प्रियंका गांधी की एंट्री और राहुल गांधी की इन तीन बातों के मायने क्या हैं?

  • 24 जनवरी 2019
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राहुल गांधी अमेठी के लिए जब बुधवार को लखनऊ हवाई अड्डे पर उतरे तो उनकी आगवानी करने वाले युवा कांग्रेसी कार्यकर्ता उनसे जो बात कह रहे थे उसमें बार-बार ये बात गूंज रही थी- भैया जी आपको यूपी में ज़्यादा समय देना होगा.

जब ये बात थोड़ी ज़्यादा होने लगी तो राहुल गांधी ने कहा, "आज दोपहर तक ऐसी गोली देता हूं कि सारे रोग दूर हो जाएंगे और आपके अंदर नई एनर्जी आ जाएगी."

उस वक़्त तक लखनऊ से लेकर दिल्ली तक किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि राहुल गांधी ना केवल प्रियंका गांधी को महासचिव बना चुके हैं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपने का फ़ैसला लेकर अमेठी पहुंच रहे हैं.

वैसे, प्रियंका गांधी की राजनीति में आने की सुगबुगहाट, कोई नई बात नहीं है, चाहे वह अमेठी और रायबरेली में चुनाव प्रचार करना रहा हो या फिर राहुल गांधी के पीछे साये की तरह रहना, प्रियंका गांधी इन भूमिकाओं में लगातार नज़र आती रहीं थीं. लेकिन इससे ज़्यादा की भूमिका के लिए वे अनिच्छा जताती रहीं थीं.

लेकिन पिछले साल 13 जुलाई को जब उन्होंने कांग्रेस के सभी विभागों को देख रहे लोगों के साथ वन-टू-वन बैठक लेने के बाद सबसे अगले सौ दिन का एजेंडा पूछा तो ये क़यास लगने लगे थे कि प्रियंका गांधी अब बड़ी भूमिका के लिए तैयार हो चुकी हैं.

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सही मौक़े के इंतज़ार में थी कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी को एक उपयुक्त मौक़े का इंतज़ार था, जो तीन राज्यों में सरकार बनाने के बाद आ चुका था, लेकिन वो मौक़ा किस रूप में सामने आना था.

इसको लेकर कोई भी क़यास लगाने से हिचक रहा था. इसकी वजह ये थी कि ये फ़ैसला पार्टी के नेतृत्व संभालने वाले परिवार के अंदर का था.

बहरहाल जब ये फ़ैसला सामने आया तब से उत्तर प्रदेश में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की स्थिति के बारे में वाराणसी से कांग्रेस नेता अजय राय बताते हैं, "कल से लगातार फ़ोन की घंटियां बज रही हैं, युवा और महिला कार्यकर्ता तो ख़ुशी से पागल हो रहे हैं लेकिन मेरे पास ऐसे कार्यकर्ताओं तक के फ़ोन आ रहे हैं जो कमलापति त्रिपाठी के वक़्त तो कांग्रेसी थे और बाद में दूसरी जगहों पर चले गए."

अजय राय ने तो प्रियंका गांधी से वाराणसी से लोकसभा चुनाव लड़ने की अपील भी कर दी है.

उनका दावा है कि प्रियंका गांधी वाराणसी से लड़ीं तो नरेंद्र मोदी को हराने का करिश्मा भी कर दिखाएंगी. हालांकि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के सामने कांग्रेस इतना बड़ा जोख़िम लेगी, इसमें संदेह है.

कमोबेश यूपी के हर इलाक़े से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में ऐसा उत्साह दिख रहा है लेकिन प्रियंका की एंट्री, राहुल गांधी के लिए राजनीतिक तौर पर कितना मायने रख रही है, इसे उनकी कही तीन बातों में समझा जा सकता है.

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वो तीन बातें जो अहम हैं

राहुल गांधी ने प्रियंका पर प्रतिक्रिया देते हुए जो बातें कहीं हैं, उनमें तीन बातें बेहद अहम हैं-

पहली बात यही है कि हम बीजेपी को रोकेंगे, महागठबंधन से हमारा बैर नहीं है.

ज़ाहिर है राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी-अमित शाह की वापसी को रोकने के लिए अपना पूरा ज़ोर लगा रहे हैं. साथ ही उन्होंने ये भी संकेत दे दिया है कि वे ज़रूरत पड़ने पर महागठबंधन से हाथ भी मिला सकते हैं.

