लोकसभा चुनाव 2019 कब होंगे

  • 23 जनवरी 2019
वोटिंग

अख़बारों, टीवी और नुक्कड़ की बातचीत में अब लोकसभा चुनाव की आहट सुनाई देने लगी है. नेताओं की रैलियाँ बढ़ गई हैं और साथ ही आरोप-प्रत्यारोप भी. मगर ये चुनाव हैं कब?

लोकसभा चुनाव की तारीख़ों का ऐलान चुनाव आयोग अमूमन मार्च के पहले हफ्ते में करता है. तारीख़ों को लेकर जारी अटकलों के बीच समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ इस बार भी मार्च के पहले हफ्ते में चुनाव की तारीख़ों का ऐलान हो सकता है.

इस बात की संभावना है कि आम चुनाव के साथ ही आंध्र प्रदेश, ओडिशा, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में विधानसभाओं के चुनाव कराए जाएँगे. जम्मू-कश्मीर की विधानसभा पिछले साल नवंबर में भंग हो चुकी है और नियमों के हिसाब से 6 महीने के अंदर विधानसभा चुनाव करवाने होंगे. इस बात की संभावना भी जताई जा रही है कि आम चुनाव से पहले या उनके साथ ही जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हों.

पिछले यानी 2014 के लोकसभा चुनाव का ऐलान पाँच मार्च 2014 को किया गया था. मतदान 16 अप्रैल को शुरू होकर 5 चरणों में 13 मई को ख़त्म हुए थे. 16 मई को नतीजों में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत हासिल हुआ था और दूसरे सहयोगी दलों के साथ एनडीए की सरकार बनी. भाजपा को इन चुनाव में 282 सीटें मिली थीं.

चुनाव आयोग अपनी उम्मीदवारी वापस लेने की तारीख भी तय करता है. उम्मीदवारी वापस लेने की तारीख़ और वोटिंग की तारीख़ के बीच कम से कम 14 दिन राजनीतिक दलों को प्रचार के लिए दिए जाते हैं.

इसके अलावा चुनाव का एलान होने और नामांकन भरने के बीच 7 दिन का समय रखा जाता है.

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लोकसभा में कितनी सीटें हैं?

संविधान के मुताबिक़ लोकसभा सीटों की अधिकतम संख्या 552 हो सकती है. फ़िलहाल लोकसभा सीटों की संख्या 545 है, जिनमें से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 543 सीटों के लिए आम चुनाव होते हैं. इनके अलावा अगर राष्ट्रपति को लगता है कि एंग्लो-इंडियन समुदाय के लोगों का लोकसभा में प्रतिनिधित्व काफ़ी नहीं है तो वह दो लोगों को नामांकित भी कर सकते हैं.

कुल सीटों में से 131 लोकसभा सीटें रिज़र्व होती हैं. इन 131 में अनुसूचित जाति के लिए 84 और अनुसूचित जनजाति के लिए 47 सीटें रिज़र्व हैं. यानी इन सीटों पर कोई अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार ही चुनाव लड़ सकते हैं.

किसी भी पार्टी को बहुमत के लिए कम से कम 272 सीटें चाहिए होती हैं. अगर बहुमत से कुछ सीटें कम भी पड़ जाएं तो दूसरे दलों के साथ गठबंधन करके भी सरकार बनाई जा सकती है. राजनीतिक दलों का गठबंधन चुनाव से पहले भी हो सकता है और नतीजों के बाद भी. लोकसभा में विपक्ष के नेता का पद लेने के लिए विपक्षी पार्टी के पास कम से कम कुल सीटों की 10 फ़ीसदी संख्या होनी चाहिए यानी 55 सीटें. 2014 के आम चुनाव में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को सिर्फ़ 44 सीटें ही मिल पाई थीं.

भाजपा ने 2014 में 282 सीटों के साथ बहुमत तो पाया था लेकिन फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के 268 सदस्य ही लोकसभा में रह गए हैं. कुछ सीटों को बीजेपी ने उपचुनाव में गंवा दिया. पार्टी के कुछ लोकसभा सदस्यों ने जैसे बीएस येदियुरप्पा और बी श्रीरामुल्लू ने विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए लोकसभा से इस्तीफ़ा दे दिया था. लेकिन फिर भी गठबंधन वाले राजनीतिक दलों के सहयोग से बीजेपी की सरकार सुरक्षित है.

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भारतीय चुनाव प्रक्रिया किस मॉडल पर आधारित है?

भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था ब्रितानी वेस्टमिन्स्टर मॉडल पर आधारित है. ब्रिटेन में आम चुनाव के लिए एक ही दिन मतदान होता है, शाम होते-होते एग्ज़िट पोल आ जाते हैं और रातों-रात मतगणना करके अगली सुबह तक लोगों को चुनाव नतीजे भी मिल जाते हैं.

मगर भारत में ऐसा नहीं होता है. मतदान के दौरान सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए इतने बड़े देश में कई चरणों में मतदान कराए जाते हैं. हर चरण के मतदान के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम को मतगणना तक सुरक्षित रखा जाता है.

चुनाव आयोग के निर्देशानुसार अब अंतिम चरण का मतदान समाप्त होने के बाद ही एग्ज़िट पोल प्रसारित हो सकते हैं. उसके भी कुछ दिन बाद मतगणना सुबह से शुरू होती है.

पहले जब मतपत्रों से चुनाव होते थे तब रुझान आने में शाम हो जाती थी और नतीजे साफ़ होते-होते काफ़ी वक़्त लगता था मगर अब ईवीएम के चलते दोपहर तक रुझान स्पष्ट हो जाते हैं और शाम तक नतीजे भी लगभग पता चल जाते हैं.

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