मुलायम ने मनमोहन के दोबारा PM बनने की कामना की थी?

  • 14 फरवरी 2019
मुलायम सिंह यादव, मनमोहन सिंह इमेज कॉपीरइट Getty Images

बुधवार को मौजूदा लोकसभा का आख़िरी दिन था और सदन के कई जाने-माने नेता भाषण दे रहे थे. लेकिन महफ़िल लूटी मुलायम सिंह यादव ने. उनका एक बयान दिन की सबसे बड़ी ख़बर बन गया.

यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी के बराबर और विपक्षी दलों की बेंच पर बैठे समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने की कामना कर समूचे विपक्ष को मुश्किल में डाल दिया.

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अपने संबोधन में मुलायम सिंह यादव ने कहा, "मेरी कामना है कि जितने माननीय सदस्य हैं, दोबारा फिर जीत जाएं. मैं ये भी चाहता हूं, हम लोग तो बहुमत से नहीं आ सकते हैं, प्रधानमंत्री जी आप फिर बने प्रधानमंत्री. हम चाहते हैं जितने सदन में बैठे हैं सब स्वस्थ रहें, सब मिलकर फिर सदन चलाएं."

मुलायम के भाषण के बाद नरेंद्र मोदी बोल रहे थे और उन्होंने एसपी नेता को शुक्रिया कहने का मौका नहीं चूका. जब मुलायम बोल रहे थे, तो बराबर में बैठीं सोनिया गांधी अजीबोगरीब स्थिति में दिख रही थीं.

विपक्षी नेता गफ़लत में

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उनके पीछे एनसीपी नेता सुप्रिया सुले बैठी थीं, जिन्होंने बाहर निकलकर कहा कि इस भाषण में ऐसा कुछ भी नहीं है क्योंकि मुलायम ने साल 2014 में मनमोहन सिंह के लिए भी ऐसी ही कामना की थी, ऐसा हमने सुना है.

लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? क्या मुलायम सिंह यादव ने साल 2014 में भी ऐसा ही भाषण दिया था? क्या उन्होंने सदन के सारे सदस्यों की जीत के साथ-साथ मनमोहन सिंह के दोबारा जीतने की कामना की थी? नहीं, उन्होंने ऐसा नहीं किया था.

साल 2014 में लोकसभा में दिए उनके भाषण पर नज़र डालें तो सच पता चलता है.

मुलायम ने कहा था, ''अध्यक्ष महोदया (मीरा कुमार) जिन विषम परिस्थितियों में आपने धैर्य के साथ सदन चलाने का काम किया, उसके लिए हम हम आपको बधाई भी देते हैं और धन्यवाद भी देते हैं. मुझे खुशी है कि सारे सदन का विश्वास आप पर पूरी तरह से था, चाहे आपस में कितने भी मतभेद रहे हों.''

क्या कहा था मुलायम ने?

उन्होंने कहा था, ''इधर भी धन्यवाद देते हैं और नेता विरोधी को भी धन्यवाद देते हैं. प्रधानमंत्री जी (मनमोहन सिंह) को, नेता सदन को विशेषकर सोनिया जी को धन्यवाद देते हैं. उनकी राय से आप सब चले रहे हैं, इसलिए उनकी विशेष भूमिका रही है. समय-समय पर अगर हमने भी कोई इशारा किया या पर्ची भेजकर कुछ आग्रह किया, तो उन्होंने उसका पालन किया. इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद.''

मुलायम ने उस अवसर पर बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी को भी शुक्रिया कहा था.

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एसपी नेता ने कहा था, ''आडवाणी साहब, मुझे लगता है कि आज सदन में सबसे वरिष्ठ नेता यही हैं. इस सदन में वे सन् 1972 से लगातार नेता रहे हैं. आप सीनियर और वरिष्ठ लीडर हैं. जिन परिस्थितियों में आपने इस पार्टी को मजबूत किया. एक ही अफसोस है, बुरा मत मानिए कि आज जब पार्टी मजबूत बनी है, तो उसमें महत्वपूर्ण भूमिका आपकी थी.''

