सऊदी अरब से भारत की सच्ची दोस्ती में रुकावटें

  • गुरप्रीत सैनी
  • बीबीसी संवाददाता
मोदी सऊदी

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सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान मंगलवार से दो दिन के भारत दौरे पर हैं. वो पाकिस्तान से होते हुए भारत आ रहे हैं.

पाकिस्तान के साथ वो 20 अरब डॉलर के समझौते करके आ रहे हैं. अब सबकी नज़रें इस बात पर टिकीं हैं कि भारत के साथ किस तरह के समझौते होंगे.

भारत और सऊदी अरब के कई आपसी हित हैं. पाकिस्तान से सऊदी की नज़दीकी, कश्मीर पर सऊदी का रुख़, कट्टरपंथी ताक़तों को उसका समर्थन जैसे मुद्दे क्या भारत और सऊदी अरब की सच्ची दोस्ती के बीच रुकावटें डालने का काम करते हैं?

इन सवाल पर मध्य-पूर्व मामलों के जानकार क़मर आग़ा कहते हैं, ''सऊदी अरब और भारत के सिस्टम में फ़र्क़ है. भारत लोकतंत्र और क़ानून के शासन में विश्वास रखता है. वहीं सऊदी अरब में इस्लामिक हुक़ूमत है. वहां एक कट्टरपंथी शासन हैं और वो हुक़ूमत कट्टरपंथी ताक़तों को प्रोत्साहित भी करती है.''

आग़ा कहते हैं, ''बात भारत और तमाम लोकतांत्रिक देशों के लिए समस्या है. इनमें यूरोप के भी कई देश भी शामिल हैं.''

लेकिन वैसे भारत और सऊदी के बीच रिश्ते बहुत अच्छे हैं. व्यापारिक संबंध लगातार बेहतर हो रहे हैं. 25 लाख से भी ज़्यादा भारतीय सऊदी अरब में काम करते हैं.

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कश्मीर मुद्दे पर सऊदी का रुख़

कश्मीर मुद्दे पर सऊदी अरब के स्टैंड को लेकर भी भारत असहज रहता है.

दरअसल, इस्लामिक कॉन्फ्रेंस ऑर्गेनाइज़ेशन में पाकिस्तान के कश्मीर से जुड़े प्रस्ताव का सऊदी अरब और खाड़ी के दूसरे देश हमेशा समर्थन करते हैं. क़मर आग़ा कहते हैं कि ये बहुत बड़ी बात है.

हालांकि सऊदी अरब में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद कहते हैं कि 2001 में जब भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह रियाद गए थे तब सऊदी अरब ने कश्मीर मुद्दे पर विस्तृत प्रस्ताव दिया था. इस पर भारत ने कहा था कि वो इस मुद्दे पर सऊदी की स्थिति से संतुष्ट है.

इसके अलावा अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान को लेकर भी भारत और सऊदी अरब के बीच मतभेद है.

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात पाकिस्तान के अलावा ऐसे अकेले दो देश थे, जिन्होंने तालिबान को सत्ता में आने पर मान्यता दी थी और उसकी मदद भी की थी.

अभी उनके संबंध तालिबान से बने हुए हैं. भारत तालिबान को एक चरमपंथी संगठन मानता है और अफ़ग़ानिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार को समर्थन करता है.

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कट्टरपंथी ताक़तों का समर्थन

क़मर आग़ा कहते हैं कि सऊदी अरब कट्टरपंथी ताक़तों का समर्थन करता है. वो मदरसों को या रूढ़िवादी विचारधारा का प्रोत्साहित करता है.

वो कहते हैं, "भारत के अंदर बहुत बड़ी संख्या में मुसलमान हैं. देश की आबादी के क़रीब 14 फ़ीसदी मुसलमान हैं. डर रहता है कि कहीं भारत में भी इस्लामिक चरमपंथ ना बढ़े. पाकिस्तान की तरह अगर उन मदरसों को बड़ी फंडिंग मिलती है तो ये भारत के लिए एक बड़ी समस्या बन सकती है."

