मलका पुखराज... वो बातें तेरी वो फ़साने तेरेः विवेचना

  • 4 फरवरी 2019
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हफ़ीज़ जालंधरी की नज़्म अभी तो मैं जवान हूँ को पूरी दुनिया में मशहूर करने का श्रेय अगर किसी को दिया जा सकता है, तो वो हैं मलका पुखराज.

कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के दरबार से अपने करियर की शुरुआत करने वाली मलका ग़ज़ल गायकी के उस मुक़ाम तक पहुंची, जहाँ अब तक बहुत कम लोग पहुंच पाए हैं.

उनकी मौत से एक साल पहले अंग्रेज़ी में उनकी आत्मकथा प्रकाशित हुई थी, ' सॉन्ग संग ट्रू.' दिलचस्प बात ये है कि उसको उनके देश पाकिस्तान में नहीं, बल्कि भारत में छपवाया गया था और उसको छपवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी मलका को नज़दीक से जानने वाले पाकिस्तान के जाने-माने राजनीतिज्ञ और वकील रज़ा काज़िम ने.

रज़ा काज़िम बताते हैं, ''मलका पुखराज से मेरी वाकफ़ियत हो गई थी. वो आती-जाती थीं मेरे पास. मैं उनका क़दरदान था, एक फ़नकार की हैसियत से और वो मुझ पर ऐतबार करती थीं. जब उन्होंने अपने हाथ से लिखा मसौदा मुझे दिया तो मैंने उसे पूरा पढ़ा. मैंने उनसे कहा कि मैं इसे दिल्ली में जा कर छपवाउँगा, क्योंकि उसका पाकिस्तान में छपना मुश्किल था.''

उन्होंने बताया, ''उनके दामाद जो यहां वकील थे, वो उसके छपने की सख़्त मुख़ालफ़त कर रहे थे. उसमें उन्होंने अपने रिश्तेदारों के ख़िलाफ़ काफ़ी कुछ लिखा था मैंने जब उनसे उसे छपवाने की इजाज़त माँगी तो उन्होंने वो मसौदा मुझे पकड़ा दिया और कहा तुम इसका जो चाहो कर सकते हो. सलीम क़िदवई मेरे जानने वाले थे और अजीज़ दोस्त भी थे. मैंने उनसे उसे भारत में छपवाने के लिए कहा तो वो इसके लिए फ़ौरन राज़ी हो गए.''

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अच्छे कपड़े और ज़ेवर पहनने का शौक

जब सलीम किदवई को उनकी उर्दू में लिखी आत्मकथा का अंग्रेज़ी में अनुवाद करने की ज़िम्मेदारी दी गई तो उन्होंने तय किया कि इससे पहले कि वो अपने काम की शुरुआत करें, वो मलका से मिलने लाहौर जाएंगे.

सलीम बताते हैं, ''बहुत ही प्रभावशाली शख़्सियत थी उनकी, हाँलाकि उनकी उम्र हो गई थी. हमेशा 'वेल टर्न्ड आउट' रहती थीं और ऐसा लगता था कि वो हमेशा ऐसी ही रहीं होंगी. उनको हमेशा से अच्छे कपड़े और ज़ेवर पहनने का शौक था. आख़िर तक उनका ये शौक बरकरार रहा. जूते ज़रूर वो 'स्नीकर्स' पहनती थीं, ताकि उन्हें चलने में दिक्कत न हो.''

वह कहते हैं, ''शुरू में न मैं उन्हें जानता था और न ही वो मुझे जानती थीं. थोड़ी 'ऑक्वर्डनेस' थी हम दोनों के बीच लेकिन बहुत जल्दी वो ख़त्म हो गई. वो बहुत सी ऐसी बातें करती थीं, जो उस किताब में दर्ज नहीं थीं. जब मैंने एक दफ़ा उनसे कहा कि इन्हें किताब में होना चाहिए तो उन्होंने कहा नहीं, जो मैंने लिखना था वो लिख दिया है. अब और कुछ उस किताब में नहीं जाएगा.''

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Image caption काले कपड़ों में सलीम किदवई बेगम अख्तर के साथ खड़े हैं.

