ममता बनर्जी का राजनीतिक सफ़र - लोकसभा चुनाव 2019

  • 8 मार्च 2019
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नए साल की 19 जनवरी को पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड मैदान में विपक्षी दलों की महारैली में मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी जब तमाम नेताओं के साथ हाथ उठा कर लाखों की भीड़ की ओर देख रही थीं तब उनकी निगाहें दरअसल प्रधानमंत्री की कुर्सी पर थीं.

उसके ठीक एक पखवाड़े बाद शारदा चिटफंड घोटाले के सिलसिले में कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से सीबीआई पूछताछ की कोशिशों में रात को साढ़े आठ बजे महानगर के धर्मतल्ला इलाक़े में ममता ने जब अचानक धरने पर बैठने का फ़ैसला किया तब भी उनकी निगाहें उसी कुर्सी पर थीं.

वैसे, केंद्र और भाजपा के ख़िलाफ़ ममता की मुहिम तो वर्ष 2014 में एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही चल रही है. लेकिन बीते ख़ासकर डेढ-दो वर्षों के दौरान वे अर्जुन की भूमिका में आ गई हैं. अब उनको मछली की आंख के अलावा कुछ नहीं सूझ रहा है. मछली की आंख यानी प्रधानमंत्री की कुर्सी.

वे येन-केन-प्रकारेण इस लक्ष्य को भेदने में जुटी हैं. तृणमूल कांग्रेस नेता ने ख़ुद तो अब तक इस लक्ष्य के बारे में सीधे कुछ नहीं कहा है. लेकिन उनकी पार्टी के तमाम नेता और कार्यकर्ता मानते हैं कि वही देश की अगली प्रधानमंत्री बनेंगी.

बीते साल 21 जुलाई की रैली के दौरान तमाम नेताओं ने एक स्वर में यह बात दोहराई थी. अब राज्य के विभिन्न इलाक़ों में पार्टी की ओर से लगे पोस्टरों और बैनरों में कहा गया है कि लोग प्रधानमंत्री की कुर्सी पर ममता को देखना चाहते हैं.

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ज़िद और जुझारूपन तो ममता के ख़ून में रहा है. यह जुझारूपन उनको अपने शिक्षक और स्वतंत्रता सेनानी पिता प्रमिलेश्वर बनर्जी से विरासत में मिला है. अपने इन्हीं गुणों की बदौलत वर्ष 1998 में कांग्रेस से नाता तोड़ कर तृणमूल कांग्रेस की स्थापना कर महज 13 वर्षों के भीतर राज्य में दशकों से जमी वाममोर्चा सरकार को उखाड़ कर उन्होंने अपनी पार्टी को सत्ता में पहुंचाया था.

साल 2016 के विधानसभा चुनावों में अगर तृणमूल कांग्रेस की सीटें भी बढ़ीं और वोट भी तो यह ममता का करिश्मा ही था. सिंगुर और नंदीग्राम में ज़मीन अधिग्रहण के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर किए गए आंदोलनों ने एक जुझारू नेता के तौर पर ममता की छवि को तो निखारा ही, सत्ता के केंद्र राइटर्स बिल्डिंग तक पहुंचने का रास्ता भी खोला था.

राजनीतिक करियर की शुरुआत से ही विद्रोही रहीं ममता को आम लोगों से जुड़े मुद्दों पर कहीं भी अनशन करने या पुलिस की मार खाने तक से परहेज़ नहीं रहा. वह आजीवन दूसरों के हक़ की लड़ाई लड़ती रहीं. इसके लिए बड़े से बड़े नेताओं से टकराने से भी उनको परहेज़ नहीं रहा. नफ़ा-नुक़सान की परवाह किए बिना वे आजीवन तमाम फ़ैसले करती रहीं. कई बार उनको राजनीतिक रूप से इसका ख़ामियाजा भी भुगतान पड़ा.

