पूर्वांचल में माफ़िया डॉन: बाहुबली नेता मुख़्तार अंसारी की कहानी

  • 13 फरवरी 2019
पूर्वांचल का माफ़िया
Image caption मुख़्तार अंसारी

पूर्वांचल के मऊ से लगातार पाँचवी बार विधायक चुने गए माफ़िया नेता मुख़्तार अंसारी की कहानी के ढेर सारे पन्ने हैं.

लेकिन उनकी कहानी पर आने से पहले यह जानिए कि 2017 में जमा किए गए उनके अपने चुनावी शपथपत्रों के अनुसार उन पर फ़िलहाल देश की अलग-अलग अदालतों में हत्या, हत्या के प्रयास, हथियारबंद तरीक़े से दंगे भड़काने, आपराधिक साज़िश रचने, आपराधिक धमकियाँ देने, सम्पत्ति हड़पने के लिए धोखाधड़ी करने, सरकारी काम में व्यावधान पहुंचाने से लेकर जानबूझकर चोट पहुंचाने तक के 16 केस हैं.

एक वक़्त में उन पर मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ़ ऑर्गनाइज्ड क्राइम ऐक्ट) और गैंगस्टर ऐक्ट के तहत 30 से ज़्यादा मुक़दमे दायर थे.

इनमें से कुछ अहम मामलों में अदालत ने सबूतों की कमी, गवाहों के पलट जाने और सरकारी वकील की कमज़ोर पैरवी के कारण इन्हें बरी कर दिया गया.

लेकिन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक कृष्णानंद राय की हत्या समेत 16 गंभीर मामलों में इन पर अब भी मुक़दमे चल रहे हैं.

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इन मुक़दमों के साथ ही जारी रहा उनके चुनाव जीतने का सिलसिला.

1996 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचने वाले मुख़्तार ने 2002, 2007, 2012 और फिर 2017 में भी मऊ से जीत हासिल की. इनमें से आख़िरी तीन चुनाव उन्होंने देश की अलग-अलग जेलों में बंद रहते हुए लड़े.

इस रिपोर्ट के सिलसिले में मैं पूर्वांचल में ग़ाज़ीपुर ज़िला स्थित मुख़्तार अंसारी के पैतृक निवास गई थी लेकिन आपको वहां का ब्यौरा बताने से पहले मुख़्तार की ज़िंदगी से जुड़े ये तीन ज़रूरी पन्ने :

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ग़ाज़ीपुर पन्ना

अपराधी, अफ़ीम और आईएएस अफ़सर एक साथ पैदा करने वाला ग़ाज़ीपुर हमेशा से पूर्वांचल के गैंगवार की धुरी रहा है.

मुख़्तार अंसारी के राजनीतिक और आपराधिक समीकरणों में ग़ाज़ीपुर का महत्व बताते हुए वरिष्ठ पत्रकार उत्पल पाठक कहते हैं, "80 और 90 के दशक में अपने चरम पर रहा बृजेश सिंह और मुख़्तार का ऐतिहासिक गैंगवार यहीं ग़ाज़ीपुर से शुरू हुआ था.''

दोआब की उपजाऊ ज़मीन पर बसा ग़ाज़ीपुर ख़ास शहर है. राजनीतिक तौर पर देखें तो एक लाख से ज़्यादा भूमिहार जनसंख्या वाले ग़ाज़ीपुर को उत्तर प्रदेश में भूमिहारों के सबसे बड़े पॉकेट में से एक माना जाता है. यहां तक कि कुछ पुराने स्थानीय पत्रकार आम बोलचाल में ग़ाज़ीपुर को 'भूमिहारों का वैटिकन' भी कहते हैं.

देश के सबसे पिछड़े इलाक़ों में आने वाले ग़ाज़ीपुर में उद्योग के नाम पर यहां कुछ ख़ास नहीं है. अफ़ीम का काम होता है और हॉकी ख़ूब खेली जाती है. ग़ाज़ीपुर का एक महत्वपूर्ण विरोधाभास यह भी है कि अपराधियों और पूर्वांचल के गैंगवार की धुरी होने के साथ-साथ इस ज़िले से हर साल कई लड़के आईएएस-आईपीएस भी बनते हैं.

