‘खुले में शौच मुक्त’ घोषित होने के लिए बिहार कितना तैयार?

  • 26 जनवरी 2019
खुले में शौच मुक्त संझौली, ओडीएफ़ इमेज कॉपीरइट Neeraj Priyadarshy/BBC

ओडीएफ़ यानी 'ओपन डिफेकेशन फ्री'. हिंदी में इसका मतलब होता है 'खुले में शौच मुक्त'.

भारत सरकार का पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय इसको और स्पष्ट करते हुए कहता है कि, "ओडीएफ वो जगह है जहां पर्यावरण में मल नहीं दिखे और सभी घरेलू, सार्वजनिक और सामुदायिक स्तर इसका पालन किया जा रहा हो."

ओडीएफ अभियान, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 02 अक्तूबर, 2014 को शुरू किये भारत स्वच्छता अभियान का हिस्सा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस दिन कहा था, "इस अभियान का लोगो गांधीजी का चश्मा है. मैं देख रहा हूं, इन चश्मो से महात्मा गांधी देख रहे हैं कि बेटे, भारत को स्वच्छ किया कि नहीं किया! ये लोगो सिर्फ लोगो नहीं है. इस चश्मे से गांधी देख रहे हैं- क्या किया? क्या कर रहे हो? कैसे कर रहे हो? कब तक करोगे?"

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं पुण्यतिथि को इस कार्यक्रम को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया. यानी इस साल 2 अक्तूबर को सरकार देश को 'खुले में शौच मुक्त' घोषित कर सकती है.

'स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण' की वेबसाइट पर उपलब्ध ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक इस वक़्त तक 98.78 प्रतिशत लक्ष्य हासिल किया जा चुका है.

लेकिन क्या सरकार का ये दावा सच में ज़मीन पर उतारा गया है, इन आंकड़ों के देख कर हर किसी के मन में ये सवाल उठना लाजिमी है.

ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों के मुताबिक "विभाग इसका प्रयास कर रहा है कि 26 जनवरी तक राज्य के ग्रामीण क्षेत्र के सभी घरों में शौचालय हो जाए. इस समय राज्य के 99.66 प्रतिशत ग्रामीण घरों में शौचालय हो गए हैं."

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क्या कहते हैं आंकड़े?

तो क्या सच में बिहार के लगभग सभी घरों में शौचालय बनवा दिए गए हैं?

हाल ही में कांग्रेस के नेता कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के पूछे गए सवालों के जवाब में पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय ने 21 दिसंबर 2018 तक के जो आंकड़े पेश किए, उसके अनुसार, बिहार उन राज्यों की लिस्ट में टॉप पर है जहां सबसे अधिक ज़िले ओडीएफ़ घोषित होने बाक़ी रह गए हैं.

यही नहीं, गांवों के मामले में भी ओडिशा (29,398 गांव) के बाद दूसरे नंबर पर बिहार की ही बारी आती है, जहां अब तक 21,532 गांव ओडीएफ़ नहीं हुए हैं.

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किन आंकड़ों पर यकीन किया जाए!

बिहार सरकार के ग्रामीण विकास विभाग के सचिव अरविंद कुमार चौधरी इसका जवाब देते हैं, "हमारे पास जो आंकड़े हैं वो भारत स्वच्छता मिशन की वेबसाइट पर भी देखे जा सकते हैं. बेसलाइन सर्वे के बाद वो आंकड़े जारी किए गए हैं और जिस तरह की हमारी रफ़्तार है, उसके अनुसार 26 जनवरी को हम 100 फ़ीसदी का आंकड़ा छू लेंगे. हमनें अभी 99.6 फ़ीसदी का लक्ष्य हासिल कर लिया है. जहां तक बात राज्य स्तर पर औपचारिक घोषणा की है, तो ये मैं नहीं कर सकता."

ये बात तो सही है कि ओडीएफ़ की औपचारिक घोषणा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही करेंगे, मगर बकौल अरविंद, ग्रामीण विकास विभाग का दावा पुख्ता है कि 26 जनवरी के पहले बिहार में सौ फ़ीसदी लोगों को शौचालय की सुविधा प्रदान करा दी जाएगी.

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बीबीसी की पड़ताल

बिहार में ओडीएफ का टारगेट 99.6 फ़ीसदी पूरा हो गया. इसे देखने के लिए बीबीसी, बिहार के रोहतास ज़िले के संझौली प्रखंड में पहुंचा.