हालांकि पूर्व राजदूत तलमीज़ अहमद कहते हैं कि मौजूदा वक़्त में भारत और सऊदी अरब दोनों देश चरमपंथ के ख़िलाफ़ बोल रहे हैं.

वो कहते हैं कि साल 2008 में हुए मुंबई हमले पर सऊदी अरब समेत खाड़ी के दूसरे देशों ने प्रतिक्रिया दी थी और माना था कि पाकिस्तान की धरती से चलाए जा रहे और पाकिस्तान प्रायोजित जिहादी समूहों से पूरे क्षेत्र को ख़तरा है."

तलमीज़ अहमद का कहना है कि मौजूदा वक़्त में भारत और सऊदी अरब के बीच रिश्ते काउंटर टेररिज़्म पर आधारित हैं और ये रिश्ता बेहद मज़बूत है. वो मानते हैं कि दोनों देश क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर मिलकर काम कर सकते हैं क्योंकि इसमें दोनों के आपसी हित हैं."

वो कहते हैं कि 2010 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और 2016 में मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सऊदी दौरे से दोनों देशों के बीच के रिश्ते सामरिक भागीदारी के अलग ही स्तर पर पहुंचे हैं.

लेकिन सच्चाई ये भी है कि पाकिस्तान के साथ सऊदी के रिश्ते बेहद मज़बूत हैं.

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तो क्या पाकिस्तान सऊदी के ज़्यादा क़रीब है?

इस पर कमर आगा कहते हैं कि सऊदी अरब के पाकिस्तान से बहुत घनिष्ठ संबंध हैं. पाकिस्तान सऊदी अरब के शाही परिवार की रक्षा करता है.

सऊदी अरब में पाकिस्तान के सैनिक तैनात हैं. ये सैनिक उन इलाक़ों में बड़ी तादाद में तैनात हैं जहां शिया समुदाय के लोग ज़्यादा रहते हैं. तेल भी सऊदी अरब के इस अल हसा इलाके में सबसे ज़्यादा पाया जाता है.

सऊदी अरब में सेना बहुत कमज़ोर है. सुरक्षा के लिए उसे अमरीका से गारंटी मिली हुई है, दूसरी तरफ़ पाकिस्तान उसे खुलकर समर्थन देता है.

भविष्य में अगर ईरान से सऊदी के टकराव की स्थिति बनती है तो पाकिस्तान उसका बड़ा सपोर्ट होगा.

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पाकिस्तान से धार्मिक संबंध

क़मर आगा कहते हैं कि पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच धार्मिक संबंध भी काफ़ी मज़बूत हैं. पाकिस्तान दक्षिण एशिया में ईरान और फ़ारस के प्रभाव को नियंत्रित करने का काम करता है और उसके चलते सऊदी अरब ने पाकिस्तान में हज़ारों मदरसे खोलने के लिए फंडिंग दी."

"पाकिस्तान मध्य पूर्व और ख़ासतौर से खाड़ी देशों में चीन के हित को भी प्रमोट करता है. इस समय पाकिस्तान और चीन मिलकर डिफेंस प्रोटेक्शन की बात कर रहे हैं. असल में वो एसेंबली प्लांट है जो चीन पाकिस्तान में लगाएगा, सऊदी इनसे हथियार ख़रीदेगा और इससे इनका निवेश भी आएगा. इसलिए पाकिस्तान सऊदी अरब के लिए काफी महत्वपूर्ण है."

लेकिन मौजूदा वक्त में सऊदी भारत को भी नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता. भारत की अर्थव्यवस्था को देखते हुए सऊदी ऐसा नहीं करेगा.

इसके अलावा भारत 20 फ़ीसदी तेल सऊदी अरब से लेता है. सऊदी अरब के लिए भारत तेल का बड़ा बाज़ार है, जिसे वो नकार नहीं सकता.

