रक्षा बजट पर कौन बेहतर- मोदी या मनमोहन?

  • 2 फरवरी 2019
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रक्षा बजट से जुड़े इस लेख को पढ़ने और आंकड़ों के दरिया में ग़ोते लगाने से पहले इतिहासकार जेफ़री ब्लेनी की लिखी ये दो पंक्तियां पढ़ लीजिए...

"युद्ध आमतौर पर तब समाप्त होते हैं जब युद्ध कर रहे देश एक दूसरे की ताक़त को समझ जाते हैं और उस पर सहमति बना लेते हैं. और युद्ध आमतौर पर तब शुरू होते हैं जब यही देश एक-दूसरे की ताक़तों को समझने से इकार कर देते हैं."

इन पंक्तियों को पढ़ने के बाद शायद अब आप समझ गए होंगे कि ये लेख क्यों ज़रूरी है.

भारत, एक ऐसा देश है जो चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के बीच में फंसा हुआ है. ये दोनों ही पड़ोसी मुल्क परमाणु शक्तियों से लैस हैं.

इतिहास में इन दोनों ही देशों के साथ भारत युद्ध लड़ चुका है और वर्तमान में छोटे-बड़े मुद्दों को लेकर इनके साथ भारत की तनातनी बनी रहती है.

इन सबके बीच भारत के भीतर भी अपनी तमाम चुनौतियां मौजूद हैं जिन्हें सुलझाने के लिए गाहेबगाहे सेना बुलानी ही पड़ जाती है.

इन बाहरी और भीतरी चुनौतियों का सामना करने के लिए देश को एक मज़बूत सेना की ज़रूरत पड़ती है.

भारतीय सेना में लाखों जवान भर्ती हैं. उनकी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए कई तरह की कोशिशें करने की आवश्यकता है.

सरकारें हर साल पेश किए जाने वाले आम बजट में रक्षा बजट के लिए भी अलग से ख़र्च करती है.

एनडीए का रक्षा बजट

आइए कुछ पुराने आंकड़ों को खंगालते हैं और देखते हैं कि एनडीए और यूपीए सरकार में से किसने रक्षा बजट पर अधिक ध्यान दिया.

मई 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश की नई सरकार बनी तो उनके पास एक फ़ुल-टाइम रक्षा मंत्री नहीं थे.

अरुण जेटली, जो कि वित्त मंत्रालय संभाल रहे थे उन्हें ही रक्षा मंत्रालय का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया था.

उस समय कई लोगों ने माना था कि इससे देश की सेना को फ़ायदा पहुंचेगा क्योंकि वित्त मंत्री के हाथ में ही रक्षा मंत्रालय की चाबी भी रहेगी.

लेकिन क्या हक़ीक़त में सब कुछ ऐसा ही हुआ, एक नज़र डालते हैं

10 जुलाई 2014 को अरुण जेटली ने नई सरकार का पहला बजट पेश किया. इसमें उन्होंने 2,33,872 करोड़ रुपए सेना के लिए आवंटित किए.

यह आंकड़ा यूपीए सरकार के ज़रिए फ़रवरी 2014 में पेश किए गए अंतिम बजट से क़रीब 5 हज़ार करोड़ रुपए अधिक था..

इस तरह एनडीए ने मोटे तौर पर सेना के लिए होने वाले ख़र्च में 9 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी की.

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इसके बाद एनडीए सरकार का पहला पूर्ण बजट 28 फ़रवरी 2015 में पेश किया गया. इस बजट में पिछले बजट की तरह ही रक्षा के लिए आवंटित ख़र्च 2,55,443 करोड़ रुपए रखा गया.

इसके अगले साल 29 फ़रवरी 2016 को जब जेटली ने बजट पेश किया तो उन्होंने सेना पर ख़र्च का ज़िक्र नहीं किया. इस पर कई लोगों ने सवालिया निशान भी उठाए.

यह अनुमान लगाया जा रहा था कि रक्षा बजट में दो प्रतिशत की वृद्धि की जाएगी.

इस बजट को पेश करने से कुछ वक़्त पहले यानी 15 दिसंबर 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अलग-अलग सेनाओं के कमांडरों की संयुक्त बैठक में बोल चुके थे, "मौजूदा समय में तमाम बड़ी शक्तियां अपने सैन्यबलों को कम कर रही हैं और आधुनिक उपकरणों और तकनीक पर अधिक ध्यान लगा रही हैं. जबकि हम अभी भी अपने सैन्यबल को ही बढ़ा रहे हैं. एक ही समय पर सेना का विस्तार और उसका आधुनिकीकरण करना मुश्किल और ग़ैरज़रूरी लक्ष्य है."

