प्रियंका गांधी के प्रभारी बनने से यूपी में बीजेपी और महागठबंधन में किसका नुकसान?

  • 23 जनवरी 2019
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17 अगस्त, 2013 को इलाहाबाद के आनंद भवन में एक कांग्रेसी कार्यकर्ता ने एक पोस्टर लगाया था, जिस पोस्टर पर प्रियंका गांधी की तस्वीर के साथ लिखा था,

मैया रहती है बीमार,

भैया पर बढ़ गया है भार,

प्रियंका फूलपुर से बनो उम्मीदवार,

पार्टी का करो प्रचार, कांग्रेस की सरकार बनाओ तीसरी बार.

इस पोस्टर को लगाने वाले कार्यकर्ता हसीब अहमद को पार्टी ने तुरंत निलंबित कर दिया था. लेकिन 23 जनवरी, 2019 को हसीब अहमद बेहद ख़ुश हैं. उनकी ख़ुशी की वजह है कि अब पार्टी ने प्रियंका गांधी को महासचिव बनाते हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है.

इस पर हसीब अहमद कहते हैं, "छह साल से मैं लगातार ये मांग कर रहा था, मुझे इसके चलते दो बार पार्टी से निलंबित भी कर दिया गया था, लेकिन मैं प्रियंका जी को सक्रिय राजनीति में लाने की मांग करता रहा था. मुझे बेहद ख़ुशी है कि राहुल जी ने मेरी मांग पर ध्यान दिया और इसका फ़ायदा अब कांग्रेस को ज़रूर होगा."

इलाहाबाद कांग्रेस के शहर सचिव हसीब अहमद प्रियंका गांधी को कांग्रेस में लाने की मांग आख़िर कर ही क्यों रहे थे, इस बारे में पूछे जाने पर हसीब कहते हैं कि 2009 में उन्होंने प्रियंका गांधी को अमेठी में चुनाव प्रचार करते देखा था, तभी से उन्हें लगने लगा था कि अगर यूपी में कांग्रेस को मज़बूत करना है तो प्रियंका को सामने आना ही होगा.

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अब कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अकेले चुनाव लड़ने की संभावनाओं के बीच मास्टर स्ट्रोक खेल दिया है. पार्टी ने प्रियंका गांधी को महासचिव बनाते हुए पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है. इसके साथ साथ पार्टी ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को उत्तर प्रदेश (पश्चिम) का प्रभारी बनाया है.

पार्टी के इस फ़ैसले के बाद अमेठी में मीडिया से बात करते हुए राहुल गांधी ने कहा है, "मैं प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया पर भरोसा करता हूं. हम बैकफुट पर नहीं खेलेंगे. मैं प्रियंका और ज्योतिरादित्य को केवल दो महीने के लिए नहीं भेज सकता. मैं इन्हें उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की विचारधारा को बढ़ाने के लिए भेज रहा हूं."

यूपी के कार्यकर्ताओं में उत्साह

प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में आने से उत्तर प्रदेश कांग्रेस विधानमंडल के नेता अजय कुमार लल्लू खासे उत्साहित हैं. वे बताते हैं, "अब यूपी में कांग्रेस चमत्कार करेगी. प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में लाने की मांग कांग्रेस के कार्यकर्ता लगातार करते रहे थे, अब ये मांग पूरी हो गई है, इससे कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में भारी उत्साह है."

हालांकि कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि पार्टी के पीछे कार्यकर्ताओं का नितांत अभाव है.

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के परंपरागत वोटरों में दलित, मुसलमान और ब्राह्मण माने जाते थे. लेकिन मौजूदा समय में तीनों तबका अलग-अलग पार्टी के साथ जुड़ा है, दलित बहुजन समाज पार्टी के खेमे में दिखाई देते रहे हैं, मुसलमान समाजवादी पार्टी के, जबकि ब्राह्मणों ने भारतीय जनता पार्टी को अपना लिया है.

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अजय कुमार लल्लू उम्मीद जताते हैं कि प्रियंका गांधी के आने से स्थिति में बदलाव होगा. वे कहते हैं, "मतदाताओं का जो तबका हमसे दूर हो गया था वो भी अब हमारी ओर उम्मीद से देखेगा. इसकी वजह प्रियंका गांधी का अपना अंदाज़ और व्यक्तित्व है, जिसमें लोग इंदिरा गांधी की छवि देखते हैं."