''हमारा आपका कुछ मुद्दों को लेकर झगड़ा था, विवाद था. वे देश के मुद्दे थे, मामूली मुद्दे नहीं थे. लेकिन आपको वहां से यहां बैठा दिया. ऐसा नहीं करना चाहिए था. यह हम आपका बता रहे हैं. तभी तो आप कमजोर हो रहे हैं. इसलिए आप कमजोर हो रहे हैं. हम आपके ही संबंध में अच्छाइयां बता रहे हैं कि उनको कमजोर करने से आप कमजोर हो गये. आडवाणी साहब से मेरे मुद्दों को लेकर बहुत मतभेद रहे. हमारा संघर्ष हुआ है.''

धन्यवाद दिया, लेकिन...

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मुलायम ने कहा था, ''हम चाहेंगे कि सभी लोग फिर से जीतकर आ जाएं, तब खुशी होगी. स्पीकर साहब तो जीतकर आ ही जाएंगी. मेरी शुभकामना है और सदन की तरफ से भी कामना है कि पहले से भारी बहुमत से जीतकर आएं. जरूरत पड़ी, तो हम अपने उम्मीदवार को भी आपकी तरफ से ही खड़ा करेंगे.''

''आप ने सबको लेकर चलने की कोशिश की. आपने सदन को बहुत अच्छे तरीके से चलवाया. इसलिए आपको विशेष बधाई. इन्हीं शब्दों के साथ प्रधानमंत्री जी, सोनिया जी तथा आपके सभी साथियों को बधाई और सभी विपक्ष में बैठे साथियों को मेरी शुभकामनाएँ. स्वस्थ रहें, प्रसन्न रहें और आगे जीतकर आएँ.''

साल 2014 में लोकसभा के आख़िरी दिन नेता विपक्ष सुषमा स्वराज का भाषण भी गौर करने लायक था.

सुषमा ने अपने भाषण में कहा था, ''यह सदन उलझा भी बहुत और उलझ कर सुलझा भी है. मैं बहुत प्यार से कह रही हूं, मेरे भाई कमलनाथ अपनी शरारत से इस सदन को उलझा देते थे और आदरणीय शिन्दे जी अपनी शराफत से उसे सुलझा देते थे. इस शरारत और शराफत के बीच में बैठी हुई सोनिया जी की मध्यस्थता, आदरणीय प्रधानमंत्री जी की सौम्यता, आपकी सहनशीलता और आडवाणी जी की न्यायप्रियता के कारण यह सदन चल सका.''

सुषमा के भाषण की बातें

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''आज के दिन मैं अपने पूर्व नेता सदन आदरणीय प्रणब मुखर्जी को भी याद करना चाहूंगी, लोकतांत्रिक संस्थाओं में उनकी आस्था ने भी इस सदन को चलाने में बहुत कारगर भूमिका निभाई. यह इसलिए हुआ, क्योंकि, भारतीय लोकतंत्र के मूल में एक भाव है और वह भाव क्या है. वह भाव यह है कि हम एक दूसरे के विरोधी हैं, मगर शत्रु नहीं हैं और हम विरोध विचारधारा के आधार पर करते हैं, हम विरोध नीतियों के आधार पर करते हैं, हम विरोध कार्यक्रमों के आधार पर करते हैं.''

सुषमा ने कहा था, ''अध्यक्षा जी, अब हम चुनाव में जा रहे हैं. चुनाव में जाते समय चाहिए तो यह था कि मैं सब को विजयी भव का आशीर्वाद देती, लेकिन अगर मैं वैसा करूंगी तो असत्य होगा. इसलिए मैं विजयी भव का आशीर्वाद तो नहीं दे पा रही, लेकिन यशस्वी भव का आशीर्वाद सब को दूंगी. मैं चाहूंगी कि यशस्विता से हम सब चुनाव लड़ें.''

''मैं कहना चाहूंगी कि हम सब यशस्विता से चुनाव लड़ें, जनता जिसे जिताकर भेजे, क्योंकि, लोकतंत्र में जनता की अदालत सबसे बड़ी अदालत होती है, विजय और पराजय का फैसला वही करती है. वह जिसे भी जिता कर भेजे, हम 16वीं लोक सभा में आयें और जो भूमिका हमें जनता दे, उस भूमिका को हम इसी सौहार्द से निभायें.''

''जिस सौहार्द से आज हम इस अंतिम सत्र के अंतिम दिन पर, जिस नोट के ऊपर हम जा रहे हैं, इसी नोट पर हम वापस लौट कर आएं और बहुत सद्भावना और सौहार्द के साथ सोलहवीं लोक सभा चलाएं. यही शुभकामना देते हुए, मैं अपनी बात को समाप्त करती हूं.''

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