अयोध्या मुद्दे पर आख़िर बीजेपी चाहती क्या है- नज़रिया

  • 30 जनवरी 2019
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मोदी सरकार पर उसके समर्थकों, विशेषकर विश्व हिन्दू परिषद और संघ परिवार का ज़बरदस्त दबाव है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले किसी भी तरह अयोध्या के विवादित राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद स्थान पर मंदिर निर्माण का काम शुरू हो जाए.

साधु संतों के अलावा स्वयं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने खुलकर मांग की है कि मोदी सरकार राम मंदिर निर्माण के लिए संसद में क़ानून बनाए अथवा अध्यादेश लाए.

यह दबाव और मांग इसलिए है क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान स्वयं मोदी एवं बीजेपी नेताओं ने सरकार बनने पर मंदिर निर्माण का वादा किया था.

अब तो दिल्ली से लेकर लखनऊ तक दोनों जगह बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार है.

लेकिन मोदी सरकार ने साढ़े चार सालों में न तो पक्षकारों के बीच समझौता कराने की कोशिश की और न सुप्रीम कोर्ट में लंबित अपील को जल्दी निबटाने का प्रयास किया.

मंदिर समर्थकों की बैचेनी

अब कार्यकाल समाप्ति की ओर है और दोबारा वापसी की गारंटी नहीं दिख रही, इसलिए मंदिर समर्थकों की बेचैनी समझ में आती है.

लेकिन क़ानून के जानकार जानते हैं कि अदालत में लंबित मुक़दमों के विषय में सरकार किसी एक के पक्ष में क़ानून नहीं बना सकती .

इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने संघ प्रमुख और अन्य मंदिर समर्थकों को सार्वजनिक तौर पर जवाब दिया कि सरकार अदालती प्रक्रिया के दौरान हस्तक्षेप नहीं कर सकती.

हॉं, अदालत का अंतिम निर्णय आने के बाद ज़रूरी क़दम उठा सकती है.

स्वाभाविक था कि इस बयान से मंदिर समर्थकों को निराशा हुई जिसकी प्रतिक्रिया प्रयागराज कुंभ में देखने को मिल रही है.

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खुलकर नारे लग रहे हैं कि मंदिर नहीं तो अगले चुनाव में वोट नहीं.

पिछले चुनाव में मात्र 31 फ़ीसदी वोट से मोदी सरकार बनी थी. वोटों में मामूली गिरावट भी बीजेपी के विपक्ष में बैठने का कारण बन सकती है.

समझा जाता है कि इसीलिए अपने समर्थकों को साधे रखने के लिए मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दाखिल की है कि अयोध्या में अधिग्रहित 67 एकड़ ज़मीन में से मूल विवादित ज़मीन से इतर फ़ालतू ज़मीन राम जन्म भूमि न्यास को वापस देने की अनुमति दी जाए.

कहां है ये ज़मीन

मूल विवादित भूमि वह है, जहाँ छह दिसंबर 1992 तक विवादित मस्जिद खड़ी थी. इसका रक़बा एक तिहाई एकड़ से भी कम है जिसे कोर एरिया कहा जाता है.

मस्जिद गिरने के बाद तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार ने एक क़ानून बनाकर हाईकोर्ट में चल रहे चारों मुक़दमे समाप्त कर दिए थे और अग़ल बग़ल की 67 एकड़ ज़मीन अधिग्रहित कर ली थी.

इतनी अधिक ज़मीन इसलिए अधिग्रहित की थी कि जो पक्ष अदालत से कोर एरिया जीते उसे रास्ता, पार्किंग व अन्य तीर्थ यात्री सुविधाएँ बनाने के लिए ज़मीन मिल जाए.

बाक़ी ज़मीन हारे हुए पक्ष को देने की व्यवस्था थी, जिससे हिंदू-मुस्लिम दोनों समुदायों को संतुष्ट किया जा सके.

इस 67 एकड़ में वह 42 एकड़ ज़मीन भी शामिल है जो वर्ष 1991 में कल्याण सिंह सरकार ने एक रुपए सालाना की लीज़ पर राम जन्म भूमि न्यास को दी थी. बाक़ी ज़मीनें कई मंदिरों और व्यक्तियों की थीं.

याद दिला दें कि यह 42 एकड़ ज़मीन इंदिरा गॉंधी की इच्छानुसार कांग्रेस की वीर बहादुर सरकार ने मस्जिद के बग़ल में राम कथा पार्क बनवाने के लिए अधिग्रहित की थी.

तत्कालीन सरकार ने संवैधानिक प्रावधान के अनुसार राष्ट्रपति के ज़रिए सुप्रीम कोर्ट से राय मॉंगी थी कि क्या विवादित भूमि पर पहले कोई मंदिर स्थित था, जिसे तोड़कर मस्जिद बनी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रश्न का जवाब देने से इनकार कर दिया, साथ ही हाईकोर्ट में चल रहे चारों मुक़दमे जीवित कर दिए, जिससे अपील का मौलिक अधिकार समाप्त न हो.

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सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1994 में अधिग्रहण क़ानून को वैध ठहराया था. साथ ही यह भी कहा था कि क़ानून के मुताबिक़ ज़मीन का उपयोग यानि मंदिर-मस्जिद रास्ता, पार्किंग और यात्री सुविधाओं के बाद जो फ़ालतू ज़मीन बचे उसे उसके मूल मालिकों को वापस किया जा सकता है.