पाठक कहते हैं, "मुख़्तार अंसारी और उनके परिवार का राजनीतिक प्रभाव ग़ाज़ीपुर से लेकर मऊ, जौनपुर, बलिया और बनारस तक है. सिर्फ़ 8-10 प्रतिशत मुसलमान आबादी वाले ग़ाज़ीपुर में हमेशा से अंसारी परिवार हिंदू वोट बैंक के आधार पर चुनाव जीतता रहा है".

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अंसारी परिवार पन्ना

ग़ाज़ीपुर के 'प्रथम राजनीतिक परिवार' के तौर पर पहचाना जाने वाले अंसारी परिवार इस ज़िले और इससे जुड़े अनेक विरोधाभासों के सिलसिले को जैसे आगे ही बढ़ाता ही है.

मसलन, पिछले तक़रीबन 15 सालों से जेल में बंद मुख़्तार अंसारी के दादा देश की आज़ादी के संघर्ष में गांधी जी का साथ देने वाले नेता के रूप में जाने जाते हैं और 1926-27 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी थे.

मुख़्तार अंसारी के नाना ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान को 1947 की लड़ाई में शहादत के लिए महावीर चक्र से नवाज़ा गया था.

ग़ाज़ीपुर में साफ़-सुथरी छवि रखने वाले और कम्युनिस्ट बैकग्राउंड से आने वाले मुख़्तार के पिता सुभानउल्ला अंसारी स्थानीय राजनीति में सक्रिय थे. भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी रिश्ते में मुख़्तार अंसारी के चाचा हैं.

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Image caption मुख़्तार अंसारी के नाना और दादा की तस्वीरें

मुख़्तार के बड़े भाई अफ़जाल अंसारी ग़ाज़ीपुर की मोहम्मदाबाद विधानसभा से लगतार 5 बार (1985 से 1996 तक) विधायक रह चुके हैं और 2004 में ग़ाज़ीपुर से ही सांसद का चुनाव भी जीत चुके हैं.

मुख़्तार के दूसरे भाई सिबकातुल्ला अंसारी भी 2007 और 2012 के चुनाव में मोहम्मदाबाद से ही विधायक रह चुके हैं.

मुख़्तार अंसारी के दो बेटे हैं. उनके बड़े बेटे अब्बास अंसारी शॉट-गन शूटिंग के चैंपियन रह चुके हैं. 2017 के चुनाव में मऊ ज़िले की ही घोसी विधानसभा सीट से अब्बास ने बसपा के टिकट पर अपना पहला चुनाव लड़ा था और 7 हज़ार वोटों से अंतर से हार गए थे.

मुख़्तार के छोटे बेटे उमर अंसारी भारत के बाहर पढ़ाई कर रहे हैं लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में वह भी पहली बार राजनीति में उतरे अपने पिता के पक्ष में मऊ के उनका चुनावी कैम्पेन चलाया.

ऐसे परिवार से आने वाले मुख़्तार का आपराधिक मुक़दमों से लदे माफ़िया नेता में तब्दील होना ग़ाज़ीपुर के अनेक विरोधाभासों का ही एक विस्तार लगता है.

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Image caption अंसारी परिवार की बैठक में लगी पारिवारिक नेताओं की तस्वीरें

कृष्णानंद राय पन्ना

1985 से अंसारी परिवार के पास रही गाज़ीपुर की मोहम्मदाबाद विधानसभा सीट 17 साल बाद 2002 के चुनाव में उनसे बीजेपी के कृष्णानंद राय ने छीन ली.

लेकिन वे विधायक के तौर पर अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके, तीन साल बाद उनकी हत्या कर दी गई.

पूर्वांचल में आग की तरह फैली इस हत्याकांड की ख़बर को मौक़ा-ए-वारदात पर कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार पवन सिंह बताते हैं, "वह एक कार्यक्रम का उद्घाटन करके लौट रहे थे कि तभी उनकी बुलेट प्रूफ़ टाटा सूमो गाड़ी को चारों तरफ़ से घेर कर अंधाधुंध फ़ायरिंग की गई. हमले के लिए स्पॉट ऐसी सड़क को चुना गया था जहां से गाड़ी दाएँ-बाएँ मोड़ने का कोई स्कोप नहीं था. कृष्णानंद के साथ कुल 6 और लोग गाड़ी में थे. एके-47 से तक़रीबन 500 गोलियां चलाई गईं, सभी सातों लोग मारे गए."

