कल्लूरी की नियुक्ति पर विरोध तेज़, जांच कमेटी की मांग

  • 23 जनवरी 2019
आईपीएस अधिकारी शिवराम प्रसाद कल्लूरी

छत्तीसगढ़ के आईपीएस अधिकारी शिवराम प्रसाद कल्लूरी को एंटी करप्शन ब्यूरो और इकनॉमिक ऑफेंस विंग का आईजी नियुक्त किए जाने के बाद शुरू हुआ विरोध कम होता नज़र नहीं आ रहा है.

राज्य में मानवाधिकार संगठन पहले से ही इस फ़ैसले का विरोध करते रहे हैं. अब देश के कई सेवानिवृत्त आईएएस-आईपीएस अधिकारी, वकील, शिक्षाविद् और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनकी नियुक्ति के ख़िलाफ़ एक बयान जारी कर राज्य सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है.

सौ से अधिक लोगों ने एक बयान जारी कर सरकार से इस फ़ैसले को वापस लेने की मांग की है.

इस बयान में मांग की गई है कि उत्तर और दक्षिण छत्तीसगढ़ में नियुक्ति के दौरान आईपीएस अधिकारी शिवराम प्रसाद कल्लूरी के ख़िलाफ़ आपराधिक आरोप की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज के नेतृत्व में एक विशेष कमेटी गठित की जाए.

बयान में कहा गया है कि जांच कमेटी की रिपोर्ट आने तक कल्लूरी को निलंबित रखा जाए.

Image caption भूपेश बघेल भी कल्लूरी को गिरफ़्तार करने की मांग करते थे. यह कार्टून कांग्रेस की ओर से शेयर किया गया था.

बयान जारी करने वालों में शामिल पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव रहे अर्द्धेंदु सेन ने बीबीसी से कहा, "कल्लूरी के ख़िलाफ़ गंभीर आरोप हैं और उनके बस्तर में रहते माओवादियों के ख़िलाफ़ पुलिस के ऑपरेशन को भी नुकसान पहुंचा है. ऐसे में उन्हें इतनी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी सौंपा जाना ठीक नहीं है."

सेन ने कहा कि सरकार अगर यह तर्क दे रही है कि उन्हें माओवादी ऑपरेशन की ज़िम्मेदारी नहीं दी गई है तो भी सरकार के इस क़दम को नाकाफ़ी माना जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, "कल्लूरी के ख़िलाफ़ जितनी शिकायतें हैं, सरकार को गंभीरता से उन तमाम शिकायतों की आधिकारिक जांच करनी चाहिए और इस मामले में कार्रवाई करनी चाहिए."

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बयान जारी करने वालों में अर्द्धेंदु सेन के अलावा सेवानिवृत्त आईएएस अमिताभ पांडे, जी बालागोपाल, एमजी देवास्याम, वी रामानी, सी बालाकृष्णन, सुंदर बुर्रा, केशव देसीराजू, जे हरिनारायण, सुमंत्र गुहा, अरुण कुमार, सेवानिवृत्त आईपीएस डॉ. केएस सुब्रमण्यम शामिल हैं.

इस संबंध में बीबीसी ने राज्य के गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू और पुलिस महानिदेशक डीएम अवस्थी से भी संपर्क कर उनकी राय लेने की कोशिश की लेकिन हमें उनका पक्ष नहीं मिल सका.

फ़ैसले के ख़िलाफ़ अनशन

इधर छत्तीसगढ़ में पत्रकार और सुरक्षा क़ानून बनाने के लिए आंदोलन चलाने वाले बस्तर के पत्रकार कमल शुक्ला ने शिवराम प्रसाद कल्लूरी को हटाए जाने की मांग को लेकर राजधानी रायपुर में मंगलवार से आमरण अनशन शुरू कर दिया, लेकिन बुधवार को सरकार के प्रतिनिधियों से चर्चा के बाद उन्होंने अपना अनशन स्थगित कर दिया.

उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने आदिवासियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को प्रताड़ित करने की गंभीर शिकायतों के बाद कल्लूरी को बस्तर से हटा कर पुलिस मुख्यालय में अटैच कर दिया था. उनकी गिरफ़्तारी की मांग करने वाली कांग्रेस जब सत्ता में आई तो कल्लूरी को इतने महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिए गए हैं. इस फ़ैसले को समझ पाना मुश्किल हो रहा है."

कमल शुक्ला ने आरोप लगाया कि बस्तर में फिर से कल्लूरी के मातहत काम करने वाले उन्हीं अफ़सरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी गई है, जिन पर गंभीर आरोप रहे हैं.

शुक्ला ने कहा, ''सुरक्षाबलों के कारण बस्तर के अंदरुनी इलाकों में अभी भी पत्रकारों का प्रवेश संभव नहीं है.''

उन्होंने कहा, "शिवराम प्रसाद कल्लूरी को ऐसी ज़िम्मेदारी सौंपी गई है जिससे वो और ताक़तवर हो गए हैं. वे राज्य के तमाम नौकरशाह, राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकारों पर बदले की भावना से कार्रवाई कर सकते हैं. ऐसे में उन्हें तत्काल पद से हटाया जाना ज़रूरी है."

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देश में कई महत्वपूर्ण अख़बारों के संपादक रहे रमेश नैयर का कहना है कि अव्वल तो शिवराम कल्लूरी को इस तरह का कोई पद नहीं दिया जाना चाहिए था. लेकिन अब जब उन्हें ज़िम्मेदारी दे दी गई हैं तो उन्हें काम करने का अवसर दिया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा-" यह सही है कि शिवराम प्रसाद कल्लूरी के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों की जाँच होनी ही चाहिए. लेकिन सरकार को चाहिये कि वह पत्रकारों से जुड़े मुद्दों पर भी गंभीर हो."

क्यों है कल्लूरी को लेकर विवाद

शिवराम प्रसाद कल्लूरी बस्तर में आईजी के पद पर तैनात थे. फ़रवरी 2017 में फ़र्ज़ी मुठभेड़ , आत्मसमर्पण और मानवाधिकार हनन की कई गंभीर शिकायतों के बाद उन्हें बस्तर से हटाया गया था.

उनको पुलिस मुख्यालय में तैनात किया गया था लेकिन राज्य की भाजपा सरकार ने उन्हें लंबे समय तक कोई ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी.

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1994 बैच के आईपीएस अधिकारी शिवराम प्रसाद कल्लूरी सरगुजा में अपनी तैनाती के दौरान माओवादियों के ख़िलाफ़ अभियान चलाने के बाद चर्चा में आए. कई माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया तो कई मुठभेड़ में मारे गए.

हालांकि सरगुजा में रहते हुए उन पर फर्ज़ी मुठभेड़ और बलात्कार के आरोप भी लगे. उन्होंने सरगुजा को कथित रूप से माओवादियों से मुक्त करने का भी दावा किया.

शिवराम प्रसाद कल्लूरी को 2006 में भारत सरकार ने वीरता के लिए पुलिस मेडल से नवाजा.

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माओवादियों के ख़िलाफ़ आक्रामक रणनीति के कारण उन्हें राज्य की भाजपा सरकार ने नक्सल ऑपरेशन का डीआईजी बना कर दंतेवाड़ा भेजा था. यहां भी उन्होंने माओवादी मोर्चे पर कई सफलता हासिल की.

लेकिन 6 अप्रैल 2010 को माओवादियों ने हमला बोल कर ताड़मेटला में सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्या कर दी. माओवादी हिंसा के इतिहास में सुरक्षाबलों पर हुए अब तक के सबसे बड़े माओवादी हमले को लेकर कल्लूरी की आलोचना भी हुई.

Image caption प्रतीकात्मक तस्वीर

इसी दौरान ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुरम में सुरक्षाबलों की ओर से तीन महिलाओं की हत्या, बलात्कार और 252 घरों को जलाए जाने की घटना से कल्लूरी फिर चर्चा में आए.