भारत की अर्थव्यवस्था जिस तरह से बढ़ रही है, ऐसे में सऊदी को तेल के अलावा भी भारत में और आमदनी नज़र आती है. इसलिए वो यहां निवेश करता है.

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान भारत और पाकिस्तान के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश करेंगे.

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ईरान और सऊदी दोनों से ही भारत के रिश्ते अच्छे हैं. लेकिन ईरान और सऊदी की आपस में नहीं बनती. ऐसे में भारत क्या परस्पर विरोधी स्थिति में नहीं है?

रक्षा विषेक्षज्ञ कहते हैं कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को तरजीह देता है. वो अपनी विदेश नीति के मुताबिक चलता है.

भारत के सऊदी अरब, ईरान और इसराइल तीनों से अच्छे संबंध हैं, क्योंकि ये तीनों क्षेत्र के बहुत ही अहम देश हैं.

तलमीज़ अहमद कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि एक देश के किसी से अच्छे संबंध हैं तो किसी और देश से नहीं हो सकते. जैसे कि भारत के सऊदी, इसराइल, ईरान, क़तर और संयुक्त अरब अमीरात के बीच राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं. इन देशों के आपस में संबंध कैसे भी हों, लेकिन इसका भारत पर असर नहीं पड़ता. उसके रिश्ते सभी से अच्छे हैं.

"तो ऐसा नहीं है कि सऊदी से पाकिस्तान के रिश्ते अच्छे होने की वजह से भारत के साथ उसके रिश्तों पर कोई असर पड़ेगा."

ईरान भारत के लिए सेंट्रल एशिया का गेटवे है. इन दोनों देशों के बीच सिविल एविएशन के क्षेत्र में और सांकृतिक क्षेत्र में हज़ारों साल पुराने संबंध हैं. इसी तरह अरब से भी भारत के संबंध बहुत पुराने हैं.

संबंध बेहतर होने का दूसरा कारण ये है कि भारत इन देशों के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देता.

हालांकि भारत फ़लस्तीन की मांगों को जायज़ मानकर उसका समर्थन करता है लेकिन इन देशों के अंदरूनी झगड़ों और विवादों के मामले में भारत न्यूट्रल रहता है.

यही नहीं, इन देशों की विकास योजनाओं में भी भारत खुलकर सहयोग देता है. भारत के सत्तर लाख लोग खाड़ी देशों, फारस की खाड़ी, ख़ासकर अरब देशों में काम करते हैं.

वहां के विकास में इन लोगों का काफ़ी योगदान है, उनकी काफी सराहना भी की गई है.

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और किन मुद्दों पर बात होगी

क़मर आगा कहते हैं कि सऊदी प्रिंस के इस दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने को लेकर बात होगी. "इसके अलावा भारत को ये भी कहना चाहिए कि सऊदी पाकिस्तान पर दबाव डाले ताकि अपनी ज़मीन पर चल रहे चरमपंथी ठिकानों पर वो नकेल कसे."

"सऊदी अरब ने चरमपंथ के ख़िलाफ़ बात की है, देखना होगा कि वो चरमपंथ को ख़त्म करने के लिए कितने गंभीर हैं. अगर तालिबान दोबारा से अफ़ग़ानिस्तान में आता है तो इस्लामिक मूवमेंट को एक बड़ी सपोर्ट मिलेगी."

तलमीज़ अहमद कहते हैं कि दोनों देश क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर सहयोग बढ़ाने पर बात होगी.

"इसके अलावा भारत को सऊदी के सामने पाकिस्तान की धरती पर चल रहे चरमपंथ के ठिकानों को लेकर अपनी चिंता व्यक्त करनी चाहिए."

तलमीज़ अहमद कहते हैं, "सऊदी ये पहले से जानता है, लेकिन भारत में हुई हालिया घटना के बाद सऊदी के नेताओं को एक बार फिर से इस बारे में याद दिलाने की ज़रूरत है. क्योंकि ये सिर्फ़ भारत के लिए ही ख़तरा नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए ख़तरा है."

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