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इस हत्याकांड को कवर करने वाले दूसरे वरिष्ठ पत्रकार उत्पल पाठक जोड़ते हैं, "कोई भी पुरबिया आपको बता देगा की ये 500 गोलियां मारने के लिए नहीं, संदेश देने के लिए चलाई गई थीं. हत्यारे वर्चस्व का संदेश देना चाहते थे- कि देखिए, आपके विधानसभा क्षेत्र में, आपकी जाति बहुल इलाक़े में, आपके अपने गढ़ में, अपने तथाकथित 'सेफ़ ज़ोन' में घुसकर आपको मारा है".

जानकारों के अनुसार ग़ाज़ीपुर की अपनी पुरानी पारिवारिक सीट हार जाने से मुख़्तार अंसारी नाराज़ थे. कृष्णानंद हत्याकांड के वक़्त में जेल में बंद होने के बावजूद मुख़्तार अंसारी को इस हत्याकांड में नामज़द किया गया.

इस हत्याकांड के एक दूसरे प्रभाव के बारे में बताते हुए पवन जोड़ते हैं, "गाज़ीपुर से सांसद और मौजूदा सरकार में मंत्री मनोज सिन्हा की पूरी पॉलिटिक्स इसी हत्याकांड के बाद पुरज़ोर तरीक़े से खड़ी हुई. मनोज इस मामले में मुख़्तार के ख़िलाफ़ गवाह हैं. कृष्णानन्द भूमिहार थे और उनके सजातीय सिन्हा ने उन्हें 'न्याय दिलवाने के लिए बिना डरे संघर्ष करने वाले' एकमात्र नेता होने के नाम पर वोट मांगते हुए कई चुनाव जीत लिए."

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Image caption अदालत से बाहर आते मुख़्तार अंसारी

अंसारी निवास का पन्ना

ग़ाज़ीपुर के यसुफ़पूर इलाक़े में स्थित मुख़्तार अंसारी का पैतृक निवास 'बड़का फाटक' या 'बड़े दरवाज़े' के नाम से जाना जाता है. क़स्बेनुमा इस छोटे से शहर में 'बड़का फाटक' का पता सभी जानते हैं इसलिए रास्ता पूछते-पूछते उनके घर पहुंचने में मुझे कोई दिक़्क़त नहीं हुई.

दिसंबर महीने में जब मैं ग़ाज़ीपुर पहुंची तब मुख़्तार की बुज़ुर्ग माँ बहुत बीमार चल रही थीं. उनको आख़िरी बार देखने के लिए उनका पूरा परिवार देश-दुनिया के अलग-अलग कोनों से इकट्ठा हो रहा था.

मुख़्तार बांदा जेल में बंद थे लेकिन उनके बड़े भाई अफ़जाल अंसारी और बेटे अब्बास अंसारी ने बीबीसी से बातचीत की. इसके कुछ ही घंटों के भीतर मुख़्तार की माँ का देहांत हो गया.

मुख़्तार अंसारी के घर के बाहर बना 'बड़ा दरवाज़ा' आगंतुकों के लिए दिन भर खुला रहता है. बारामदे में खड़ी बड़ी गाड़ियों के क़ाफ़िले के आगे बनी बड़ी-सी बैठक में स्थानीय लोग अंसारी भाइयों से मिलने के इंतज़ार में बैठे थे. बैठक में पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी से लेकर पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी तक, परिवार के सभी राजनीतिक चेहरों और गुज़र चुके पूर्वजों की तस्वीरें लगीं थीं.

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Image caption बाएं से : अफ़ज़ाल अंसारी, अब्बास अंसारी और उमर अंसारी

बातचीत के लिए मुझे घर की पहली मंज़िल पर बने परिवार के निजी रिहाइश वाले हिस्से में बुलाया गया. पहली मंज़िल पर मौजूद खुली छत वाले हिस्से में हम कुर्सियों पर बैठ गए. सफ़ेद कुर्ते पजामे, शाल और टोपा लगाए अफ़जाल अंसारी यूं तो अपनी माँ की सेहत को लेकर परेशान थे लेकिन आने वाले चुनाव पर उन्होंने पूरी मुस्तैदी से बात की.