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1 फ़रवरी 2017 को जब वित्त मंत्री एक बार फिर बजट के साथ हाज़िर हुए तो उन्होंने रक्षा बजट के तौर पर 2,74,114 करोड़ रुपए आवंटित किए.

पिछले बजट से बिलकुल उलट इस बार के बजट में क़रीब 6 प्रतिशत की वृद्धि थी. रक्षा मंत्रालय के फंड से चलने वाले इंस्टिट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज़ एंड एनालिसिस (आईडीएसए) के लिए लिखते हुए रिसर्च फ़ैलो लक्ष्मण के. बेहरा ने इसे अपर्याप्त बजट बताया था.

पिछले साल 1 फ़रवरी को अरुण जेटली ने एक बार फिर रक्षा बजट में 8 प्रतिशत की वृद्धि की. पिछले साल रक्षा बजट के लिए 2,95,511 करोड़ रुपए आवंटित किए गए.

वहीं शुक्रवार को अपना पहला बजट और सरकार के कार्यकाल का आख़िरी बजट पेश करते हुए पीयूष गोयल ने कहा, "पहली बार हमारा रक्षा बजट 3 लाख करोड़ के पार पहुंचने जा रहा है." इस बार के रक्षा बजट में 3,18,847 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं. पिछले बजट के मुकाबले इसमें आठ प्रतिशत की वृद्धि है.

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तो अब सवाल यह उठता है कि रक्षा बजट के मामले में क्या एनडीए की सरकार यूपीए से अधिक कारगर साबित हुई है?

रक्षा मंत्रालय में पूर्व वित्त सलाहकार रह चुके अमित कॉविश इस बारे में कहते हैं, "दोनों सरकारों के बीच अगर हम आंकलन करें तो एक जैसा ही ट्रेंड देखने को मिलता है. हालांकि बजट आंवटन में जो अंतर नज़र आता है वह स्वाभाविक अंतर है. क्योंकि 15 साल में इतना अंतर तो आना ही था."

अगर हम मौजूदा वक़्त में सेना के वरिष्ठ अफ़सरों और सांसदों (जिनमें बीजेपी के सांसद भी शामिल है) की राय जांचें तो पाएंगे कि मोदी सरकार के लिए रक्षा बजट हमेशा ही एक दुखती रग रहा है.

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कुछ वरिष्ठ सैन्य अफ़सरों की राय इस तरह से हैः

नवंबर 2018 को भारतीय नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा ने कहा था, "जीडीपी के प्रतिशत में भले ही गिरावट आई हो लेकिन जैसा कि हमसे वादा किया गया था रक्षा बजट लगातार ऊपर ही बढ़ा है. हम चाहते हैं इसमें और वृद्धि होती रहे, हालांकि कुछ अड़चनें ज़रूर हैं और हम सभी उनसे अवगत भी हैं."

25 जुलाई 2018 को बीजेपी के सांसद डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी ने कहा था, "जीडीपी के 1.56 प्रतिशत हिस्सा रक्षा पर खर्च किया जा रहा है. साल 1962 में चीन से युद्ध के बाद से यह सबसे निचले स्तर पर है. भारत जैसे बड़े देश के लिए सका रक्षा बजट बहुत अहम होता है."

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मार्च 2018 को संसदीय समिति में आर्मी स्टाफ़ के उप प्रमुख ने कहा, "साल 2018-19 के बजट ने हमारी उम्मीद को खत्म कर दिया. हमने जो कुछ भी प्राप्त किया था उन्हें थोड़ा-सा झटका तो लगा है. ऐसे में अब हमारी समिति के बहुत से पुराने खर्च और बढ़ जाएंगे."

मार्च 2018 को संसदीय समिति ने रक्षा बजट पर कहा था, "बीते कुछ सालों में वायु सेना के लिए होने वाले खर्च के हिस्से में गिरावट आई है. वायु सेना को आधुनिक बनाने के लिए जिस खर्च की आवश्यकता है उसमें भी गिरावट दर्ज की गई है."

"साल 2007-08 में कुल रक्षा बजट में इसका हिस्सा जहां 17.51 प्रतिशत था वहीं साल 2016-17 में यह गिरकर 11.96 प्रतिशत पर आ गया."

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