यानी यह प्रक्रिया विवाद के संपूर्ण समाधान के बाद होगी. अदालत ने तब तक यथास्थिति बनाए रखने के लिए केंद्र सरकार को कस्टोडियन बना दिया था. इसी व्यवस्था में कमिश्नर फ़ैज़ाबाद उस ज़मीन के रिसीवर हैं.

इससे पहले वर्ष 2002 में जब केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार थी तब भी मंदिर निर्माण शुरू करने के लिए कुछ ज़मीन देने के लिए विश्व हिन्दू परिषद ने आंदोलन किया था.

तब वीएचपी अधिग्रहित क्षेत्र में सांकेतिक शिला पूजन करना चाहती थी. किन सुप्रीम कोर्ट ने फिर से स्पष्ट किया कि सम्पूर्ण अधिग्रहित क्षेत्र का कोई हिस्सा विवाद के निबटारे तक किसी को नहीं दिया जा सकता.

तब बीजेपी सरकार ने ही अयोध्या में निषेधाज्ञा लगाकर फ़ोर्स के ज़रिए हज़ारों कार सेवकों को अयोध्या घुसने से रोक दिया था.

राम जन्म भूमि न्यास के अध्यक्ष राम चंद्र दास परमहंस दिगंबर अखाड़ा के बाहर नहीं निकल पाए थे. उनकी इज़्ज़त रखने के लिए कमिश्नर ने वहीं दो शिलाएँ प्राप्त की थीं, जो कहॉं गईं पता नहीं.

वर्ष 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का ज़मीन के तीन पक्षों में बँटवारे का फ़ैसला आने के बाद सभी मुक़दमे सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, जिसकी सुनवाई नवगठित संविधान पीठ अगले महीने से करेगी.

बीजेपी समर्थकों का कहना है कि अब उनका धैर्य टूट रहा है.

वीएचपी का विरोध जारी

वीएचपी विरोधी शंकराचार्य भी मंदिर के लिए अयोध्या कूच की बात कह रहे हैं. वीएचपी के पूर्व अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया अलग से मोदी पर हमलावर हैं.

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ऐसे में मोदी सरकार ने नई याचिका के ज़रिए फिर से गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में डाल दी है.

लगता नहीं कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार की इस याचिका पर तुरंत सुनवाई कर संविधान पीठ का यथास्थिति क़ायम रखने का फ़ैसला बदलेगा.

सवाल यह भी है कि क्या जो लोग मस्जिद के बीच वाले गुंबद के नीचे ही, जहॉं इस समय तंबू के नीचे राम लला विराजमान हैं, राम मंदिर का गर्भ गृह बनवाने पर अड़े थे, वे दूर हटकर मंदिर निर्माण से संतुष्ट होंगे.

ऐसा था तो वर्ष 1989 में ही मंदिर बन जाता जब राजीव गांधी ने विवादित मस्जिद से 192 फ़ुट दूर शिलान्यास कराया था.

फ़ैज़ाबाद के वरिष्ठ पत्रकार शीतला सिंह ने हाल ही में जानकारी दी है कि वर्ष 1987 में कॉंग्रेस सरकार के दौरान वीएचपी नेता अशोक सिंघल ने मस्जिद को घेरकर बग़ल की ज़मीन पर मंदिर निर्माण का समझौता कर लिया था.

किन्तु संघ प्रमुख ने यह कहकर वीटो मार दिया था कि लक्ष्य मंदिर नहीं, केंद्र में सरकार बनाना है. इसीलिए हमेशा ज़ोर मस्जिद के नीचे मंदिर निर्माण पर रहा ताकि कोई समझौता न हो.

आज भी मुस्लिम समुदाय को मस्जिद से हटकर मंदिर बनाना पर एतराज़ नहीं.

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कौन जाने मोदी का यह दॉंव फिर से सरकार में आने के लिए हो?

बीजेपी ने 1989 में पालमपुर अधिवेशन में प्रस्ताव पास कर राम मंदिर का खुलकर समर्थन किया था. तभी से वह राम मंदिर के नाम पर वोट मॉंगती आयी है.

तब वह कांग्रेस व दूसरी सरकारों से कहती थी कि क़ानून बनाकर विवादित भूमि मंदिर बनाने को दे दी जाए.

वही बात अब बीजेपी सरकार के गले की फॉंस बन गई है.

पूरे मामले में कुछ और बिंदु विचारणीय हैं. दूसरे सनातन हिंदू धर्म की परंपरा के अनुसार रामानन्दाचार्य संप्रदाय ने इस स्थान के रख-रखाव और पूजा का ज़िम्मा निर्मोही अखाड़ा को दिया है जो 1885 यानी 134 सालों से राम मंदिर की क़ानूनी लड़ाई लड़ रहा है.

यानी विश्व हिंदू परिषद का राम जन्म भूमि न्यास सभी हिंदुओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता. शंकराचार्य भी वीएचपी के साथ नहीं हैं. वीएचपी का न्यास बीजेपी सरकार की मदद से निर्मोही अखाड़ा को बाहर करना चाहता है.

दूसरा यह कि केंद्र सरकार मूल मुक़दमों में पक्षकार नहीं है. बल्कि उसकी भूमिका एक निष्पक्ष पहरेदार और अदालत का फ़ैसला लागू करवाने की है. ऐसे में क्या सरकार किसी एक समुदाय के पक्ष में खड़ी हो सकती है? क्या यह भारतीय संविधान के अनुकूल है?

दरअसल यह प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है जो भावी भारत की दिशा तय करेगा.

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