गुजरातः आदिवासियों की वो परंपरा, जिसमें शव को सहेज कर रखा जाता है

  • 29 जनवरी 2019
चड़ोतरुं, गुजरात इमेज कॉपीरइट SHAILESH CHAUHAN

सुबह-सुबह उठ कर बिना नहाए कोई परिवार सबसे पहले अपनी बेटी की शव सड़ न जाए, इसके लिए कड़कड़ाती ठंड में बर्फ के टुकड़े उस पर डाल रहा है.

तो वहां से थोड़ी दूर पर दूसरी एक मां अपने बेटे के पेड़ पर लटकते हुए शव को पंछियों के बचाने के लिए सुबह से बाहर बैठी रहती है.

गुजरात के साबरकांठा के दो गांवों में ऐसा हो रहा है. न्याय पाने के लिए एक परिवार घर में बेटी के शव को बर्फ में सहेज कर रखा है तो दूसरी तरफ एक मां पेड़ में लटके हुए बेटे के शव को पंछी खा न जाए, इसके लिए दिन-रात जागती है.

इमेज कॉपीरइट Bhargav Parikh

गांव के आदिवासी इसे चड़ोतरुं प्रथा कहते हैं. साबरकांठा के पंचमहुड़ा नाम के गांव में छतराजी गमार के परिवार की सुबह तब होती है जब शव का बर्फ पिघल जाता है.

मां आधी रात को चौंक कर जगती है और उनके भाई-बहन रात होते ही भगवान से प्रार्थना करने लगते हैं कि कथित हत्या के मामले में उसकी बहन को न्याय मिले.

हाइवे से तीन किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में बीबीसी की टीम पहुंची तो वहां सन्नाटा पसरा हुआ था.

गांव के खेतों में फसलें लहरा रही हैं पर दूर-दूर तक कोई इंसान नज़र नहीं आया.

सुबह होती है और छतराजी के परिवार के लोग घर के आंगन में चादर बिछाना शुरू कर देते हैं. गांव के लोग उनसे मिलने आते हैं और परिवार को न्याय का दिलासा देते हैं.

वो अपने साथ पास के गांव से बर्फ की सिल्ली भी लेकर आते हैं.

दो कमरे के एक घर में एक में लकड़ी के बक्से में बेटी का शव रखा है तो दूसरे में प्रार्थना की जा रही है.

घर के अंदर का चूल्हा 35 दिनों से बंद है. परिवार लोगों ने प्रतिज्ञा ली है कि जब तक बेटी का क़ातिल पकड़ा नहीं जाएगा, तब तक रसोई में आग नहीं लगेगी.

इमेज कॉपीरइट Bhargav Parikh

'कॉलेज गई थी पर वापस नहीं लौटी'

घर का चूल्हा तो बंद है पर पेट की आग बुझाने के लिए घर के बाहर एक चूल्हा लगाया गया है.

यहां पर गांव की कोई न कोई महिला आकर परिवार के लिए खाना बना देती है. ये पिछले 35 दिनों से चल रहा है. छतराजी पढ़े लिखे हैं और सुरक्षा बल में नौकरी करते थे और अब खेती कर रहे हैं.

छतराजी ने बीबीसी से कहा कि "मेरे सात बच्चे हैं. मैं बेटी को पढ़ा कर अफसर बनाना चाहता था, इसलिए कॉलेज में एडमिशन कराया था."

"कॉलेज में एक कार्यक्रम में वो गई थी, पर वापस नहीं आई. तीन दिन बाद पुलिस ने आकर बताया कि उसका शव मिला है."

"उसके शव के पास से दारु की खाली बोतल और बुझी सिगरेट के टुकड़े मिले हैं. बेटी के गले में फंदा लगा था. ऐसा लग रहा है कि उसे किसी ने मार कर पेड़ से लटका दिया था."

छतराजी के बेटे राजेश ने बीबीसी से कहा, "मेरी बहन को किसी ने मार डाला है और पुलिस उसे आत्महत्या बता रही है."