राजनीतिक अवसरवाद का पन्ना

अफ़जाल ने अपना राजनीतिक करियर कम्युनिस्ट पार्टी से शुरू किया था, फिर समाजवादी पार्टी (सपा) में गए, इसके बाद उन्होंने 'क़ौमी एकता दल' के नाम से अपनी पार्टी का गठन किया और 2017 में बसपा में शामिल हो गए.

वहीं मुख़्तार बसपा से शुरू करने के बाद निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ा, फिर 2012 में पारिवारिक पार्टी क़ौमी एकता दल से खड़े हुए और 2017 में पार्टी के बसपा में विलय होने के साथ ही वह भी बसपा में शामिल हो गए. यहां यह दिलचस्प है कि कभी मुख़्तार अंसारी को 'गरीबों का मसीहा' बताने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती ने अप्रैल 2010 में अंसारी भाइयों को 'अपराधों में शामिल' बताते हुए बसपा से निकाल दिया था.

2017 के चुनाव से पहले उन्होंने 'अदालत में उन पर कोई दोष सिद्ध नहीं हुआ है' कहते हुए अंसारी भाइयों की पार्टी 'क़ौमी एकता दल' का विलय बसपा में करवा लिया.

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Image caption अफ़जाल अंसारी

2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र पूरा अंसारी परिवार बसपा को ग़ाज़ीपुर, बलिया, बनारस और जौनपुर बेल्ट में मज़बूती दिलाने के लिए काम कर रहा है.

मुख़्तार का पन्ना

जेल में बंद 58 वर्षीय छोटे भाई मुख़्तार के बारे में बात करते हुए अफ़जाल कहते हैं, "मुख़्तार हमसे दस साल छोटे हैं. स्कूल ख़त्म होने के बाद वो यहीं ग़ाज़ीपुर के कॉलेज में पढ़ते थे. उस कॉलेज में राजपूत-भूमिहारों का वर्चस्व था. वहीं इनकी दोस्ती साधू सिंह नाम के एक लड़के से हुई. उससे दोस्ती निभाने के चक्कर में ये उसकी निजी दुश्मनियों में शामिल हो गए और इनके गले कुछ बदनामियाँ पड़ गईं".

सांसद अफ़ज़ाल अंसारी कहते हैं, "इनके (मुख़्तार के) साथ-साथ पूरे परिवार को भी बदनामी झेलनी पड़ी लेकिन ये सारे मुक़दमे जो मुख़्तार पर लगाए गए हैं वे राजनीति से प्रेरित हैं. 15 साल से ज़्यादा वक़्त से वो जेल में बंद हैं. अगर उन्होंने वाक़ई कुछ गलत किया है तो पुलिस आपकी है, सरकार आपकी है, सीबीआईआपकी है, अब तक कोई गुनाह साबित क्यों नहीं हुआ?"

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Image caption अब्बास अंसारी

मुख़्तार के राजनीतिक प्रभाव के बारे में बात करते हुए वह जोड़ते हैं, "मुख़्तार मऊ से चुनाव लड़ते और जीतते आए हैं. राजनीतिक तौर पर हमसे बड़ी औक़ात है मुख़्तार की. उनका ग्लैमर कोशेंट बड़ा है. आज हम गाज़ीपुर से बाहर कहीं भी जाते हैं तो लोग हमारी पहचान उनके नाम से करवाते हैं".

अफ़ज़ाल कहते हैं कि "सिर्फ़ ग़ाज़ीपुर के 8 फ़ीसदी मुसलमान हमें नहीं जिता सकते, यहां के हिंदू हमें जिताते हैं. आख़िर हम भी हर सुख-दुःख में उनके साथ खड़े रहे, रोज़े में मुँह पर रुमाल रखकर यहां लोगों के साथ हाथियों पर बैठकर होली तक खेली है. यह सब हमारे अपने लोग हैं, इसलिए तो हमें इनके वोटों पर भरोसा रहता है".

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