चिकन का मुकैश से कढ़े कपड़े का तोहफ़ा

जब सलीम क़िदवई लाहौर गए तो वो उनके लिए लखनऊ की सेवा दुकान से चिकन का मुकैश से कढ़ा कपड़ा ले गए, लेकिन वो मलका पुखराज को पसंद नहीं आया. कहने लगीं कि इससे उनकी खाल छिल जाएगी.

सलीम क़िदवई याद करते हैं, ''उन्होंने कहा कि ये हैं तो बहुत ख़ूबसूरत, लेकिन ये गड़ेगा मेरी खाल को. अबकी आना तो बिना मुकैश की कढ़ाई वाला कपड़ा लाना. फिर उन्होंने बताया कि उन्हें कौन से रंग पसंद हैं.''

बाबा नानकदेव की तस्वीर काढ़ी थी मलका पुखराज ने

मलका पुखराज की पोती फ़राज़े सैयद, जिन्हें उन्होंने गोद भी ले लिया था, बताती हैं कि उनके अंतर्मन और हाथों के बीच ग़ज़ब का सामंजस्य था.

फ़राज़े कहती हैं, ''उनका 'हैंड-राइटिंग' पर बहुत 'फ़ोकस' था और लोग मिसाल दिया करते थे कि ऐसी होनी चाहिए 'हैंड- राइटिंग.' मुझे भी वो बचपन में तख़्ती पर लिखवाया करती थीं, कलम के साथ ताकि मेरी 'राइटिंग' भी अच्छी हो जाए. लेकिन मेरी 'राइटिंग' उतनी अच्छी नहीं हो पाई. इसकी वजह से मुझे उनसे बहुत मार भी पड़ी.''

वह कहती हैं, ''वो बहुत दिल लगाकर कढ़ाई करती थीं. उनकी कढ़ाई के कपड़ों की बहुत सी 'एक्ज़ीबीशन्स' भी हुईं. उनके एक दोस्त जो टोरंटो में रहते थे और सिख थे, उनके लिए उन्होंने बाबा नानक की तस्वीर काढ़ कर उन्हें भिजवाई थी. इसके अलावा उन्हें बागबानी का भी बहुत शौक था. दिन में वो तीन-तीन, चार-चार घंटे 'गार्डनिंग' किया करती थीं.''

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सेब गोश्त बनाने में महारत

फ़राज़े बताती हैं, ''उन्हें खाना बनाने का भी बहुत शौक था और वो बेहतरीन खाना बनाती थीं. पूरा-पूरा दिन लगता था उनको एक हांडी बनाने में. मैं अक्सर उनसे सेब- गोश्त बनाने की फ़रमाइश करती थी. ये उनकी कश्मीर की एक 'डिश' थी. वो ख़ास सेब मंगवाती थीं एक ख़ास जगह से और फिर उन्हें सुखा कर रख देती थीं. मौसमी सब्ज़ियों को भी वो सुखा कर रखती थीं. सारा साल हमारे घर के पीछे अचार डल रहे होते थे. ये सारा काम वो खुद करती थीं. उनकी हांडी में अगर कोई चम्मच भी हिला दे, तो उनके लिए ये बहुत बड़ा मुद्दा बन जाता था.''

अपनी गाड़ी ठीक करवाने खुद जाती थीं मलका

उनमें ऊर्जा इतनी थी कि वो जून की तपती धूप में भी अपनी गाड़ी ठीक करवाने खुद जाती थीं.

फ़राज़े याद करती हैं, ''वो 'ट्रस्ट' नहीं करती थीं कि कोई उनकी गाड़ी ठीक करवा दे. दूध भी लेना हो तो वो अपने ड्राइवर के साथ बाज़ार जाती थीं, क्योंकि वो अपनी गाड़ी किसी को नहीं देना चाहती थीं. वो गाड़ी से उतर कर घंटों 'मेकैनिक' के सिर पर खड़ी रहतीं और कहा करती थीं, 'तू ऐ नहीं ठीक कीता, तू ओ नहीं ठीक कीता. तू गड्डी ठीक नहीं कीता सही तरह से'.''

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महाराजा हरि सिंह के दरबार से करियर की शुरुआत

मलका पुखराज की प्रतिभा को सबसे पहले पहचाना था कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने. उनके दरबार की वो गायिका बनीं और वहीं से उनकी ख्याति पूरे हिंदुस्तान में फैली.