लेकिन इस बयान के राजनीतिक मायने भी हैं. राहुल गांधी ने इससे साफ़ किया है कि बीजेपी को रोकने के लिए वे किसी भी महागठबंधन का हिस्सा बनने को तैयार हैं. और वे गठबंधन से दूर नहीं भाग रहे हैं बल्कि यूपी में महागठबंधन कांग्रेस से दूर भाग रही है.

यह स्थिति अपने समर्थकों के अलावा दूसरे राजनीतिक दलों में राहुल गांधी की स्वीकार्यता को और बढ़ाएगी.

लेकिन इसके बाद राहुल गांधी का दूसरा बयान ज़्यादा अहम है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस अब बैकफुट पर नहीं फ्रंट फुट पर खेलेगी.

साफ़ है कि वे नरेंद्र मोदी को आमने-सामने की चुनौती देते नज़र आ रहे हैं. लेकिन इसके राजनीतिक निहतार्थ महागठबंधन के नेताओं के लिए भी हैं, अगर ज़रूरत पड़ी तो राहुल गांधी अकेले दम पर कांग्रेस को यूपी में खड़ा करने की चुनौती उठाने को तैयार हैं.

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'मोदी को हराने की चुनौती'

हालांकि वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार अंबिकानंद सहाय इसको दूसरी तरह से देखते हैं.

वे कहते हैं, ''2019 की जहां तक बात है तो राहुल गांधी की कोशिश महागठबंधन को चुनौती देने की नहीं होगी क्योंकि उनके सामने नरेंद्र मोदी को हराने की चुनौती है.''

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों की राय में जिस पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी प्रियंका गांधी को बनाया गया है, वो इलाक़ा अब तक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का इलाक़ा माना जाता रहा है, जिसे 2014 में अमित शाह की सोशल इंजीनियरिंग ने तार-तार कर दिया था.

हालांकि दिलचस्प ये है कि ये इलाक़ा कांग्रेस के लिए भी उतना ही मज़बूत रहा है. 2009 में यूपी में जब कांग्रेस ने 21 सीटें जीती थीं, तब 13 सीटें इसी पूर्वांचल से उसके खाते में आई थीं.

दरअसल, दलितों और मुसलमानों की मौजूदगी के साथ-साथ ब्राह्मणों की बड़ी आबादी इस हिस्से में प्रभावी भूमिका निभाती रही है. प्रियंका के सहारे इस इलाक़े में कांग्रेस अपनी खोई हुई ज़मीन को हासिल करने की कोशिश करेगी.

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शहरी और सवर्ण मतदाताओं पर क्या असर?

उत्तर प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेता प्रमोद तिवारी कहते हैं, "देखिए हमारा मतदाता ही बीजेपी और महागठबंधन के दलों की ओर चला गया था. जब वो हमारी ओर लौटेगा तो नुक़सान तो दोनों का होगा. लेकिन ज़्यादा नुक़सान बीजेपी का होगा क्योंकि एक तो उनकी सीटें ज़्यादा हैं और दूसरी बात ये है कि उनका पूरा वोटबैंक ही परंपरागत तौर पर कांग्रेस का वोट बैंक रहा है."

प्रियंका गांधी की सक्रियता का असर शहरी और सवर्ण मतदाताओं पर पड़ सकता है.

सोशल साइंसेंज एंड डेवलपमेंट स्टडीज (सीएसडीएस) के सर्वेक्षण आधारित आंकड़ों के मुताबिक़, 2014 के आम चुनाव में बीजेपी को शहरी क्षेत्र में 55 फ़ीसदी मत मिले थे, कांग्रेस को 20 फ़ीसदी, जबकि बहुजन समाज को 14 और समाजवादी पार्टी को महज़ सात फ़ीसदी.

वहीं जहां तक सवर्ण मतदाताओं की बात है बीजेपी को ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और जाट मतदाताओं के औसतन 70 फ़ीसदी मत मिले थे जबकि इन मतदाताओं की दूसरी पसंद कांग्रेस पार्टी ही रही थी.

इसके अलावा राहुल की तीसरी बात भी उनकी और कांग्रेस के भविष्य की राजनीति का संकेत देती है. राहुल गांधी ने कहा कि वे दो महीने के लिए प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया को ज़िम्मेदारी नहीं दे सकते थे. यानी साफ़ है कि राहुल गांधी ना केवल 2019 देख रहे हैं बल्कि 2022 के विधानसभा चुनावों पर भी उनकी नज़र है.

इस लिहाज़ से उनका इस फ़ैसले का दूरगामी प्रभाव पड़ना तय है. कांग्रेसी नेता अजय राय कहते हैं, "समय ने भले कांग्रेस को राज्य में तीसरे चौथे पायदान पर पहुंचा दिया है लेकिन कांग्रेस आज भी राज्य में एक ताक़त के तौर पर उभरने का दमख़म रखती है और प्रियंका जी के आने से उसकी शुरुआत हो चुकी है."

