‘न्यूनतम आय गारंटी’ पर राहुल गांधी का ये दावा कितना सच?: फ़ैक्ट चेक

  • 29 जनवरी 2019
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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को छत्तीसगढ़ में आयोजित अपनी किसान रैली में लोगों से ये वादा किया कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद अगर उनकी सरकार बनी तो वो सभी ग़रीबों के लिए एक न्यूनतम आमदनी सुनिश्चित करेंगे.

अपने भाषण में उन्होंने कहा, "कांग्रेस पार्टी ने निर्णय ले लिया है कि हिंदुस्तान के हर ग़रीब व्यक्ति को 2019 के बाद कांग्रेस पार्टी वाली सरकार गारंटी करके न्यूनतम आमदनी देने जा रही है. इसका मतलब देश के हर ग़रीब व्यक्ति के बैंक अकाउंट में कांग्रेस सरकार न्यूनतम आमदनी देने जा रही है. देश में न कोई भूखा रहेगा, न कोई ग़रीब रहेगा."

इस चुनावी घोषणा के अंत में राहुल गांधी ने ये दावा किया कि दुनिया की किसी भी सरकार ने आज तक इतना बड़ा फ़ैसला नहीं किया है.

कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, "ये काम आज तक दुनिया की किसी सरकार ने नहीं किया है. ये काम दुनिया में सबसे पहले हिंदुस्तान की 2019 के बाद कांग्रेस वाली सरकार करने जा रही है."

राहुल गांधी ने अपने भाषण में ये नहीं बताया कि वो इस स्कीम को कैसे लागू करेंगे और किन शर्तों पर लोगों को इसका लाभ मिलेगा.

लेकिन उन्होंने जो दावा किया कि दुनिया की किसी भी सरकार ने ऐसी स्कीम नहीं लागू की, ये पूरी तरह सच नहीं है.

अपने भाषण में राहुल गांधी ने जिस योजना का ज़िक्र किया, वो वर्तनाम में कई देशों में चल रहीं कल्याणकारी योजनाओं से मिलती-जुलती है.

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ब्राज़ील की बोल्सा फ़ैमिलिया

लातिन अमरीकी देश ब्राज़ील ने साल 2003 में ऐसी ही एक स्कीम शुरू की थी. इस स्कीम के तहत ग़रीब परिवारों को सरकार भत्ता देती है.

इस स्कीम का नाम 'बोल्सा फ़ैमिलिया' है और ब्राज़ील में इसे एक सफल स्कीम माना जाता है. आंकड़ों के अनुसार इससे ब्राज़ील में ग़रीबी कम हुई है.

साल 2013 में वर्ल्ड बैंक की आधिकारिक वेबसाइट पर छपे एक आर्टिकल के मुताबिक़, "तुरंत होने वाले प्रभाव के अलावा बोल्सा फ़ैमिलिया का एक दूसरा प्रमुख मक़सद बेहतर शिक्षा और स्वास्थ की मदद नई पीढ़ी तक पहुँचाना है ताकि ग़रीबी माता-पिता से उनकी संतानों तक न पहुँच पाए."

ब्राज़ील के पूर्व राष्ट्रपति लूला डि सिल्वा ने बोल्सा फ़ैमिलिया योजना की शुरुआत की थी जो उनके द्वारा शुरू की गईं सबसे चर्चित योजनाओं में से एक कही जाती है.

साल 2003 से 2010 तक ब्राज़ील के राष्ट्रपति रहे लूला डि सिल्वा को इस सशर्त योजना के कारण सबसे अधिक लोकप्रियता मिली थी.

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Image caption ब्राज़ील के पूर्व राष्ट्रपति लूला डि सिल्वा

कैश ट्रांसफ़र योजनाएं, लातिन अमरीका से भारत

बीबीसी न्यूज़ ब्राज़ील के संवाददाता रिकार्डो एकामपोरा ने हमें बताया कि बोल्सा फ़ैमिलिया एक सोशल प्रोग्राम है जो ग़रीब परिवारों की मदद के लिए तैयार किया गया था. ये योजना उन परिवारों के लिए है जो बेहद ग़रीब तबके के हैं और जिनकी प्रति व्यक्ति मासिक आमदनी दो हज़ार रुपये से भी कम है.

रिकार्डो ने बताया, "इस योजना के तहत उन परिवारों को भी लाभ मिलता है जिनकी प्रति व्यक्ति मासिक आमदनी क़रीब 3,400 रुपये तक है, बशर्ते उनके घर में कोई गर्भवती महिला या 17 साल से कम उम्र का कोई बच्चा हो."

हालांकि कुछ अर्थशास्त्री इस योजना की स्थिरता पर सवाल उठाते रहे हैं, लेकिन ये योजना ब्राज़ील में अभी भी जारी है.

वरिष्ठ आर्थिक विश्लेषक और लेखक शंकर अय्यर ने अपनी किताब 'Aadhar - A biometric History of India's 12-Digit Revolution' में लिखा है कि राहुल गांधी ने जब बोल्सा फ़ैमिलिया जैसी कल्याणकारी योजनाओं के बारे में सुना था तो वो उनसे काफ़ी प्रभावित हुए थे.

शंकर अय्यर ने अपनी किताब में लिखा है, "राहुल गांधी ने जब लातिन अमरीकी देशों- ब्राज़ील, मैक्सिको और कोलंबिया में चल रहीं कैश ट्रांसफ़र योजनाओं को देखा, समझा तो उन्हें लगा कि ऐसी योजनाएं भारत में भी लागू की जा सकती हैं."

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Image caption सोमवार को छत्तीसगढ़ में आयोजित राहुल गांधी की किसान रैली की तस्वीर

बढ़ती महंगाई और न्यूनतम आमदनी

उत्तर यूरोपीय देश फ़िनलैंड ने भी जनवरी 2017 में ऐसी ही एक योजना का ट्रायल शुरु किया था.

इस योजना के तहत 2000 बेरोज़गार लोगों को एक बेसिक न्यूनतम आमदनी दी गई थी जो भारतीय रुपये में क़रीब 45 हज़ार रुपये (560 यूरो) थी.

द गार्डियन की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2019 में ये ट्रायल बंद कर दिया गया है और इस योजना के क्या निष्कर्ष रहे, इस पर इसी साल फ़िनलैंड एक रिपोर्ट तैयार करने वाला है.

ईरान भी बढ़ती महंगाई की भरपाई के लिए अपने नागरिकों को एक निश्चित मासिक आय देता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती महंगाई ने इस भुगतान के मूल्य को कम कर दिया है और ये योजना ज़्यादातर लोगों के लिए 'बेकार' हो गई है.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की ये लोकलुभावन चुनावी घोषणा काफ़ी हद तक पीएम नरेंद्र मोदी के चुनावी अभियान को टक्कर देने के उद्देश्य से है.

लेकिन ऐसा करते समय राहुल गांधी ने एक तथ्यात्मक ग़लती की कि वो इसे एक ऐसा फ़ैसला बता गए जो 'दुनिया की किसी सरकार ने नहीं लिया'.

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