सिविल सोसायटी ने लगाया मोदी सरकार पर आवाज़ दबाने का आरोप

  • 3 फरवरी 2019

"यदि मुसलमान सत्ता के ख़िलाफ़ खड़ा होता है तो उसे जिहादी आतंकवादी कह दो, यदि दलित और आदिवासी खड़ा होता है तो उसे नक्सलवादी या माओवादी बोल दो."

गुजरात से दलित आंदोलन का चेहरा बन चुके विधायक जिग्नेश मेवाणी के ये शब्द बता रहे हैं कि दिल्ली के प्रेस क्लब में शनिवार दोपहर साढ़े तीन बजे शुरु हुए सामाजिक सगंठनों के लोग किस मुद्दे पर बात करने जुटे थे.

देश के करीब तीस संगठनों ने एक स्वर में कहा कि मौजूदा सरकार क़ानूनों का ग़लत इस्तेमाल करके कथित तौर पर कमज़ोर तबके के हकों की बात करने वालों और बुद्धिजीवियों की आवाज़ दबा रही है जिसे रोका जाना अब वक्त की ज़रूरत बन गया है.

"सरकार के दमनकारी कानूनों, इंम्प्यूनिटी और गिरफ्तारी के ख़तरों" के बारे में आगाह करने के संबंध में हुई इस प्रेस कांफ्रेंस में हाल में हुई भीमा कोरेगांव मामले की जांच के सिलसिले में पकड़े गए सामाजिक कार्यकर्ताओं की जल्द रिहाई, अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए क़दम उठाने और देश में फैले डर के माहौल पर चर्चा हुई. साथ ही मौजूदा क़ानूनों के ग़लत इस्तेमाल को रोकने की भी मांग की गई.

'किस किस को कैद करोगे' नाम का यह आयोजन रिहाई मंच, आइसा, भीम आर्मी, बिगुल मज़दूर दस्ता, मज़दूर एकता संगठन और समाजवादी जनपरिषद समेत करीब तीस संगठनों ने मिल कर किया था.

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भीमा कोरेगांव हिंसा: पांच सामाजिक कार्यकर्ता ग़िरफ़्तार

लंबे समय से बस्तर में काम कर चुके मानवाधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने कहा, "भीमा कोरेगांव में सामाजिक कार्यकर्ताओं को ये कह कर कि ये मोदी साहब को मारना चाहते हैं इसलिए इनको जेल में डाल दिया जाए, ये हास्यास्पद आरोप है."

वो कहते हैं कि "मैं सुधा भारद्वाज को जानता हूं. आदिवासी महिलाओं के साथ सुरक्षाबलों के द्वारा किए गए बलात्कार के मामले सुधा फ्री में लड़ती थीं. उन्होंने विदेश में पढ़ाई की और फिर भारत में कर काम करने लगीं. उनके लिए कहा जा रहा है कि वो पीएम को मारना चाहती हैं."

'आज के हालात चिंता का विषय'

दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों के ख़िलाफ़ कथित अत्याचारों के संबंध में दलित चिंतक अनिल चमड़िया ने कहा, "मौजूदा हालात लोकतंत्र के लिए अच्छे नहीं हैं."

उन्होंने आरोप लगया कि मौजूदा सरकार के समय में अल्पसंख्यकों को डराने और अदालतों को प्रभावित करने का इन्टेंशन दिख रहा है.

भारतीय इतिहासकार उमा चक्रवर्ती ने सरकार की नीतियों की तरफ इशारा करते हुए कहा ये सरकार एक अलग तरह की इमर्जेंसी लगा रही है जो "नेशनल इमर्जेंसी नहीं बल्कि सेक्शनल इमर्जेंसी है."

"उन्होंने ये सीख लिया है कि अब हम चुन-चुन लोगों को जेल में डालेंगे और ये हमारे लिए चिंता का विषय है. मैं समझती हूं कि आज जो स्थिति हमारे सामने है वो ख़ास है जिसमें वो वकीलों और बुद्धिजीवियों को चुप कराना चाहते हैं. जिन लोगों को उन्होंने जेलों में डाला है- दलित, आदिवासी और मुसलमान- उनके लिए बोलने वाले ये दो ही तरह के लोग हैं."

उमा चक्रवर्ती कहती हैं कि अगर वो वकीलों को नहीं डराएंगे तो क्या करेंगे. "कहा जाता है कि इमर्जेंसी के ज़माने में ना वकील था ना अपील थी. आज सरकार ने वकीलों को चुप करा दिया और अपीलों के इतिहास को देखेंगे तो जानेंगे कि अपील किए जा रहे हैं, एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट, फिर दूसरे के और कोर्ट....."

प्रेस कांफ्रेंस के बीच वकील वृंदा ग्रोवर ने बताया कि पुणे की एक अदालत ने गोवा इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेन्ट में प्रोफेसर आनंद तेलतुम्बड़े को रिहा करने का आदेश पुलिस को दिया है.