फ़ैसलों पर अफ़सोस नहीं करने वाली ममता

लेकिन ममता ने कभी अपने फ़ैसलों पर अफ़सोस नहीं जताया. ज़िद और टकराव की इस राजनीति ने ही उनको क़ामयाबी दिलाई है. उनकी छवि धीरे-धीरे एक ऐसे नेता की बन रही है जो केंद्र की एनडीए सरकार, प्रधानमंत्री, भाजपा और उसके ताक़तवर नेताओं से भी दो-दो हाथ करने से नहीं डरतीं.

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राज्य में कांग्रेस के छात्र संगठन छात्र परिषद की नेता के तौर पर अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत करने वाली ममता ने तमाम मुकाम अपने दम पर हासिल किए. अपनी ज़िद और जुझारूपन के चलते उनको सैकड़ों बार पुलिस और माकपा काडरों की लाठियां खानी पड़ी. इस ज़िद, जुझारूपन और शोषितों के हक़ की लड़ाई के लिए मीडिया ने उनको अग्निकन्या का नाम दिया था.

कांग्रेस में रहते हुए भी ममता ने कभी पार्टी के बाक़ी नेताओं की तरह माकपा की चरण वंदना नहीं की. वह उसके हर ग़लत फ़ैसलों और नीतियों का विरोध करती रहीं. उस दौर में बंगाल में कांग्रेस को माकपा की बी टीम कहा जाता था.

सादगी ममता के जीवन का हिस्सा रही है. सफेद सूती साड़ी और हवाई चप्पल से उनका नाता कभी नहीं टूटा. चाहे वह केंद्र में मंत्री रही हों या महज सांसद. मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उनके पहनावे या रहन-सहन में कोई अंतर नहीं आया.

निजी या सार्वजनिक जीवन में उनके रहन-सहन और आचरण पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता. उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह रही है कि वह ज़मीन से जुड़ी नेता हैं. वह चाहे सिंगुर में किसानों के समर्थन में धरना और आमरण अनशन का मामला हो या फिर नंदीग्राम में पुलिस की गोलियों के शिकार लोगों के हक़ की लड़ाई का, ममता ने हमेशा मोर्चे पर रह कर लड़ाई की.

ममता की जीवनी 'दीदीः द अनटोल्ड ममता बनर्जी' शीर्षक पुस्तक लिखने वाली पत्रकार सुतपा पाल कहती हैं, "ममता देश की सबसे मज़बूत इरादे वाली महिला नेताओं में से एक हैं."

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इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि अपनी राजनीति के अनूठे स्वरूप और विद्रोही स्वाभाव की वजह से दीदी ने अपने करियर में कई ऐसी चीज़ों को संभव कर दिखाया है जिसकी उससे पहले कल्पना तक नहीं की जा सकती थी. इनमें वाममोर्चा सरकार को अर्श से फ़र्श तक पहुंचाना भी शामिल है.

ममता के जीवन पर 'डिकोडिंग दीदी' नामक पुस्तक लिखने वाली पत्रकार डोला मित्र कहती हैं, "देश में किसी और महिला नेता की गतिविधियों के प्रति लोगों में उतनी दिलचस्पी नहीं रहती जितनी दीदी के नाम से मशहूर ममता बनर्जी के प्रति रहती है. यह ममता के जादुई व्यक्तित्व का ही करिश्मा है."

कांग्रेस से शुरू की राजनीति

ममता का राजनीतिक सफ़र 21 साल की उम्र में साल 1976 में महिला कांग्रेस महासचिव पद से शुरू हुआ था. और वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए लोकसभा चुनाव में पहली बार मैदान में उतरीं ममता ने माकपा के दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को पटखनी देते हुए धमाके के साथ अपनी संसदीय पारी शुरू की थी.

राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान उनको युवा कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया. कांग्रेस-विरोधी लहर में वर्ष 1989 में वे लोकसभा चुनाव हार गई थीं.

लेकिन ममता ने हताश होने की बजाय अपना पूरा ध्यान बंगाल की राजनीति पर केंद्रित कर लिया. वर्ष 1991 के चुनाव में वे लोकसभा के लिए दोबारा चुनी गईं. उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. उस साल चुनाव जीतने के बाद पीवी नरसिंह राव मंत्रिमंडल में उन्होंने युवा कल्याण और खेल मंत्रालय का जिम्मा संभाला.