संझौली वो पहला पंचायत या प्रखंड है जिसे सबसे पहले (योजना के शुरू होने के मात्र 55 हफ्तों बाद ही 30 अगस्त 2016 को) ओडीएफ़ घोषित किया गया था.

राजधानी पटना से संझौली की दूरी महज 122 किलोमीटर है. मंझौली जाने वाली सड़क नेशनल हाइवे 922 पर बोर्ड लगा है, "खुले में शौच मुक्त प्रखंड संझौली में आपका स्वागत है."

हम संझौली के बोर्ड की तस्वीर ले रहे थे तो हमें किसी ने टोका.

ये करमैनी पंचायत के सोनी गांव के रहने वाले धीरज थे. उन्होंने कहा, "ले लीजिए और अच्छे से. हमारे यहां खुले में शौच नहीं होता है."

उन्होंने हमें बताया कि उनके घर का शौचालय 2014-15 में ही बन गया था. लेकिन साथ ही वो कहते हैं कि इसकी राशि उन्हें अब तक नहीं मिली है.

वो कहते हैं, "हमलोगों ने अपने पैसे से शौचालय बनवाया है. फॉर्म भरवाया गया था, फ़ोटो खींच कर ले गए थे कि पैसा मिलेगा. लेकिन आज तक कुछ भी नहीं मिला."

फिर धीरज अपने पड़ोस के उन दर्ज़नों लोगों के नाम गिनाने लगते हैं जिन्हें शौचालय का पैसा नहीं मिला है.

वो कहते हैं, "कई बार हमलोग शिकायत किए. मुखिया से लेकर बीडीओ और डीएम तक के पास. धरना, प्रदर्शन भी हो चुके हैं. सुन रहे हैं कि अब पैसा मिलेगा."

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शुरू में सब कुछ दावे के अनुसार दिखा

संझौली कुल छह पंचायतों का प्रखंड है. संझौली के अलावा अमैठी, उदयपुर और मंझौली की सड़कों पर भी कहीं खुले में शौच देखने को नहीं मिल रहा था.

घरों और सामुदायिक भवनों और स्कूलों की दीवारों पर खुले में शौच मुक्त अभियान के तहत लिखे गए स्लोगन अब भी देखने को मिलते हैं.

संझौली प्रखंड मुख्यालय के ठीक सामने एक बड़ा सा तालाब है जिसके किनारों पर केवल गंदगी ही दिख रही थी. लेकिन एक व्यक्ति उसी में अपने कपड़े भी धो रहा था.

संझौली के बीडीओ कुमुद रंजन अपने प्रखंड की उपलब्धियों के बारे में केवल बात करते हैं.

वो कहते हैं, "आप कहीं भी घूम कर चले आइए, अगर कहीं खुले में शौच दिख गया तो कहिएगा. आप पता कर सकते हैं. जियो टैगिंग हो जाने से वेबसाइट पर भी इसे देखा जा सकता है."

लेकिन, इस सवाल पर कि कई लोगों की शिकायत है कि उनको अभी तक शौचालय के पैसे नहीं मिले ,कइयों का अभी तक जियो टैगिंग भी नहीं हो पाया है, आखिर जिस प्रखंड को अभियान चलाकर सबसे पहले खुले में शौच मुक्त बनाया गया वहां के लोगों की शिकायतें भी बाकी जगहों के लोगों जैसी ही क्यों है?

बीडीओ कुमुद इसका जवाब देने से खुद मना कर देते हैं. कहते हैं, "डीएम साहब का आदेश है कि बीडीओ को मीडिया में बयान नहीं देना है. आप डीएम साहब से जो सवाल करना हो कीजिए."

रोहतास के डीएम पंकज दीक्षित से संपर्क करने पर उन्होंने कहा कि "शौचालय निर्माण के बाद राशि आवंटन तक सबकुछ एक प्रक्रिया के तहत होता है. हालाकिं, अब हमलोग मिशन मोड में आ गए हैं. इस वक्त हमारा सारा ध्यान जियो टैगिंग और पेमेंट पर ही है. शुरू के 55 हफ़्तों में 6000 शौचालय बनाकर खुले में शौचमुक्त तो हम पहले ही हो गए हैं."

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फिर हुआ सच से सामना...

इधर हम अपनी पड़ताल में संझौली प्रखंड मुख्यालय से लौटने के दौरान बाज़ार से होते हुए केके हाई स्कूल के सामने पहुंचे तो सड़क के किनारे दो छोटे स्कूली बच्चे खुले में शौच करते दिख गए.