कल्लूरी ने इसके लिए माओवादियों को जिम्मेदार ठहराया था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर सीबीआई ने जांच की और पाया कि कल्लूरी के दावे के उलट हिंसा की इन घटनाओं को सुरक्षाबलों ने ही अंजाम दिया था.

ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुरम के आदिवासियों के लिए राहत सामग्री लेकर पहुंचे स्वामी अग्निवेश पर जब दोरनापाल में सलवा जुड़ूम समर्थकों ने हमला बोला तो आरोप लगे कि कल्लूरी के इशारे पर यह किया गया है.

कल्लूरी को इन आरोपों के बाद बस्तर से हटा दिया गया. बाद में कल्लूरी ने स्वीकार किया कि ये ऑपरेशन उनके नेतृत्व में चलाए गए थे.

2014 में एक बार फिर उन्हें बस्तर का आईजी बनाया गया. आत्मसमर्पण और मुठभेड़ों का सिलसिला एक बार फिर शुरू हुआ. कल्लूरी के हिस्से सर्वाधिक आत्मसमर्पण, गिरफ़्तारियां, मुठभेड़ दर्ज़ होती चलीं गईं.

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राज्य और केंद्र सरकार के लिए कल्लूरी एक सेलिब्रेटी का दर्ज़ा हासिल करते चले गए. देश में माओवाद के मोर्चे पर कल्लूरी के आँकड़ों ने दोनों ही सरकारों के लिए गर्व के कई अवसर उपलब्ध कराए.

बस्तर और रायपुर से लेकर दिल्ली तक उनके प्रशंसक तेज़ी से बढ़े. लेकिन इन सबके बीच कल्लूरी पर गंभीर आरोपों की फेहरिस्त भी लंबी होती चली गई.

बस्तर में काम करने वाले पत्रकार उनके निशाने पर रहे तो जगदलपुर लीगल एड की महिला अधिवक्ताओं को पुलिस संरक्षण में प्रताड़ना के कारण बस्तर ही छोड़ने को मज़बूर होना पड़ा.

इसी तरह एक ग्रामीण की संदिग्ध माओवादियों द्वारा हत्या के मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और जेएनयू की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद समेत दूसरे लोगों के ख़िलाफ़ हत्या का मामला दर्ज़ कर लिया गया.

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भारत में माओवाद के कारण और विकास के मुद्दे पर अध्ययन के लिए गठित केंद्र सरकार की कमेटी की सदस्य रहीं सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया के घर पर पुलिस का संरक्षण प्राप्त संगठन के लोगों ने हमला बोला तो इसकी चर्चा देश भर में हुई.

इसी तरह फर्ज़ी मुठभेड़, हत्या और बलात्कार के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई की जांच रिपोर्ट जब पेश हुई और सारे आरोप सुरक्षाबलों पर लगे तो पूरे बस्तर में पुलिसकर्मी सड़क पर उतर आए. उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ताओं के पुतले जला कर विरोध जताया. इस 'पुलिस विद्रोह' की भी आलोचना हुई और इस मामले में भी जांच शुरू की गई.

बीजेपी सरकार ने बस्तर से वापस बुलाया

इसी तरह केंद्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी एक जांच के बाद पाया कि माओवादियों के खिलाफ ऑपरेशन में लगे सुरक्षाबलों द्वारा 16 महिलाओं के साथ बलात्कार, और यौन हमला किया गया. देश के अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग ने माना कि आदिवासियों को सुरक्षाबलों ने गंभीर रूप से प्रताड़ित किया है.

संदिग्ध माओवादियों से कथित फर्ज़ी मुठभेड़ के कई मामले हाईकोर्ट की देहरी तक पहुंचने लगे. इन सभी मामलों में शिवराम प्रसाद कल्लूरी सवालों के घेरे में रहे.

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इसके बाद फरवरी 2017 में स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर कल्लूरी को बस्तर से हटाकर पुलिस मुख्यालय रायपुर में अटैच कर दिया गया. इस दौरान उन्हें भाजपा सरकार ने लंबे समय तक कोई ज़िम्मेदारी नहीं सौंपी. उल्टे अलग-अलग मामलों में उन्हें नोटिस ज़रुर जारी किया गया.

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