'पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के साथ सिंधु जल संधि क्यों नहीं तोड़ रहे हैं मोदी'

  • 15 फरवरी 2019
पुलवामा इमेज कॉपीरइट Reuters

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा ज़िले में सीआरपीएफ़ के एक काफ़िले पर हमले में 46 जवानों के मारे जाने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत अपनी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा को लेकर ख़ुद को लाचार पाता है?

क्या भारत के पास कोई विकल्प है या ऐसे हमले भविष्य में भी झेलने होंगे?

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में विदेश सचिव रहे कंवल सिब्बल को लगता है कि पाकिस्तान को लेकर भारत को जो सख़्त क़दम उठाने चाहिए वो नहीं कर पा रहा है.

सिब्बल मानते हैं कि भारत के पास बहुत विकल्प नहीं हैं, लेकिन कुछ ऐसी रणनीति है जो मास्टरस्ट्रोक साबित हो सकती है.

सिब्बल कहते हैं, ''भारत के पास एक बहुत ही असरदार विकल्प है और वो है सिंधु जल संधि को तोड़ना. मुझे समझ में नहीं आता कि इस संधि को सरकार क्यों नहीं तोड़ रही है. इस संधि को तत्काल निलंबित करना चाहिए. ऐसा होते ही पाकिस्तान सीधा हो जाएगा. जैसे कहा जाता है कि पाकिस्तानी आतंकवाद का भारत के पास कोई जवाब नहीं है वैसे ही पाकिस्तान के पास सिंधु जल संधि तोड़ने का कोई जवाब नहीं है.''

इमेज कॉपीरइट Getty Images

सिब्बल कहते हैं ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद कई संधियां तोड़ी हैं. अमरीका ने ऐसा अपने ख़ास दोस्त जापान और कनाडा के साथ भी किया.

अगर अमरीका ऐसा कर सकता है तो भारत को संधि तोड़ने में क्या दिक़्क़त है? अमरीका जलवायु संधि से निकल गया, ईरान से परमाणु समझौते को रद्द कर दिया.

सिब्बल को ये बात समझ में नहीं आती कि सिंधु जल संधि को भारत क्यों जारी रखे हुए है.

सिब्बल मानते हैं कि इस संधि को तोड़ने से भारत पर कोई असर नहीं होगा. वो कहते हैं कि एक बार भारत अगर इस संधि को तोड़ देता है तो पाकिस्तान को अहसास हो जाएगा.

भारत विदेश सेवा के वरिष्ठ अधिकारी विवेक काटजू भी मानते हैं कि भारत को अब हर विकल्पों पर विचार करना चाहिए.

कंवल सिब्बल कहते हैं, ''भारत के लिए डिप्लोमैटिक विकल्प ही काफ़ी साबित नहीं होंगे. हालांकि इसका भी सहारा लेना होगा. अब ठोस क़दम उठाने की बारी आ गई है. अब कश्मीर में कुछ सफ़ाया करना होगा. अब तक कुछ ठोस हो नहीं पाया है.''

''कुछ दिन पहले ही पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने कश्मीर के अलगाववादी नेता मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ से बात की थी. भारत ने इसका विरोध भी किया पर कुछ नहीं हुआ. पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने फिर गिलानी को फ़ोन किया. ये जो अलगाववादी हैं यानी जो ग्राउंड पर आतंकी गतिविधियों का समर्थन करते उन्हें काफ़ी स्पेस दी जा रही है. कश्मीर की पार्टियों के जो प्रवक्ता हैं वो टीवी पर इतनी राष्ट्रविरोधी बातें करते हैं कि सुनकर बहुत बुरा लगता है.''

इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption सिंधु जल संधि

पाकिस्तानी विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी ने बात इन दोनों अलगाववादी नेताओं से बात की तो भारतीय विदेश मंत्रालय ने 30 जनवरी को कड़ी आपत्ति जताई थी.

नई दिल्ली में पाकिस्तानी राजदूत को भारत ने समन भेजकर जवाब मांगा था. भारत ने कहा था कि पाकिस्तान ने ऐसा कर अंतरराष्ट्रीय संबंधों के नियमों का उल्लंघन किया है.

कंवल सिब्बल को लगता है कि कश्मीरी अलगाववादियों को कुछ ज़्यादा ही छूट दी जा रही है.

वो कहते हैं, ''भारत में कश्मीर और आतंकवाद को लेकर लोगों का मत विभाजित है. यह हमारे लिए सबसे संकट की बात है. हमें इसे भी हैंडल करना है. दूसरी तरफ़ इस मामले में न्यायपालिका से भी मदद नहीं मिल रही. कोई ठोस क़दम उठाना चाहता है तो ये जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट चले जाते हैं और यहां उन्हें राहत मिल जाती है. हमारा लोकतंत्र काफ़ी लचर हो गया है.''