स्कूली पोशाक में ये बच्चे हमें देखते ही उठ कर खड़े हो गए. इनकी उम्र 10-12 साल के क़रीब होगी. पूछने पर एक ने अपना नाम कुंदन और दूसरे ने विजय बताया.

कुंदन यहां की तीसरी कक्षा में तो विजय चौथी कक्षा में पढ़ते हैं. हमने उनसे पूछा कि क्या स्कूल में शौचालय नहीं है?

कुंदन ने डरते हुए कहा कि उनके स्कूल में एक ही शौचालय जाने लायक है. और वहां लड़कियां भी जाती हैं, इसलिए वे उस शौचालय में नहीं जाते.

अब तक हमारी पड़ताल में खुले में शौच मुक्त लग रहा संझौली आखिर में खुले में शौच करता दिख गया था. अभी तक प्रखंड के बड़े लोगों ने जो बात नहीं बतायी, वो कुंदन और विजय से जानने को मिल गई. उन्होंने बताया कि स्कूल का कोई भी लड़का वहां के शौचालय का इस्तेमाल नहीं करता, वहां केवल लड़कियां ही जाती हैं.

जो दूसरी बात पड़ताल में सामने आयी कि कई लोगों को भारत स्वच्छता मिशन के तहत बने शौचालयों के पैसे अभी तक नहीं मिले हैं.

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जियो टैगिंग का क्या है हाल?

21 जनवरी 2019 तक के आंकड़ों के अनुसार बिहार में अभी तक केवल 4,128 लोगों को ही शौचालय निर्माण और जियो टैगिंग के बाद राशि का भुगतान हो पाया है. जबकि लक्ष्य एक करोड़ छह लाख से भी अधिक का है.

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? जब तक जियो टैगिंग नहीं होगी, तब तक कैसे पता चलेगा कि कितने शौचालय बने और इस दौरान बनवाए गए.

विभागीय सचिव अरविंद चौधरी फिर से प्रक्रिया का हवाला देते हुए कहते हैं, "नियम के मुताबिक भुगतान जियो टैगिंग के बाद ही होगा. रही जियो टैगिंग की बात तो यह बन रहे शौचालयों के फ़ोटोग्राफ़ प्रमाणित करने से लेकर फिजिकल एपियरेंस की जांच तक एक लंबी प्रक्रिया होती है."

ग्रामीण विकास विभाग के शत प्रतिशत शौचालयों के निर्माण के दावे भी तब संदेह के घेरे में आ जाते हैं जब हमें बिहार में बन रहे शौचालयों की फिजिकल एंट्री और उनके जियो टैगिंग के बीच का फर्क नज़र आता है. मतलब ये कि जितने शौचालय अभी निर्माणाधीन है, इन आंकड़ों में उनकी भी गिनती हो गई है.

ये जांचे बिना कि, स्वच्छता अभियान के तहत बने सारे शौचालय इस्तेमाल के लायक हैं भी या नहीं, जिन शौचालयों की महज फिजिकल एंट्री हुई है, उन्हें भी आंकड़े में शामिल कर लिया गया है और इनका हवाला देकर बिहार को ओडीएफ घोषित करने की बात चल रही है.

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क्या ये वाजिब है?

इसके जवाब में अरविंद कुमार कहते हैं, "एक बार जो आईएमआईएस (इंटिग्रेटेड मैनेजमेंट इन्फ़ॉर्मेशन सिस्टम) यानी एकीकृत प्रबंधन सूचना प्रणाली पर चढ़ गया वो तो रिकॉर्ड में आ ही जाएगा. और ये सारे आंकड़े उसी आधार पर तैयार किए गए हैं. जहां तक बात शौचालयों के वेरिफिकेशन की है तो, यह कई चरणों से होकर गुजरता है."

वो थोड़ा और स्पष्ट करते हैं, "आईएमआईएस के आंकड़ों के आधार वो गांव होते हैं जिन्होंने खुद को ओडीएफ़ घोषित किया होता है, इसे सेल्फ डिक्लेयर्ड का नाम दिया गया है, और वही बाद में सत्यापन, सर्वे और जांच के बाद एक वेरिफाइड ओडीएफ बनता है."

पूरी बात सुनने के बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि बिहार सरकार और विभाग आखिर किन रिकार्ड्स को आधार बनाकर ओडीएफ घोषित करने की बात कर रही है. जबकि 21 जनवरी 2019 तक के आंकड़ों के अनुसार बिहार के 38,803 गांवों में से केवल 3,446 गांव ही वेरिफाइड ओडीएफ की श्रेणी में आते हैं.

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