधिकारिक आंकड़ों से मेल खाता है. गृह मंत्रालय की अपनी रिपोर्ट बताती है कि आंकड़ों में गिरावट साल 2011 से शुरू हुई थी और इस दौरान देश में कांग्रेस की सरकार थी.

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