"पहले पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से हम संतुष्ट नहीं थे, इसलिए हमने दूसरी बार पोस्टमॉर्टम कराने की मांग की. दूसरा पोस्टमॉर्टम अहमदाबाद में हुआ था."

"इस दौरान हमें अलग-अलग नंबर से धमकी भरे फोन आते थे. हमने पुलिस में शिकायत की पर कोई हमारी सुनने को तैयार नहीं हुआ."

"मैं, मेरी मां और मेरी बहन, हम रोज रात को चार घंटे भगवान से न्याय की प्रार्थना करते हैं. मेरे पिता गांधी को मानते हैं और उन्हें लगता है कि अंहिसा के मार्ग से उन्हें न्याय जरूर मिलेगा."

"अगर हम गांव के लोगों के साथ मिलकर चड़ोतरुं करेंगे तो गुनहेगारों को पकड़ना आसान हो जाएगा और हमारी बहन को न्याय मिलेगा."

वो बताते हैं कि जिस तरह पास के गांव में चड़ोतरुं परंपरा के मुताबिक पेड़ से शव लटकाया गया है, उसी तरह वो अपनी बहन का लाश लटका नहीं सकते हैं.

"क्योंकि उसकी मौत को 39 दिन हो गए हैं फिर भी अंतिम संस्कार नहीं किया गया है. समाज के लोग भी उनके यहां नहीं जाते हैं. हमारे साथ समाज है."

अपने बेटो को बीच में रोकते हुए छतराजी कहते हैं, "साहब अगर समाज के लोगों के साथ चड़ोतरुं करेंगे तो हर जगह पर हिंसा होगी, इसलिए शांति से न्याय मिले, इसकी लड़ाई लड़ रहे हैं."

इमेज कॉपीरइट Bhargav Parikh

पास के एक गांव की लड़की से प्यार करता था भाटिया

वहीं दूसरे गांव में भाटिया गमार का शव पिछले 39 दिनों से पेड़ पर लटके होने की बात सुनकर हम टाढी विरडी गांव पहुंचे. वहां उनका घर कोई बताने को तैयार नहीं था.

बहुत मुश्किलों के बाद हम भाटिया गमार के घर पहुंच पाए. गांव वालों ने उसके परिवार को बहिष्कृत कर दिया था.

उसके घर से थोड़ी दूर पर हमें कुछ महिलाओं ने घेर लिया. बहुत मुश्किल से समझाने के बाद भाटिया की मां हीरा गमार से हमारी बात हुई. घर के बाहर पेड़ पर शव टंगा हुआ था और उनकी मां थोड़ी दूर बैठी थी.

हीरा गमार कहती हैं, "मेरा बेटा भाटिया पास के गांव के मशरू गमार की बेटी से प्यार करता था. हम शादी कराने के लिए राजी थे. पिछले साल एक मेले में वो दोनों शादी करने वाले थे लेकिन भाटिया को काम नहीं मिला, इसलिए वो शादी नहीं कर पाया."

"दोनों के रिश्ते की लोग चर्चा किया करते थे. इसलिए समाज ने हमारा बहिष्कार कर दिया है. मशरू और उसके बेटों ने मेरे बेटे को मार डालने की धमकी दी थी और 22 दिसंबर को मेरे बेटे का शव पेड़ पर लटकता मिला था."

हीरा गमार भर्राती आवाज में कहती हैं, "हमने पुलिस में इसकी शिकायत की तो पुलिस ने आत्महत्या का केस दर्ज कर दिया. हमने इसके विरोध में चड़ोतरुं किया है."

"लेकिन गांव के लोगों ने हमारा बहिष्कार कर दिया है इसलिए 39 दिन से शव पेड़ पर लटक रहा है लेकिन कोई पूछने नहीं आता है."