उन्होंने तेलतुम्बड़े की गिरफ्तारी को अवैध किडनैपिंग बताया और कहा, "ये घटना हमको ये साफ़ रूप से दिखाती है कि क़ानून और सुप्रीम कोर्ट को कोई मान्यता नहीं दी जा रही है."

प्रोफेसर तेलतुम्बड़े को प्रतिबंधित माओवादियों से संबंध रखने के शक के आधार पर शनिवार की सुबह 4 बजे मुंबई हवाईअड्डे से पुलिस ने गिरफ़्तार किया था, हालांकि इसी साल जनवरी 14 को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें एक महीने की सुरक्षा दी थी.

पुलिस का कहना था कि उन्हें भीमा कोरेगांव हिंसा से पहले हुई यलगार परिषद की बैठक के सिलसिले में गिरफ़्तार किया गया था.

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द वायर पत्रिका के संस्थापक और संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने इस मौके पर कहा, "पत्रकार इस भ्रम में रहता है कि जो सामाजिक कार्यकर्ता हैं कुछ ना कुछ कर रहे होंगे सरकार के ख़िलाफ़. लेकिन आप देख सकते हैं कि पत्रकारों की आवाज़ को दबाया जा रहा है."

गुजरात से दलित आंदोलन का चेहरा बन चुके विधायक जिग्नेश मेवाणी ने कहा कि हाल में ऊना में, भीमा कोरेगांव में, सहारनपुर में , 2 अप्रैल के भारत बंद के दौरान कई बार दलित अपने मुद्दों को लेकर सरकार की नीतियों का पुरज़ोर विरोध करते नज़र आए थे.

"नाराज़ और सरकार से लड़ने वालों को कानून के ज़रिए कुछ महीने और सालों तक कैसे जेल में डाला जाए और कैसे सरकार को सहानुभूति मिले इसलिए लोगों के ख़िलाफ़ एक मुहिम छेड़ी गई है."

"2019 के चुनाव तक और उसके बाद हम पूरे देश में घूम कर जनसाधारण में चेतना फैलाएंगे और इस बात को दोहराएंगे."

यूएपीए कानून क्या है?

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अनलॉफुल एक्टिविटीज़ प्रीवेन्शन ऐक्ट (यूएपीए) यानी ग़ैरकानूनी गतिविधियों पर पाबंदी वाला क़ानून साल 1967 में संसद में लाया गया था.

इसी क़ानून के तहत 2009 में शीर्ष माओवादी नेता कोबाड़ गांधी और 2007 में इंडियन एसोसिएशन ऑफ़ पीपल्स लॉयर्स के कोषाध्यक्ष अरुण फरेरा को पुलिस ने गिरफ्तार किया था.

2012 में अदालत ने कोबाड़ गांधी के ख़िलाफ़ गैरकानूनी गतिविधियों में शामिल रहने जैसे कड़े अभियोग लगाने से इंकार कर दिया था.

अरुण फरेरा को 2010 में नागपुर की एक कोर्ट से सभी आरोपों से मुक्त कर दिया था लेकिन उन्हें पुलिस ने फिर एक दूसरे मामले में गिरफ़्तार किया. जेल में पांच साल बिताने के बाद अरुण फ़रेरा को 2012 को ज़मानत पर रिहा किया गया.

दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर उज्जवल बताते हैं, "2004 में पोटा क़ानून को निरस्त कर दिया गया था. अभी का जो यूएपीए है वो पोटा (प्रिवेन्शनव ऑफ़ टेररिज़म एक्ट यानी आतंकवाद निरोधी अधिनियम 2002) को निरस्त करने के बाद आया है, जब उसके कुछ प्रोविज़न को यूएपीए में डाल दिया गया था. फिर 2008 के मुंबई हमलों और 2012 में इसमें संशोधन किये गए थे."

"इसमें सिर्फ गौरकानूनी तरीके से एक सभा करने की बात नहीं है, इसमें आतकंवाद, आतंकवादी और आतंकवादी समूहों की भी बात है. पोटा और टाडा से बदलाव ये है कि वहां पर पुलिस के सामने जो इक़बालिया बयान दिया जाता है को कोर्ट में मान्य होता था यूएपीए में वो नहीं है."

लेखक और मानवाधिकार कार्यकर्ता सुभाष गाताड़े कहते हैं, "ये ऐसा क़ानून है कि आप किसी भी निरपराध व्यक्ति को आप गिरफ़्तार कर सकते हैं और साल साल तक उनको रख सकते हैं."

प्रोफ़ेसर उज्जवल कहते हैं कि यूएपीए से जुड़ी सबसे बड़ी बात जो परेशान करती है वो ये है कि कोर्ट में सरकारी अभियोजक को सुनने का प्रावधान है और अगर उन्होंने कहा कि उक्त व्यक्ति पर आरोप है तो वहां तो उन्हें ज़मानत नहीं मिलती.

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