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प्रियंका गांधी का अंदाज़ और यूपी

यूपी कांग्रेस में इस नए उत्साह के पीछे प्रियंका गांधी का अपना अंदाज़ है. वे लोगों से कनेक्ट करना बख़ूबी जानती हैं. इसका अंदाज़ा आप यूपी के रामपुर ख़ास की कांग्रेसी विधायक आराधना मिश्रा के अनुभव से लगा सकते हैं.

आराधना मिश्रा बताती हैं, "2014 के लोकसभा चुनाव के साथ मैं रामपुर ख़ास का उपचुनाव लड़ रही थी. ऐसा है कि अमेठी और रायबरेली के रास्ते पर मेरा क्षेत्र पड़ता है. प्रचार का शायद आख़िरी दिन था. प्रियंका जी अमेठी से रायबरेली जा रही थीं. मेरे इलाक़े में भी मेरा रोड शो प्रस्तावित था."

"जब वो गुज़रीं तो उन्होंने देखा कि कांग्रेसी झंडा और कार्यकर्ता हैं, मैं उस वक़्त दूसरे जगह पर थी. कुछ देर बाद वहां का प्रोग्राम था. उन्होंने गाड़ी रुकवा दी और मेरे समर्थन में लोगों से वोट देने की अपील की और उन्होंने ऐसा तीन जगहों पर कर दिया. लोगों से जुड़ाव महसूस करने का ऐसा उदाहरण कम ही मिलता है और ख़ास बात ये थी कि मैं कहीं उनके साथ नहीं थी."

अजय राय भी मानते हैं कि लोग प्रियंका गांधी में इंदिरा गांधी की छवि को देखते रहे हैं, ऐसे में पार्टी की स्थिति मज़बूत होते देर नहीं लगेगी.

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'इंदिरा जितना ख़तरा प्रियंका से'

आराधना मिश्रा कहती हैं, "बीजेपी और आरएसएस को जितना ख़तरा इंदिरा गांधी की सोच से महसूस होता रहा था, उतना ही ख़तरा आज की तारीख़ में उन्हें प्रियंका गांधी के व्यक्तित्व से हो रहा है."

प्रमोद तिवारी को इंदिरा गांधी से लेकर राहुल गांधी तक के साथ काम करने का अनुभव रहा है.

वे बताते हैं, "चाहे वो लोगों की भीड़ में भाषण देने का अंदाज़ हो या फिर कार्यकर्ताओं से स्ट्रेट फारवर्ड बात करने का लहजा हो, चाहे उत्साह हो या फिर सक्रियता हो वो एकदम इंदिरा जी की तरह लगती हैं. ऐसे में कांग्रेस के इंदिरा युग की वापसी अब बहुत दूर नहीं है."

प्रियंका गांधी की सक्रियता का काफ़ी कुछ श्रेय राहुल गांधी को भी दिया जाना चाहिए.

उन्होंने इस आलोचना को ख़त्म कर दिया है जिसके तहत कहा जाता रहा था कि राहुल गांधी को आगे बढ़ाने के लिए प्रियंका गांधी को सोनिया गांधी आगे नहीं आने दे रही हैं. ऐसे में पहले सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया और अब प्रियंका को यूपी जैसे अहम राज्य का प्रभार थमाकर राहुल गांधी ने परिपक्वता का ही परिचय दिया है.

इन सबके साथ एक बात और हो रही है, अगर पिछले दिनों के राजनीतिक घटनाक्रमों पर आप नज़र डालें तो राहुल गांधी राजनीतिक बहस का नैरेटिव सेट करते दिख रहे हैं और हर पल चर्चाओं में रहने वाले नरेंद्र मोदी के मंत्रीगण उन नैरेटिव का जवाब देते दिख रहे हैं.

पर यूपी में अभी राहुल की बात केवल नेता कर रहे हैं कार्यकर्ता केवल प्रियंका गांधी की बात कर रहे हैं. एक कांग्रेसी कार्यकर्ता ने तो 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी पर चकाचक बनारसी की लिखी कविता सुनाते हुए कहा,"बैठल छूटल घाट धोबनियां,अब तो पटक पटक के धोई,बोल फलाने, अब का होई."देखना होगा कार्यकर्ताओं का ये उत्साह यूपी में कांग्रेस को दो सीट से दहाई अंक तक पहुंचाता है या नहीं.

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