हालांकि केवल प्रियंका गांधी के आने से कांग्रेस की स्थिति में बहुत बदलाव होगा, ये बात दावे से नहीं कही जा सकती, क्योंकि पार्टी का परंपरागत मतदाता भी छिटक चुका है और ज़्यादातर हिस्सों में पार्टी का संगठन भी उतना मज़बूत नहीं है. कम से बीते बीते तीन दशक से उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की हैसियत चौथे नंबर की रही है.

इस ओर संकेत करते हुए भारतीय जनता पार्टी की ओर से राज्य चुनाव सह-प्रभारी बनाए गए दुष्यंत गौतम कहते हैं कि राहुल गांधी की नाकामी को देखते हुए कांग्रेस ने ये क़दम उठाया है. वे कहते हैं, "मां संरक्षक की भूमिका में हैं, राहुल जी अध्यक्ष हैं और अब बहन महासचिव की भूमिका में. कांग्रेस अंतिम सांसें ले रही हैं ऐसे में कई उपाय कर रही हैं."

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2014 में नरेंद्र मोदी की लहर के सामने कांग्रेस केवल रायबरेली और अमेठी में अपनी सीटें बचा पाईं थीं. 2019 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन ने इन दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार न खड़े करने का ऐलान किया है.

बीजेपी की प्रतिक्रिया

दुष्यंत गौतम कहते हैं, "अगर प्रियंका गांधी के असर को देखना हो तो आप उन दोनों लोकसभा सीटों का हाल देख लीजिए, जहां प्रियंका गांधी प्रचार करती रही हैं. क्या कुछ हुआ है इन इलाक़ों में, कितना विकास हुआ है? आम लोग सब समझ रहे हैं. इनके इतने सालों के शासन के बाद भी देश की 40 फ़ीसदी जनता अगर ग़रीबी रेखा के नीचे रह रही है तो इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है?"

दुष्यंत गौतम का दावा है कि कांग्रेस को गठबंधन करने वाले दलों ने भी नकार दिया है और इस बार अपनी दोनों सीटों को बचाने के भी लाले पड़ेंगे.

बहरहाल, प्रियंका गांधी को कांग्रेस ने पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है. ख़ास बात ये है कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी पूर्वी उत्तर प्रदेश से आते हैं.

ऐसे में प्रियंका गांधी को पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार संभालने की जिम्मेदारी देने से ये ज़ाहिर हो रहा है कि कांग्रेस इस क्षेत्र में मुक़ाबले को तिकोना बनाने की कोशिश कर रही है.

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पूर्वी उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 27 सीटें हैं और समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन से माना जा रहा था कि इन सीटों पर बीजेपी और गठबंधन का सीधा मुक़ाबला होगा, लेकिन प्रियंका गांधी के आने से स्थिति बदलेगी.

भारतीय युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष केशवचंद यादव बताते हैं, "पार्टी आलाकमान के फ़ैसले से ये साफ़ है कि अभी लखनऊ से पूर्व की ओर पूरा यूपी प्रियंका जी देखेंगी और लखनऊ से इधर वाला हिस्सा ज्योतिरादित्य जी. यानी आधी आधी सीटों का प्रभार रहेगा. इन दोनों के आने से वो कमी दूर हो जाएगी, जो निचले स्तर के कार्यकर्ता महसूस करते रहे थे. इस एक फ़ैसले से पार्टी की स्थिति बेहद मज़बूत होने वाली है."

इंदिरा गांधी जैसी छवि

आबादी के लिहाज से पूर्वी उत्तर प्रदेश में बुनकर, मुसलमान, ब्राह्मण, दलित-पिछड़ों की संख्या काफ़ी ज़्यादा है. इसी इलाके के कुशीनगर के तमकूही राज विधानसभा से कांग्रेस के विधायक अजय कुमार लल्लू को भरोसा है कि प्रियंका गांधी के आने से ये लोग कांग्रेस की ओर मुड़ेंगे.

राज्य की राजनीति पर लंबे समय से नज़र रखने वाले वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार अंबिकानंद सहाय कहते हैं, "दरअसल आज भी आम लोगों को नेहरू-गांधी परिवार से एक लगाव तो है और प्रियंका गांधी कुछ कुछ इंदिरा जी जैसी लगती भी हैं, तो इसका असर तो होगा."

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हालांकि समाजवादी पार्टी के नेता अभिषेक मिश्रा मानते हैं कि प्रियंका गांधी के आने से यूपी में महागठबंधन की उम्मीदों पर कोई असर नहीं होगा. उन्होंने बताया, "इस बार का चुनाव उन ताकतों के बीच में है जो एक ओर देश को बांटना चाहती है और दूसरी ओर जो उन्हें हराना चाहती है, और ये लड़ाई हमारी है."