"वैसे तो चड़ोतरुं में आसपास के गांव के लोग भी इकट्ठा होते हैं. अभी भी मुझे आशा है कि इस चड़ोतरुं से हमारे आदिवासी भाई-बहन जुड़ेंगे तो न्याय मिलेगा."

"मैं हर रोज़ इधर ही बैठी रहती हूं, हमने शव को पेड़ पर इसलिए बांधा है क्योंकि कोई जानवर इसे आकर नहीं खा जाए."

"मेरे पति भी बार-बार पेड़ पर चढ़ कर शव पर ढँके हुए कपड़े को ठीक करते रहते हैं."

"हमें पुलिस और न्यायतंत्र पर भरोसा नहीं है, इसलिए चड़ोतरुं किया है. जब तक हमें न्याय नहीं मिलेगा तब तक हम शव को नहीं उतारेंगे."

इमेज कॉपीरइट Bhargav Parikh

चड़ोतरुं का इतिहास

साबरकांठा में चड़ोतरुं मतलब न्याय पाने की प्रथा है, जो आदिवासियों में सदियों से चली आ रही है. न्याय पाने के लिए यहां के आदिवासियों को पुलिस और न्यायतंत्र से ज्यादा पंचायत पर भरोसा है.

जब चड़ोतरुं होता है तब दो गांव के मुखिया मिलते हैं और पंचायत में जो तय होता है उसके हिसाब से न्याय और सज़ा दी जाती है.

पंचायत के आदेश से मुआवज़ा भी दिया जाता है. चड़ोतरुं में ऐसे कई मामले पहले भी सामने आते रहे हैं, जिसमें शवों को 72 दिनों तक लटकाया जाता रहा है.

इस प्रथा पर बात करते हुए समाजसेवी और गांधीवादी मनहर जमील कहते हैं, "ये प्रथा अच्छे उद्देश्य से शुरू की गई थी. अगर किसी महिला की मौत हो जाती तो ससुराल वाले मायके वालों को बुलाते थे. वे बेटी के शव को देखते थे. अगर उन्हें किसी तरह की शंका होती थी तो न्याय पाने के लिए अंतिम संस्कार नहीं होने देते थे और शव को साड़ी में लपेट कर पेड़ में बांध देते थे."

"उसके बाद पंचायत लगती थी और वो जो निर्णय करती, उसके हिसाब से सज़ा दी जाती थी."

"उसके बाद आदिवासियों को अगर लगता है कि उनको पुलिस और क़ानून से कोई न्याय नहीं मिला है तो हत्या के केस में जिसपर शंका हो, उसके घर शव रख कर आ जाते थे."

इमेज कॉपीरइट Bhargav Parikh

जांच जारी है

साबरकांठा में हुए इन दो चड़ोतरुं के बारे में बात करते हुए स्थानीय विधायक अश्वीन कोटवाल कहते हैं, "हमने पहले भी ऐसे मामलों में समाधान कराया है और इन मामलों में प्रयास जारी है. दोनों पक्षों को एक साथ लाकर पुलिस की मदद से हम जल्द ही इसका समाधान निकालेंगे और शवों का अंतिम संस्कार कराएंगे."

साबरकांठा के एसपी चैतन्य मांडलिक बताते हैं कि इन दोनों केस में आकस्मिक मौत हुई है. परिवार की इच्छा के अनुसार पोस्टमॉर्टम भी कराया गया है, लेकिन अगर उन्हें फिर भी शंका है तो जांच चल रही है और जितनी जल्दी हो सकेगा, इसका समाधान निकाला जाएगा.

दूसरी तरफ आदिवासी विकास मंत्री गणपत वसावा ने बीबीसी से कहा, "हम चड़ोतरुं की प्रथा बंद कराने के लिए जागरूकता कार्यक्रम करते रहे हैं और अभी भी चल रहा है."

"आदिवासी समाज में जागृति आए और भविष्य में चड़ोतरुं न हो, इसका प्रयास करेंगे."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे

संबंधित समाचार