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लेकिन केंद्र में महज दो साल तक मंत्री रहने के बाद ममता ने केंद्र सरकार की नीतियों के विरोध में कोलकाता की ब्रिगेड परेड ग्राउंड में एक विशाल रैली का आयोजन किया और मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया. तब उनकी दलील थी कि वह राज्य में माकपा की अत्याचार के शिकार कांग्रेसियों के साथ रहना चाहती हैं.

ममता के राजनीतिक जीवन में एक अहम मोड़ तब आया जब वर्ष 1998 में कांग्रेस पर माकपा के सामने हथियार डालने का आरोप लगाते हुए उन्होंने अपनी नई पार्टी तृणमूल कांग्रेस बना ली. ममता की पार्टी ने जल्दी ही कांग्रेस से राज्य के मुख्य विपक्षी दल की गद्दी छीन ली. साल 2011 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने अकेले अपने बूते ही तृणमूल कांग्रेस को सत्ता के शिखर तक पहुंचा दिया.

राजनीतिक करियर की शुरुआत से ही ममता का एकमात्र मकसद बंगाल की सत्ता से वामपंथियों को बेदख़ल करना था. इसके लिए उन्होंने कई बार अपने सहयोगी बदले. कभी उन्होंने केंद्र में एनडीए का दामन थामा तो कभी कांग्रेस का. वर्ष 1998 से 2001 तक वह एनडीए के साथ रहीं. अक्तूबर, 2001 में ममता ने केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार में रेल मंत्री का पद संभाला.

लेकिन तहलका कांड की वजह से महज 17 महीने बाद ही इस्तीफ़ा देकर सरकार से अलग हो गईं. उसके बाद उन्होंने कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया. जनवरी 2004 में कुछ दिनों के लिए वह फिर केंद्र में मंत्री बनीं. लेकिन उसी साल हुए लोकसभा चुनाव में एनडीए के हार जाने की वजह से ममता की यह पारी भी छोटी ही रही. वर्ष 2006 में उन्होंने एक बार फिर कांग्रेस का हाथ थामा और लगभग छह साल तक उसी के साथ बनी रहीं.

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वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को राज्य की 42 में महज एक ही सीट मिली थी. वह भी सीट ममता की ही थी. लेकिन उसके बाद सिंगुर और नंदीग्राम में किसानों के हक में जमीन अधिग्रहण विरोधी लड़ाई के ज़रिए ममता ग़रीबों की मसीहा के तौर पर उभरीं. यही वजह थी कि वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल की सीटों की तादाद एक से बढ़ कर 19 तक पहुंच गई.

ममता रेल मंत्री बनने वाली देश की पहली महिला थीं. इसके अलावा वे केंद्र में कोयला, मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री, युवा मामलों और खेल तथा महिला और बाल विकास राज्यमंत्री भी रह चुकी हैं. वर्ष 2012 में टाइम पत्रिका ने उन्हें विश्व के 100 सबसे प्रभावरशाली लोगों की सूची में शामिल किया था.

क्या है ममता की मंजिल

केंद्र में दूसरी बार रेल मंत्री बनने के बाद उन्होंने बंगाल पर नई ट्रेनों और परियोजनाओं की बौछार कर दी थी. इस दौरान उनका ज्यादातर समय राज्य में बी बीतता था. इसी वजह से उनको बंगाल का रेल मंत्री कहा जाता था.

रेल मंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल लोकलुभावन घोषणाओं और कार्यक्रमों के लिए जाना जाता रहा है. लेकिन उन्होंने रेलवे की ख़राब माली हालत को सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाया. इसके लिए उनको विपक्ष की कड़ी आलोचना भी झेलनी पड़ी. लेकिन ममता आलोचनाओं की परवाह किए बिना अपनी मंजिल की ओर बढ़ती रही.

आख़िर में वर्ष 2011 में बंगाल में वामपंथियों के लगभग साढ़े तीन दशक लंबे शासन का अंत कर ममता ने अपनी मंज़िल हासिल कर ही ली.