सलीम क़िदवई बताते हैं, ''उनकी वालदा उन्हें दिल्ली लाई थीं गाना, उर्दू और कथक सीखने के लिए. महाराजा हरि सिंह ने जब पहली बार उन्हें सुना तो उनसे बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने उन्हें अपने यहाँ मुलाज़िम रख लिया. वो रोज़ शाम उनके यहाँ होने वाली 'प्राइवेट' बैठक में शामिल होती थीं, जिसमें उनके बहुत करीबी लोग मौजूद होते थे.''

सलीम कहते हैं, ''इनके बारे में अफवाहें भी बहुत फैलाई गईं, ख़ासकर ये कि इनका और हरि सिंह के बीच किसी किस्म का रोमांस था. लेकिन मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि ये अफवाहें पूरी तरह से ग़लत थीं. इन दोनों में बहुत नज़दीकी थी लेकिन में समझता हूँ कि हरि सिंह उनके लिए पिता समान थे. वो इनको अपनी बच्ची मानते थे.''

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पुरुष के वेष में शिकार

मलका पुखराज अपनी आत्मकथा में लिखती हैं कि एक बार वो पुरुष का भेष बदल कर उनके साथ शिकार खेलने लक्षीगाम गई थीं.

वह लिखती हैं, ''जैसे ही मेरा जाना तय हुआ, फ़ौरन ही एक दर्ज़ी पहुंच गया. उसने मेरा नाप लिया और मेरे लिए एक कोट और 'ब्रीचेज़' सिल दिए. मेरे लिए एक काला जूता और रंगीन साफ़ा भी मंगवाया गया. मेरे बाल इतने घने थे कि वो साफ़े में आ ही नहीं सकते थे. बाद में मेरे बाल उस तरह बाँधे गए जैसे सरदार अपना जूड़ा बनाते हैं. उसके ऊपर साफ़ा बाँधा गया. 'हिज़ हाईनेस' जब मुझे तंग करना चाहते थे तो वो मुझे 'भटियारिन' कह कर पुकारते थे. कभी-कभी हम ताश भी खेला करते थे. मुझे सिर्फ़ 'कोट-पीस' खेलना ही आता था. कभी-कभी 'हिज़ हाईनेस' खेल में बेइमानी भी कर जाते थे. इस पर मेरे साथी तो चुप रहते थे, लेकिन मैं उन्हें टोक देती थी.''

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डाक्टर कर्ण सिंह को 100 रुपए का नज़राना

महाराजा हरि सिंह के लिए मलका के मन में इतना सम्मान था कि उन्होंने अपनी आत्मकथा शब्बीर शाह के साथ-साथ महाराजा हरि सिंह को भी समर्पित की थी.

फ़राज़ै सैयद कहती हैं, ''वो महाराजा हरि सिंह को कभी नहीं भूलीं. बल्कि जब दिल्ली में उनकी 'ऑटोबायोग्राफ़ी' छप रही थी तो मैं 'डैडिकेशन' के लिए उनके पास गईं, तो सबसे पहला नाम उन्होंने हरि सिंह का लिया.''

महाराजा हरि सिंह के बेटे डॉक्टर कर्ण सिंह बताते हैं, ''जब वो 29 साल पहले हमारे घर आई थीं तो मलका ने उन्हें 100 रुपए नज़राने में दे कर भीगी आँखों से कहा था, मैंने आपके घर का बहुत नमक खाया है.''

सिगरेट और हुक्के की शौकीन

मलका पुखराज बेगम अख़्तर की तरह सिगरेट पीने की शौकीन थीं, लेकिन अपने अंतिम दिनों में उन्होंने अपना ये शौक त्याग दिया था.