किसका ज़्यादा नुकसान

बावजूद इन दावे प्रतिदावों के बीच प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में उतरने का प्रभाव पड़ना तय माना जा रहा है. अजय लल्लू कहते हैं कि इससे केवल पूर्वी उत्तर प्रदेश नहीं बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस चौंकाने वाले परिणाम लाएगी.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रियंका गांधी के आने से बीजेपी का नुकसान ज़्यादा होगा या फिर महागठबंधन का.

बीजेपी के राज्य के चुनाव सह प्रभारी दुष्यंत गौतम कहते हैं, "मोदी जी के सामने अगर ये सब मिलकर भी लड़ेंगे तो हमारी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. हमारी पार्टी पूरे राज्य में 50 फ़ीसदी से ज़्यादा वोटों के समर्थन जुटाने की तैयारी कर रही है. कोई मुक़ाबले में नहीं है. मोदी जी और योगी जी का काम लोग देख रहे हैं."

वहीं समाजवादी नेता अभिषेक मिश्रा कहते हैं कि कांग्रेस के पास बड़े नेताओं का अभाव तो कभी नहीं रहा है, अब प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया को लाना पार्टी की अपनी रणनीति है, लेकिन इससे ज़मीनी स्तर पर बहुत बदलाव इसलिए नहीं होगा क्योंकि चुनाव संगठन, कार्यकर्ता और स्ट्रक्चर के ज़रिए लड़े जाते हैं, बड़े नेताओं के नाम पर नहीं.

अंबिकानंद सहाय की मानें तो, "आज भी काउबेल्ट का ब्राह्मण नेहरू को असली ब्राह्मण नेता मानता है, ऐसे में ब्राह्मण मतदाताओं ने अगर प्रियंका की तरफ़ रुख़ किया तो बीजेपी को ज़्यादा नुकसान होगा."

फ़िलहाल कांग्रेस यूपी की सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति बना रही है हालांकि राहुल गांधी ने अमेठी में ये भी साफ़ कहा है कि उनका समाजवादी पार्टी- बहुजन समाज पार्टी गठबंधन से कोई मतभेद नहीं है, ज़ाहिर है कि ऐसे में ज़रूरत पड़ने पर कांग्रेस गठबंधन से हाथ मिला सकती है.

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लेकिन 2019 ही नहीं, भविष्य की राजनीति के लिहाज से प्रियंका की मौजूदगी बेहद अहम होगी. अब तक ये माना जाता रहा था कि राहुल गांधी को सामने करने के लिए ही प्रियंका गांधी परदे के पीछे रहना पड़ रहा है लेकिन अब खुद राहुल गांधी ने प्रियंका गांधी को सामने लाकर एक परिपक्वता का परिचय दिया है. इससे कम से कम ये ज़ाहिर हो रहा है कि उनका अपना कांफ़िडेंस मज़बूत हो रहा है.

कांग्रेस को मिलेगी संजीवनी

भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष केशवचंद यादव कहते हैं, "राहुल जी के पास पूरे देश की ज़िम्मेदारी है, ऐसे में प्रियंका जी की सक्रियता से उत्तर प्रदेश में पार्टी को फ़ायदा होगा और राहुल जी को दूसरे प्रदेशों पर ध्यान देने का वक्त भी."

अंबिकानंद सहाय बताते हैं, "1999 में बेल्लारी में सुषमा स्वराज के सामने सोनिया गांधी का चुनाव प्रचार एक तरह से प्रियंका ने ही संभाला हुआ था, तब वे बेहद युवा थीं, लेकिन मैंने तब देखा था कि गैर हिंदीभाषी इलाक़े में लोगों से उनका ज़बरदस्त कनेक्ट था. ऐसे में यूपी में उनके आने से कांग्रेस को नई संजीवनी मिल गई है."

हालांकि अब प्रियंका गांधी को दो बातों के लिए हर पल तैयार रहना होगा, पहली बात तो यही है कि उन्हें अपने पति राबर्ट वाड्रा से जुड़ी कथित वित्तीय अनियमितताओं (हालांकि ये अभी केवल आरोपों की शक्ल में लगाए जाते रहे हैं) को लेकर ढेरों आरोप झेलने होंगे.

साथ ही राहुल गांधी की कथित नाकामी के चलते राजनीति में अपने सक्रिय प्रवेश को डिफेंड भी करना होगा.

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