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केंद्र और राज्य दोनों ही जगहों पर अपनी पैठ जमाने के बाद ममता ने 18 सितंबर, 2012 को केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. वैसे उनके करियर में कई ऐसी विवादास्पद घटनाएँ हुई हैं, जिनके कारण ममता बनर्जी की छवि एक झक्की, सनकी और आत्मप्रशंसा में डूबे रहने वाले एक राजनीतिज्ञ की बनी.

उन पर तानाशाही के आरोप भी लगते रहे हैं. लेकिन बंगाल पर दो लाख करोड़ के भारी-भरकम कर्ज के बावजूद उन्होंने अपने बूते जितनी नई परियोजनाओं की शुरुआत की, उसकी दूसरी मिसाल कम ही देखने को मिलती है.

ममता पर भ्रष्ट नेताओं को संरक्षण देने समेत कई सवाल उठते रहे हैं. लेकिन उनके कट्टर आलोचक भी मानते हैं कि वे निजी जीवन में बेहद ईमानदार हैं. वर्ष 1993 में युवा कांग्रेस अध्यक्ष रहते राज्य सचिवालय राइटर्स बिल्डिंग अभियान के दौरान पुलिस की गोली से 13 युवक मारे गए थे.

तबसे ममता हर साल 21 जुलाई को शहीद रैली का आयोजन करती रहीं हैं. उन्होंने उन पीड़ित परिवारों के एक-एक सदस्य को नौकरी तो दी ही, उनको आर्थिक सहायता भी दिलाई.

उसी अभियान के दौरान राज्य सचिवालय में पुलिस वालों के साथ धक्कामुक्की में ममता की साड़ी फट गई थी. उन्होंने उसी दिन कसम खाई थी कि अब वाम मोर्चा के शासन के ख़ात्मे के बाद ही वे राइटर्स बिल्डिंग में क़दम रखेंगी. और ममता ने अपनी उस कसम को अगले लगभग 18 साल तक निभाया. उन्होंने वर्ष 2011 में मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद ही उस ऐतिहासिक इमारत में दोबारा क़दम रखा.

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ममता एक राजनेता होने के अलावा एक कवि, लेखक और चित्रकार भी हैं. बीते विधानसभा चुनावों में उन्होंने अपनी पेंटिंग्स बेचकर पार्टी के चुनाव अभियान के लिए लाखों रुपए जुटाए थे. हालांकि बाद में उन पेंटिंग्स के ख़रीददारों को लेकर सवाल उठे और विपक्ष ने ममता को भी कटघरे में खड़ा किया. ख़रीदने वालों में राज्य के कई चिटफंड कंपनियों के मालिक शामिल थे. मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी कविता और कहानी की दर्जनों किताबें आ चुकी हैं. अपने भाषणों में भी वे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और शरतचंद्र का हवाला देती रही हैं.

राजनीतिक विशेलषकों का कहना है कि राज्य में लंबी पारी खेलने के बाद ममता अब राष्ट्रीय राजनीति में अहम भूमिका निभाने के लिए बेताब हैं. एक विश्लेषक विश्वनाथ घोष कहते हैं, "वर्ष 2016 में दूसरी बार बंगाल की सत्ता में लौटने के बाद ममता की राजनीतिक महात्वकांक्षा ज़्यादा ज़ोर मारने लगी है.

तृणमूल कांग्रेस के तमाम नेता-समर्थक भी यही चाहते हैं." इस महत्वाकांक्षा के चलते ही बीते लगभग दो साल से वे तमाम विपक्षी नेताओं को भाजपा के ख़िलाफ़ गोलबंद करने की कोशिशों में जुटी हैं. ममता के क़रीबी रहे पूर्व परिवहन मंत्री मदन मित्र दावा करते हैं कि दीदी का प्रधानमंत्री बनना तय है.

कोलकाता में ममता के धरनास्थल पर पहुंचे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने तो कहा भी कि तृणमूल कांग्रेस इस बार राज्य की सभी 42 लोकसभा सीटें जीतेगी और चुनावों के बाद केंद्र में अगली सरकार के गठन में दीदी एक अहम भूमिका निभाएंगी.

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