सलीम क़िदवई बताते हैं, ' वो हुक्का भी पीती थीं. जब वो रेडियो स्टेशन जाती थीं, तो उनका एक मुलाज़िम एक बैग में कोयला और उनका हुक्का साथ ले कर जाता था. वो चिलम बना कर भी पीती थीं. उन्होंने लिखा है कि चार पाँच साल की उम्र से ही वो सड़क पर पड़े सिगरेट के टुकड़े उठा कर पीने लगी थीं. बेगम अख़्तर ने भी बहुत कम उम्र में सिगरेट पीनी शुरू कर दी थी. लेकिन सिगरेट पीने से इन दोनों की आवाज़े ज़ाया नहीं हुईं. लोग कहते हैं कि सिगरेट पीने से आवाज़ ख़राब हो जाती है लेकिन देखिए दोनों की आवाज़े आख़िर तक कितनी उम्दा थीं ! '

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तोतों को बोलना सिखाती थीं मलका

मलका पुखराज को ज़ेवरों के साथ-साथ जानवरों और बोलने वाले तोते पालने का बहुत शौक था. उनको बोलना सिखाने के लिए वो 'वॉकमैन' पर अपनी आवाज़ 'रिकॉर्ड' करवा दिया करती थीं.

फ़राज़े सैयद याद करती हैं, ' वो कहाँ-कहाँ से ढ़ूढ़ कर लाती थीं बोलने वाले तोते! मुझे याद है मेरे बचपन में तीन-चार ऐसे तोते थे, जिन्हें वो बोलना सिखाती थीं. आते-जाते वो उनको बुला रहे होते थे, उनका नाम ले रहे होते थे. उनको वो गाने सिखाती थीं, 'पॉली पुट द कैटिल ऑन'... 'अल्ला-अल्ला करया करो'. जानवरों का भी उनको बहुत शौक था. अगर उनका बस चलता तो वो पूरा 'ज़ू' खोल लेतीं अपने घर पर.'

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Image caption मलका पुखराज के साथ मुनेज़ा सैयद

बेगम अख़्तर और रेशमा पसंद थीं मलका को

अपने समकालीनों में सिवाए रेशमा और बेगम अख़्तर के, वो बहुत ज़्यादा किसी का ज़िक्र नहीं करती थीं. बेगम अख़्तर के देहांत पर उन्होंने उनके पति को एक बहुत ही मार्मिक पत्र लिखा था.

सलीम किदवई बताते हैं, ''रेशमा का उन्होंने इस संदर्भ में ज़िक्र किया है कि जब उनके पति शब्बीर साहब का इंतेक़ाल हुआ और उनको 'डिप्रेशन' था, तो रेशमा का वो गाना 'हायो रब्बा' उन्हें बहुत अपील करता था और वो उनको बार-बार सुनती थीं.''

सलीम कहते हैं, ''उन्होंने रेशमा को अपने यहाँ ला कर रखा. जब भी उनका दिल करता था, वो कहती थीं, गाओ. रेशमा कहती थीं, 'न बीबी इसे इतना न सुनो. तुम अपनी तबियत ख़राब कर लोगी.' मैंने कई लोगों के बारे में उनसे पूछा लेकिन वो बात टाल जाती थीं. सिर्फ़ बेगम अख़्तर के बारे में वो कहती थीं वो बहुत अच्छी थीं. कमीनी नहीं थीं.''

कई नुख़् भी थे उनके गायन में

बहुत लोकप्रिय होते हुए भी गायन में मलका 'प्योरिस्ट' नहीं थीं और तकनीकी तौर पर संगीत पंडित उनके गायन में कई नुख़्स भी निकालते थे.

उनको नज़दीक से जानने वाले रज़ा काज़िम बताते हैं, 'वो गाती तो बहुत अच्छा थीं लेकिन इनकी मौसिक़ी रोशनआरा की तरह तो नहीं थी. वो उस्ताद नहीं थीं. लेकिन इनके गाने की ख़ुसूसियत ये थी कि वो दिल से निकलता था. '

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कुएं की गहराई में क्लारिनेट

बेगम अख़्तर का ग़ज़लों और नज़्मों का चयन, उनकी आवाज़, उनके गाने का अंदाज़ और उनकी अदायगी, उन्हें बहुत-सी गायिकाओं से अलग करती थी.

मलका की दोस्त रहीं और पाकिस्तान की जानी-मानी उपन्यासकार बानो क़ुदसिया ने एक बार कहा था, ''अगर कभी आपने देहात में कोई पुराना कुआँ देखा हो, जिसमें काई भी लगी हो, गहरा पानी हो नीचे ताल में, वहाँ किसी तरह क्लारिनेट बजाया जाए और उसकी आवाज़ ऊपर आए, तो फिर मलका की आवाज़ को समझाया जा सकता है.''

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