सिब्बल कहते हैं, ''कश्मीर के भीतर सफ़ाये की ज़रूरत है. हुर्रियत वालों को जो सीआरपीएफ़ और राज्य पुलिस की सुरक्षा मिली हुई है, उसे तत्काल हटाने की ज़रूरत है. पाकिस्तान के साथ कुछ कड़े क़दम उठाने की ज़रूरत है. ये क़दम क्या हो सकते हैं इस पर तो सरकार को ही सोचना होगा. संयुक्त राष्ट्र से मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित कराने के लिए फिर से सक्रिय होना होगा.''

सुरक्षा में चूक का नतीजा है पुलवामा हमला?

पुलवामा हमले से सरकार की सैन्य नीति पर उठते सवाल

इमेज कॉपीरइट Getty Images

मसूद अज़हर चरमपंथी संगठन जैश-ए-मोहम्मद का संस्थापक है. भारत ने अज़हर को दो बार अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने की कोशिश की थी लेकिन चीन ने सुरक्षा परिषद में वीटो कर दिया था.

भारत चीन को इस मामले में समझाने में अब तक नाकाम रहा है. पठानकोट हमले में भी मसूद अज़हर का नाम आया था.

भारत में अभी प्रचंड जनादेश वाली सरकार है. सारी ताक़त उसके पास है. ऐसे में कोई भी निर्याणक क़दम उठाने में कुछ ख़ास मदद क्यों नहीं मिल पा रही? इस सवाल के जवाब में कंवल सिब्बल कहते हैं, ''मुझे लगता है कि सरकार अभी डिफेंसिव है. सरकार पर तो आरोप लग रहे हैं कि वो संस्थाओं को कमज़ोर कर रही है.''

मनमोहन सिंह की गठबंधन सरकार और मोदी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार का रुख़ चरमपंथी हमलों में कितना अलग है? इस पर कंवल सिब्बल कहते हैं, ''ऐसी बात तो है नहीं कि मनमोहन सिंह सरकार चुप रही है. उसने भी ऐसे हमलों पर जो करना चाहिए था किया. दिक़्क़त ये है कि भारत के पास विकल्प कम हैं. पाकिस्तान के साथ अगर आप भिड़ने को तैयार होते हैं तो उसकी भी दिक़्क़ते हैं. संयु्क्त राष्ट्र में चीन पूरी तरह से पाकिस्तान का साथ दे रहा है. सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे देश के भीतर ही लोगों के मत विभाजित हैं.''

इमेज कॉपीरइट Getty Images

सिब्बल का मानना है कि अपने घर में आतंकवाद और पाकिस्तान पर एक सुर में नहीं बोलना पाकिस्तान के हक़ में जाता है.

वो कहते हैं, ''अपने ही देश में लोग मांग करते हैं कि पाकिस्तान से बात कीजिए. इमरान ख़ान की पेशकश को स्वीकार कीजिए. संवाद बंद मत कीजिए. कुल मिलाकर मेरा ये कहना है कि देश के भीतर ही लोग विभाजित हैं. पाकिस्तान के पक्ष में या उनकी नीतियों से सहानुभूति रखने वाले लोग कम नहीं हैं. कश्मीर में ऐसे कई लोग हैं जो पाकिस्तान का पक्ष लेते हैं. उमर अब्दुल्ला और उनके पिता क्या बात करते हैं? ये पाकिस्तान से बात करने का समर्थन करते हैं. कोई कड़ा क़दम उठाने की बात आती है तो इनका रुख़ सकारात्मक नहीं होता है.''

विदेशी सेवा के वरिष्ठ अधिकारी विवेक काटजू भी सिब्बल से सहमत हैं कि कश्मीर के नेताओं को राष्ट्रहित के बारे में सोचना चाहिए.

काटजू का कहना है भारत के पास पाकिस्तान के ख़िलाफ़ करने के लिए कई विकल्प संभव बनाए जा सकते हैं. वो कहते हैं, ''राहुल गांधी ने बिल्कुल सही रुख़ दिखाया है इस मसले पर वो सरकार के साथ खड़े हैं. कश्मीर के नेताओं को भी राष्ट्रहित में एक साथ खड़ा होना चाहिए.''

मोदी सरकार ने 2016 में सिंधु जल संधि को तोड़ने की बात कही थी लेकिन सरकार कोई फ़ैसले पर नहीं पहुंच पाई थी. कई लोगों का मानना है कि चीन के कारण इस संधि को भारत के लिए तोड़ना आसान नहीं होगा.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार